कलगी–तुर्रा
लेखक – राजेश भाई रेवलिया संपादन – गीतेश कुमार भार्गव
निमाड़ अंचल की लोकसंस्कृति में कलगी–तुर्रा केवल एक लोकगीत विधा नहीं, बल्कि यह दार्शनिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक संवाद की जीवंत परंपरा है। यह लोकविधा सदियों से निमाड़ की सामाजिक चेतना, काव्य-बुद्धि और संगीत साधना को समृद्ध करती चली आ रही है।
निमाड़ की लोककला कलगी–तुर्रा : परंपरा, दर्शन और गायन-विधा
📜 ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
लोकमान्यता के अनुसार कलगी–तुर्रा विधा की परंपरा द्वापर युग से मानी जाती है। इसका प्रारंभ चंदेल नगरी के प्रतापी राजा शिशुपाल के शासनकाल से जुड़ा हुआ बताया जाता है। उस काल में राजा शिशुपाल के राजदरबार में संगीत और काव्य की उच्च कोटि की सभाएँ आयोजित होती थीं।
एक ऐसे ही संगीत समारोह में गायन प्रतियोगिता आयोजित की गई, जिसमें दो महान संतों ने भाग लिया—
संत सहालीगीर
संत तुकनगीर
दोनों संतों की गायन कला इतनी अद्भुत और समान स्तर की थी कि राजा शिशुपाल किसी एक को विजेता घोषित नहीं कर सके। अंततः राजा ने दोनों को दिग्विजयी घोषित करते हुए—
संत सहालीगीर को कलगी
संत तुकनगीर को तुर्रा
उपहार स्वरूप प्रदान किया।
यहीं से संत सहालीगीर कलगी दल के गुरु (उस्ताद) और संत तुकनगीर तुर्रा दल के गुरु (उस्ताद) माने गए।
🔱 शिव–शक्ति का प्रतीकात्मक स्वरूप

कलगी–तुर्रा विधा को शिव और शक्ति के दार्शनिक स्वरूप से जोड़ा गया है—
कलगी : मां शक्ति (पार्वती) का प्रतीक
तुर्रा : भगवान शिव का प्रतीक
इसी कारण यह लोकविधा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि आध्यात्मिक संवाद का माध्यम भी है।
🎭 मंचीय स्वरूप और परंपरा
राजस्थान में कलगी–तुर्रा का रूप रंगमंचीय नाट्य शैली में देखने को मिलता है, जहाँ—
कलगी → नारी स्वरूप
तुर्रा → पुरुष स्वरूप
दोनों पात्र आमने–सामने सवाल–जवाब के माध्यम से तर्क, व्यंग्य और दर्शन प्रस्तुत करते हैं।
वहीं मध्यप्रदेश के पश्चिम निमाड़ और पूर्व निमाड़ जिलों में यह विधा गायन प्रधान रूप में विकसित हुई और आज निमाड़ की एक प्रमुख व मान्यता प्राप्त लोकविधा मानी जाती है।
निमाड़ी कलगी–तुर्रा की गायन शैली

निमाड़ में कलगी–तुर्रा का आयोजन पूरी रात चलने वाला सवाली–जवाबी गायन होता है। इसमें प्रचलित राग और तर्जें हैं—
सिकस्ता
लावणी
पुहाड़ा लावणी
डेढ़ कड़ी
छणगाली
प्रभाती
भजनी
दिगर
लयदार
खमसा
एवं अनेक पारंपरिक धुनें
आयोजन की प्रक्रिया
इस विधा में दो दल होते हैं—
कलगी दल
तुर्रा दल
दोनों दल जाजम पर आमने–सामने बैठते हैं। कवि द्वारा रचित काव्य—
महाभारत
वेद
पुराण
और लोकजीवन पर आधारित होते हैं, जिन्हें प्रांतीय (निमाड़ी) भाषा में प्रस्तुत किया जाता है।
एक दल प्रश्नात्मक, व्यंग्यात्मक गायन से विपक्षी दल पर कटाक्ष करता है, फिर दूसरा दल उसी का तार्किक और काव्यात्मक उत्तर देता है। यह क्रम पूरी रात चलता रहता है।
🥁 वाद्य यंत्र
कलगी–तुर्रा में प्रमुख वाद्य यंत्र हैं—
चंग (ढपली)
ढोलक
इन्हीं वाद्यों की संगत पर शागिर्द अपनी गायन साधना प्रस्तुत करते हैं।
अखाड़े और गुरु परंपरा
निमाड़ क्षेत्र में कलगी–तुर्रा के दो प्रमुख अखाड़े होते हैं। प्रत्येक अखाड़े का एक गादीपति होता है, जिन्हें गुरुवर या उस्ताद कहा जाता है।
कलगी दल के प्रमुख गुरु (उस्ताद)
नानुराम महाराज
मोतीसिंह जी
मोहन बाबा जी
मुरलीदास महाराज जी
आनंदराम जी कुशवाह
तुर्रा दल के प्रमुख गुरु (उस्ताद)
आनंदराव
बंकटराव
बापुराव
कलगी–तुर्रा लोककला : प्राचीन काल बनाम आधुनिक काल
निमाड़ की लोककला कलगी–तुर्रा समय के साथ निरंतर प्रवाहित होती रही है। हर युग ने इसे अपने सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक संदर्भों के अनुसार ढाला है। नीचे प्रस्तुत है प्राचीन काल और आधुनिक काल में कलगी–तुर्रा के स्वरूप का तुलनात्मक विश्लेषण—
1️⃣ उद्देश्य में अंतर
प्राचीन काल में
कलगी–तुर्रा का प्रमुख उद्देश्य धार्मिक, आध्यात्मिक और साहित्यिक चेतना का प्रसार था। यह लोककला—
शिव–शक्ति दर्शन का मौखिक विस्तार थी
रामायण, महाभारत और वेदों की लोकव्याख्या का माध्यम थी
समाज को नीति, धर्म और जीवन मूल्यों से जोड़ती थी
उस समय मनोरंजन के कोई अन्य साधन उपलब्ध नहीं थे, इसलिए लोककलाएँ ही ज्ञान और आनंद का मुख्य स्रोत थीं।
आधुनिक काल में
आज कलगी–तुर्रा का उद्देश्य आंशिक रूप से मनोरंजन-केंद्रित हो गया है। मंचीय कार्यक्रमों में—
समय सीमा के कारण विषय संक्षिप्त हो गए
धार्मिक–दार्शनिक गहराई कम होती जा रही है
प्रस्तुति दर्शकों की त्वरित रुचि के अनुसार ढल रही है
2️⃣ प्रस्तुति शैली में बदलाव
प्राचीन काल में
पूरी रात चलने वाला सवाली–जवाबी गायन
सहज, स्वाभाविक और मौखिक परंपरा पर आधारित काव्य
गुरु–शिष्य परंपरा के अनुसार शुद्ध राग और तर्ज
बिना मंच, बिना ध्वनि विस्तारक—केवल लोक परिवेश
आधुनिक काल में
सीमित समय की प्रस्तुति (30–60 मिनट)
मंच, माइक, लाउडस्पीकर और प्रकाश व्यवस्था का प्रयोग
पारंपरिक तर्जों के साथ आधुनिक धुनों का मिश्रण
दृश्य प्रभावों पर अधिक ज़ोर
3️⃣ सामाजिक भूमिका का अंतर
प्राचीन काल में
कलगी–तुर्रा समाज के लिए—
सामूहिक संवाद का माध्यम
सामाजिक प्रश्नों पर लोकविवेक का मंच
ग्रामीण समाज को जोड़ने वाली शक्ति
पूरे गाँव की सहभागिता होती थी और यह लोकजीवन का अभिन्न हिस्सा थी।
आधुनिक काल में
कार्यक्रम सीमित दर्शकों तक सिमट गए हैं
शहरीकरण के कारण सामूहिक सहभागिता कम हुई है
डिजिटल माध्यमों ने प्रत्यक्ष लोकसंवाद को प्रभावित किया है
4️⃣ विषय-वस्तु में परिवर्तन
प्राचीन काल में
धर्म, दर्शन, नीति, भक्ति और अध्यात्म
लोकजीवन की समस्याओं पर गूढ़ काव्यात्मक प्रश्न
व्यंग्य में भी मर्यादा और तात्त्विकता
आधुनिक काल में
हल्का-फुल्का व्यंग्य और तत्कालिक विषय
सामाजिक संदेश तो है, पर गहराई अपेक्षाकृत कम
कभी-कभी लोकप्रियता के लिए मूल स्वरूप से विचलन
5️⃣ संरक्षण और परंपरा
प्राचीन काल में
गुरु–शिष्य परंपरा सशक्त थी
अखाड़ों की गरिमा बनी रहती थी
लोककला जीवन का स्वाभाविक हिस्सा थी
आधुनिक काल में
नई पीढ़ी की रुचि सीमित होती जा रही है
रोजगार और आधुनिक जीवनशैली के कारण साधना कम
संरक्षण संस्थागत प्रयासों पर निर्भर हो गया है
📉 लोककला के घटते चलन के कारण
टेलीविजन, मोबाइल और डिजिटल मनोरंजन
बदलती जीवनशैली और तेज़ रफ्तार जीवन
आर्थिक असुरक्षा और कलाकारों को सीमित मंच
लोककलाओं के प्रति सामाजिक उदासीनता
निष्कर्ष : संरक्षण की आवश्यकता
Rajesh Bhai Revaliya के अनुसार कलगी–तुर्रा जैसी लोककला कभी धार्मिक–साहित्यिक जीवन की धुरी हुआ करती थी, किंतु आधुनिकता के प्रभाव से इसका स्वरूप बदल गया है और इसका चलन धीरे–धीरे कम होता जा रहा है।
आज आवश्यकता है कि—
इसकी मौलिकता और दर्शन को संरक्षित किया जाए
नई पीढ़ी को इससे जोड़ा जाए
डिजिटल माध्यमों का उपयोग संरक्षण के लिए हो, न कि विस्थापन के लिए
यदि समय रहते प्रयास नहीं किए गए, तो कलगी–तुर्रा जैसी समृद्ध लोककला केवल इतिहास के पन्नों तक सीमित होकर रह जाएगी। 🌿
कलगी–तुर्रा निमाड़ की आत्मा है—यह लोककला संवाद, सहिष्णुता, तर्क, भक्ति और संगीत का अद्भुत संगम है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही यह परंपरा आज भी निमाड़ की सांस्कृतिक पहचान को जीवंत बनाए हुए है।
यह विधा न केवल लोकगायन की धरोहर है, बल्कि शिव–शक्ति के संतुलन, ज्ञान और लोकचेतना की अमूल्य अभिव्यक्ति भी है।




