निमाड़ी कलाकार

रनु बाई सजी धजी न चल्या

रनु बाई सजी धजी न चल्या – निमाड़ी गणगौर लोकगीत | Gitesh Kumar Bhargava

रनु बाई सजी धजी न चल्यानिमाड़ी गणगौर लोकगीत | Gitesh Kumar Bhargava

रनु बाई सजी धजी न चल्या


📌 गीत की जानकारी

🎤 गायक: Gitesh Kumar Bhargava
✍️ गीतकार: उधव यादव
🎼 शैली: निमाड़ी लोकभक्ति गीत
🎉 पर्व: निमाड़ का महापर्व – माता गणगौर
🎧 रिकॉर्डिंग स्टूडियो: कुमार स्टूडियो, खरगोन
📺 आधिकारिक प्रकाशन: Nimadi Kalakar (Official Channel)

CLICK TO WATCH ON YOUTUBE
CLICK TO PLAY ON BOOMPLAY MUSIC
CLICK TO PLAY ON APPLE MUSIC
CLICK TO PLAY ON JIOSAVNN
CLICK TO PLAY ON SPOTIFY


रनु बाई सजी धजी न चल्या – निमाड़ी गणगौर लोकगीत | Gitesh Kumar Bhargava

🪔 गीत का परिचय

“रनु बाई सजी धजी न चल्या” निमाड़ अंचल के महापर्व माता गणगौर पर आधारित एक पारंपरिक निमाड़ी लोकभक्ति गीत है।
इस गीत में रनु बाई (गौर माता) के ससुराल से पीहर आगमन, उनके श्रृंगार, साज-सज्जा और भक्तिभाव को पारंपरिक लोकशैली के साथ आधुनिक संगीत संयोजन में प्रस्तुत किया गया है।
गीत निमाड़ी संस्कृति, स्त्री श्रद्धा और गणगौर परंपरा की जीवंत झलक देता है।


🎶 गीत के बोल

 

मुखड़ा

रनु बाई सजी धजी न चल्या
चल्या वो अपना पीयर की वाट
तम्बु की गाड़ी म लाल-लाल बयल्या
धमक बयल्या की कसाट
रनु बाई सजी धजी न चल्या


1

रनू बाई का संग म धणीयर जी आया
तम्बु की गाड़ी म बयल्या धुराया
पाटा का पहिया न रेशम को सड़को
धुड़की लगाव झन्नाट
रनु बाई सजी धजी न चल्या


2

पेळय-पेळय साड़ी, साड़ी म चमक सितारा
जरीदार साड़ी का दमक किनारा
रनु बाई का माथा या लाल-लाल बिंदिया
शक्ति की चमक ललाट
रनु बाई सजी धजी न चल्या


3

रनु बाई करि चल्या सोला श्रृंगार जी
हरि-हरि चूड़ी न नवसरिया हार भी
माथा प ओयड़ी न लाल चुनरिया
उनको पीयर म ठाट
रनु बाई सजी धजी न चल्या


 4

धीर-धीर गाड़ी जरा घणीयर जी हाको
हमरी रनुबाई को पीयर में खाको
गीत उधव भी स्वागत म मैया
आसन पीठाया पाठ
रनु बाई सजी धजी न चल्या

🎶 Song Lyrics

 

Ranu Bai saji dhaji na chalya
Chalya wo apna peer ki vaat
Tambu ki gaadi ma laal-laal baylya
Dhamak baylya ki kasaat
Ranu Bai saji dhaji na chalya


 1

Ranu Bai ka sang ma dhaniyar ji aaya
Tambu ki gaadi ma baylya dhuraya
Paata ka pehiya na resham ko sadko
Dhudki lagav jhannaat
Ranu Bai saji dhaji na chalya


 2

Pelay-pelay saadi, saadi ma chamak sitara
Jaridar saadi ka damak kinara
Ranu Bai ka maatha ya laal-laal bindiya
Shakti ki chamak lalaat
Ranu Bai saji dhaji na chalya


 3

Ranu Bai kari chalya sola shringar ji
Hari-hari choodi na navsariya haar bhi
Maatha pa oyadi na laal chunariya
Unko peer ma thaat
Ranu Bai saji dhaji na chalya


 4

Dheer-dheer gaadi zara ghaniyar ji haako
Hamri Ranubai ko peer ma khaako
Geet Udhav bhi swagat ma Maiya
Aasan peethaya paath
Ranu Bai saji dhaji na chalya


🌸 सांस्कृतिक महत्व Cultural Significance

यह गीत निमाड़ क्षेत्र में गणगौर पर्व के समय गाया जाने वाला एक पारंपरिक लोकगीत है, जिसमें

  • माता गौर का श्रृंगार

  • पीहर आगमन

  • स्त्री भक्ति, शक्ति और सौंदर्य
    का भावपूर्ण चित्रण किया गया है।
    गीत में लोकभाषा, लोकछंद और पारंपरिक प्रतीकों का सुंदर प्रयोग है।


🔗 श्रेय (Credits)

© Vocal: Gitesh Kumar Bhargava
✍️ Lyrics: Udhav Yadav
🎙️ Recording: Kumar Studio, Khargone
📺 Official Release: Nimadi Kalakar

गीत का भावार्थ / हिंदी व्याख्या

गीत: “रनु बाई सजी धजी न चल्या” (निमाड़ी गणगौर लोकगीत)

यह गीत निमाड़ अंचल के महापर्व माता गणगौर पर आधारित एक अत्यंत भावपूर्ण और सांस्कृतिक लोकभक्ति गीत है। इसमें रनु बाई (माता गौर) के ससुराल से पीहर आगमन का सुंदर, श्रद्धामय और लोकचित्रात्मक वर्णन किया गया है। गीत में स्त्री भक्ति, शक्ति, सौंदर्य और पारंपरिक लोकसंस्कारों का जीवंत चित्र उभरकर आता है।


🔹 मुखड़े का भावार्थ

गीत की शुरुआत रनु बाई के सजी-धजी होकर पीहर की ओर प्रस्थान से होती है। वे पारंपरिक पोशाकों और आभूषणों से सुसज्जित हैं। तम्बू की गाड़ी में सजे हुए बैल, उनकी धमक और गति, उत्सव का माहौल रचते हैं। यह दृश्य गणगौर पर्व की खुशी और उल्लास को दर्शाता है।


🔹 प्रथम अंतरा का भावार्थ

इस अंतरे में बताया गया है कि रनु बाई के साथ उनके पति (धणीयर जी) भी हैं। गाड़ी में जुते हुए बैल, रेशमी रस्सियाँ और पहियों की झनकार लोकयात्रा की भव्यता को दर्शाती है। यात्रा केवल भौतिक नहीं, बल्कि परंपरा और विश्वास की यात्रा है।


🔹 द्वितीय अंतरा का भावार्थ

यहाँ रनु बाई के श्रृंगार और सौंदर्य का वर्णन है। पीली और जरीदार साड़ियों की चमक, उनके माथे की लाल बिंदिया—सब मिलकर उन्हें शक्ति का स्वरूप बनाते हैं। बिंदिया केवल श्रृंगार नहीं, बल्कि देवी शक्ति का प्रतीक है।


🔹 तृतीय अंतरा का भावार्थ

इस अंतरे में रनु बाई के सोलह श्रृंगार का उल्लेख है—हरी चूड़ियाँ, नवसरिया हार, लाल चुनरिया। यह श्रृंगार नारी के सौभाग्य, श्रद्धा और मर्यादा का प्रतीक है। पीहर में उनका स्वागत सम्मान और ठाठ-बाट के साथ होता है।


🔹 चतुर्थ अंतरा का भावार्थ

अंतिम अंतरे में यात्रा की गति को धीरे रखने का आग्रह है, ताकि भक्तों को माता के दर्शन का अवसर मिले। पीहर में माता का सम्मानपूर्वक स्वागत, आसन बिछाना और पूजा-पाठ की तैयारी दर्शाई गई है। गीतकार उधव यादव स्वयं भी माता के स्वागत में सम्मिलित होकर भक्ति भाव प्रकट करते हैं।


 समग्र भाव

यह गीत केवल एक लोककथा नहीं, बल्कि

  • निमाड़ी संस्कृति का जीवंत दस्तावेज़

  • गणगौर पर्व की आत्मा

  • नारी शक्ति और लोकभक्ति का संगम है।

गायक Gitesh Kumar Bhargava की प्रस्तुति में यह गीत पारंपरिक लोकभाव को बनाए रखते हुए आधुनिक संगीत के साथ नई पीढ़ी तक पहुँचा है।

Scroll to Top