जोगी रे जोगी रे | कबीरदास जी निर्गुणी भजन – Gitesh Kumar Bhargava

Bhajan Details
भजन नाम: जोगी रे जोगी रे
भजन प्रकार: निर्गुणी भजन
रचनाकार: संत कबीरदास जी
गायक: गीतेश कुमार भार्गव, संतोष नाथ
भाषा: हिंदी (लोक / निर्गुण परंपरा)
परंपरा: कबीर पंथ / निर्गुण भक्ति
Bhajan Name: Jogi Re Jogi Re
Bhajan Type: Nirguni Bhajan
Lyricist / Composer: Sant Kabir Das Ji
Singers: Gitesh Kumar Bhargava, Santosh Nath
Language: Hindi (Folk / Nirguni Tradition)
Tradition: Kabir Panth / Nirguni Bhakti
Bhajan Lyrics
जोगी रे जोगी रे
जोगी रे जोगी रे
मन ना रंगायो जोगी,
कपड़ा रंगायो रे।
मन ना रंगायो जोगी रे,
जोगी रे जोगी रे॥
1️⃣
आसन मार, मंदिर में बैठे–बैठे,
ब्रह्मा छाड़ी पूजन लगि पथरा।
जोगी रे जोगी रे॥
2️⃣
जगल जाये जोगी,
धुनिया–धुनिया रमौले।
काम जराय जोगी,
होये गेले हिजरा।
जोगी रे जोगी रे॥
3️⃣
मथवा मुड़ाय जोगी,
कपड़ा रंगोले।
गीता बाँच के,
होये गेले लबरा।
जोगी रे जोगी रे॥
4️⃣
कहे कबीर, सुनो भाई साधौ,
जम दरवाजा बाँध जेबे पकड़ा।
जोगी रे जोगी रे॥
Bhajan Lyrics
Jogi Re Jogi Re
Jogi re jogi re,
Jogi re jogi re॥
Man na rangayo jogi,
Kapda rangayo re।
Man na rangayo jogi re,
Jogi re jogi re॥
1️⃣ Verse One
Aasan maar, mandir mein baithe–baithe,
Brahma chhadi poojan lagi pathra।
Jogi re jogi re॥
2️⃣ Verse Two
Jagal jaaye jogi,
Dhuniya–dhuniya ramaule।
Kaam jaraye jogi,
Hoye gele hijra।
Jogi re jogi re॥
3️⃣ Verse Three
Mathva mudaay jogi,
Kapda rangole।
Geeta baanch ke,
Hoye gele labra।
Jogi re jogi re॥
4️⃣ Final Verse (Kabir Vaani)
Kahe Kabir, suno bhai saadho,
Jam darwaza baandh jebe pakda।
Jogi re jogi re॥
CLICK TO WATCH ON YOUTUBE
CLICK TO LISTEN ON AMAZON MUSIC
CLICK TO LISTEN ON Spotify
CLICK TO LISTEN ON APPLE MUSIC
CLICK TO LISTEN ON JIOSaavn
निर्गुणी भजन “जोगी रे जोगी रे” : विस्तृत भावार्थ
संत कबीरदास जी का यह निर्गुणी भजन बाहरी आडंबर और दिखावटी साधना पर तीखा प्रहार करता है। कबीर कहते हैं कि सच्चा योग, सच्ची भक्ति और सच्चा संन्यास मन की शुद्धता से प्राप्त होता है, न कि केवल वस्त्र, वेश या रीति-रिवाज़ों से।
🔸 स्थायी (मुखड़ा) का भाव
“मन ना रंगायो जोगी, कपड़ा रंगायो रे”
इस पंक्ति में कबीरदास जी स्पष्ट कहते हैं कि साधक ने अपने कपड़ों को तो रंग लिया, लेकिन अपने मन को ईश्वर के रंग में नहीं रंग सका। बाहरी परिवर्तन आसान है, लेकिन भीतर के विकार—काम, क्रोध, लोभ, मोह—को त्यागना कठिन है। सच्चा योगी वही है जिसका मन प्रभु-भक्ति में रमा हो।
🔹 पद 1 का भाव
“आसन मार, मंदिर में बैठे–बैठे…”
यहाँ कबीर मंदिरों में बैठकर की जाने वाली यांत्रिक पूजा पर प्रश्न उठाते हैं। वे कहते हैं कि ब्रह्मज्ञान को छोड़कर पत्थर की पूजा में लग जाना अज्ञान का प्रतीक है। केवल आसन लगाकर, घंटों मंदिर में बैठ जाने से आत्मज्ञान प्राप्त नहीं होता।
🔹 पद 2 का भाव
“जगल जाये जोगी, धुनिया–धुनिया रमौले…”
इस पद में कबीर संसार-त्याग का ढोंग करने वाले योगियों पर व्यंग्य करते हैं। बाहर से वे काम-वासना को जलाने का दावा करते हैं, लेकिन भीतर वही वासनाएँ जीवित रहती हैं। इसलिए ऐसा योगी न स्त्री का रहता है, न पुरुष का—बल्कि दिशाहीन हो जाता है, यानी आत्मिक रूप से पतित।
🔹 पद 3 का भाव
“मथवा मुड़ाय जोगी, कपड़ा रंगोले…”
कबीर यहाँ सिर मुंडवाने, कपड़े रंगने और शास्त्र पढ़ने जैसे बाहरी कर्मकांडों की आलोचना करते हैं। केवल गीता या शास्त्र पढ़ लेने से कोई ज्ञानी नहीं बनता, यदि वह ज्ञान आचरण में न उतरे। ऐसा व्यक्ति शब्दों का ज्ञाता तो है, लेकिन आत्मिक रूप से भ्रमित (लबरा) ही रहता है।
🔹 पद 4 (कबीर वाणी) का भाव
“कहे कबीर, सुनो भाई साधौ…”
अंतिम पद में कबीरदास जी साधकों को सावधान करते हैं। वे कहते हैं कि यदि जीवन रहते मन को न सँवारा गया, तो मृत्यु के बाद यमराज का द्वार खुला मिलेगा और तब कोई उपाय शेष नहीं रहेगा। यह पंक्ति जीवन की नश्वरता और आत्म-सुधार की अनिवार्यता को रेखांकित करती है।
🌸 समग्र भाव (Overall Message)
यह निर्गुणी भजन हमें यह सिखाता है कि—
सच्ची भक्ति बाहरी वेश में नहीं, अंतरात्मा की शुद्धता में है
दिखावटी योग और कर्मकांड आत्मज्ञान का मार्ग नहीं हैं
ईश्वर का साक्षात्कार तभी संभव है, जब मन रंग जाए


