मकर संक्रांति : सूर्य उपासना, परंपरा और पौराणिक महत्व का महापर्व
(Makar Sankranti: Festival, Traditions, and Mythological Significance )

✍️ लेखन एवं संपादन परिचय
लेखक: श्री राजेश भाई रेवलिया
संपादन: गीतेश कुमार भार्गव
यह लेख मकर संक्रांति जैसे पावन पर्व के धार्मिक, पौराणिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक महत्व को सरल एवं भावपूर्ण शब्दों में प्रस्तुत करता है। इसमें हिन्दू धर्मग्रंथों, लोककथाओं तथा भारतीय परंपराओं के माध्यम से मकर संक्रांति की महत्ता को विस्तार से समझाया गया है। लेख का उद्देश्य पाठकों को इस पर्व के वास्तविक अर्थ, उसके पीछे की मान्यताओं और समाज में उसके महत्व से अवगत कराना है। संक्रांति हिन्दू धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण एवं शुभ पर्व है। यह पर्व सूर्य के राशि परिवर्तन से जुड़ा हुआ है और भारतीय संस्कृति में ऋतु परिवर्तन, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता तथा सामाजिक एकता का प्रतीक माना जाता है।
मकर संक्रांति क्या है और क्यों मनाई जाती है
हिन्दू पंचांग के अनुसार पौष मास में जिस दिन सूर्य धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करता है, उसी दिन मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाता है। वर्तमान समय में यह पर्व सामान्यतः 14 या 15 जनवरी को आता है।
सूर्य जब मकर राशि में प्रवेश करता है, तब उसका उत्तरायण काल प्रारंभ होता है। अर्थात् सूर्य दक्षिणायन से उत्तर दिशा की ओर अग्रसर होने लगता है। इसी कारण मकर संक्रांति को कई स्थानों पर उत्तरायण पर्व भी कहा जाता है।
वैज्ञानिक दृष्टि से यह पृथ्वी के झुकाव और सूर्य की स्थिति में परिवर्तन का परिणाम है, जिससे दिन बड़े और रातें छोटी होने लगती हैं।
मकर संक्रांति का खगोलीय और ऋतु संबंधी महत्व

सूर्य एक वर्ष में बारह राशियों का भ्रमण करता है, इसलिए वर्ष में 12 संक्रांतियाँ आती हैं।
मकर संक्रांति ऋतु परिवर्तन का संकेत देती है।
इस समय हेमंत ऋतु समाप्त होकर शिशिर ऋतु का आरंभ होता है।
उत्तरायण के बाद सूर्य की किरणें अधिक ऊष्मा प्रदान करती हैं, जो स्वास्थ्य और कृषि दोनों के लिए लाभकारी मानी जाती हैं।
धार्मिक परंपराएँ और पूजा विधि
मकर संक्रांति के दिन:
नदी, सरोवर या तीर्थ में स्नान
दान-पुण्य
सूर्य देव की उपासना
तिल, गुड़, चावल, दाल आदि का दान
की परंपरा है। यह पर्व भगवान सूर्य के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर माना जाता है, क्योंकि सूर्य के कारण ही पृथ्वी पर जीवन संभव है।
भारत के विभिन्न राज्यों में मकर संक्रांति

मकर संक्रांति पूरे भारत में अलग-अलग नामों और परंपराओं के साथ मनाई जाती है:
तमिलनाडु – पोंगल
कर्नाटक, केरल, आंध्र प्रदेश – संक्रांति
बिहार के कुछ क्षेत्र – तिला संक्रात
पंजाब – लोहड़ी
महाराष्ट्र – तिल-गुड़ का आदान-प्रदान
पश्चिम बंगाल – गंगासागर मेला
उत्तर भारत – गंगा स्नान, खिचड़ी दान और पतंगबाजी
प्रयागराज में इस अवसर पर त्रिवेणी संगम पर एक माह का मेला लगता है, जिसमें लाखों श्रद्धालु स्नान-दान करते हैं।
पौराणिक मान्यताएँ और कथाएँ
सूर्य और शनिदेव की कथा

पुराणों के अनुसार, मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव अपने पुत्र शनिदेव से मिलने स्वयं उनके घर गए थे। शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं, इसलिए यह दिन मकर संक्रांति कहलाया।
भीष्म पितामह का देह त्याग
महाभारत के अनुसार, भीष्म पितामह ने सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा कर इसी दिन अपने शरीर का त्याग किया। इस कारण इस दिन श्राद्ध और तर्पण का विशेष महत्व है।
श्रीकृष्ण और द्रौपदी की कथा

वनवास काल में जब ऋषि दुर्वासा अपने शिष्यों के साथ पांडवों के आश्रम पहुंचे, तब भोजन समाप्त हो चुका था। द्रौपदी ने श्रीकृष्ण का स्मरण किया। कृष्ण ने पात्र में पड़े एक चावल के दाने को ग्रहण किया, जिससे दुर्वासा और उनके सभी शिष्य तृप्त हो गए। यह कथा अन्न के महत्व और भगवान की कृपा को दर्शाती है।
गंगा अवतरण की कथा

मान्यता है कि इसी दिन गंगा मैया भागीरथ के पीछे-पीछे कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जाकर मिलीं, इसी कारण गंगासागर स्नान का विशेष महत्व है।
बाबा गोरखनाथ और खिचड़ी परंपरा

एक लोककथा के अनुसार, खिलजी के आक्रमण के समय नाथ योगी भोजन की कमी से कमजोर हो रहे थे। तब बाबा गोरखनाथ ने दाल, चावल और सब्जी को एक साथ पकाने की सलाह दी। इससे जल्दी भोजन तैयार होने लगा। युद्ध समाप्ति के बाद आज के दिन के दिन इस भोजन को खिचड़ी नाम देकर बांटा गया और विजयोत्सव मनाया गया।
किसानों के लिए मकर संक्रांति का महत्व
आज के दिन नई फसल के आगमन का पर्व भी है। किसान अपनी मेहनत की फसल पकने की खुशी में यह पर्व मनाते हैं। इसी कारण पंजाब में लोहड़ी, और कई स्थानों पर फसल उत्सव के रूप में यह पर्व मनाया जाता है।
मकर संक्रांति का अर्थ
मकर – एक राशि
संक्रांति – परिवर्तन
अर्थात् सूर्य का धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करना ही मकर संक्रांति कहलाता है।
निष्कर्ष
मकर संक्रांति केवल एक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, सूर्य, कृषि, समाज और अध्यात्म से जुड़ा हुआ उत्सव है। यह पर्व हमें दान, सेवा, सद्भाव, और कृतज्ञता का संदेश देता है। विविधताओं से भरा यह पर्व भारत की सांस्कृतिक एकता का सुंदर उदाहरण है।


