मूल अध्यन साहित्य – “जब निमाड़ गाता है” – डॉ वासुदेवशरण अग्रवाल
लेखन संपादन – गीतेश कुमार भार्गव
“लोक-गीतों में गूंजता निमाड़ : संस्कृति, चेतना और आनंद की अक्षय धारा”
भूमिका
” जब निमाड़ गाता है ” संग्रह में संकलित लोक-गीतों की व्यापकता और विविधता यह सिद्ध करती है कि निमाड़ की भूमि वास्तव में लोक-साहित्य की दृष्टि से अत्यंत सौभाग्यशाली रही है। यह धरती केवल भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि भाव, संस्कृति और चेतना का विराट सरोवर है। यहाँ लोक-गीत उसी तरह फूटते हैं जैसे धरती की कोख से जलस्रोत—स्वाभाविक, जीवनदायी और अनंत।
ऋषियों के वैदिक गीतों और सामगान में जो अनादि आनंद प्रवाहित हुआ, वही रस सदियों बाद लोक-गीतों के रूप में मानवीय कंठों से मुखरित हुआ। भारतीय आकाश में देवी और मानव की संयुक्त ध्वनियों से जिस ब्रह्म-अक्षर का जन्म माना गया है, उसका एक सजीव अंश इन लोक-गीतों में सहज रूप से विद्यमान है। लोक-गीत किसी एक काल की रचना नहीं, बल्कि उस आनंद की अभिव्यक्ति हैं जो अतीत, वर्तमान और भविष्य—तीनों को एक सूत्र में बांधता है।
लोक-गीतों की महिमा को शब्दों में पूर्णतः बाँध पाना कठिन है, क्योंकि उनका मूल्य केवल प्रशंसा में नहीं, बल्कि अनुभूति में है। मानव-हृदय का जो आनंद देश और काल की सीमाओं से परे सदा जीवित रहता है—जो प्रातःकाल वृक्षों पर बसे पक्षियों के कलरव में गूंजता है—वही आनंद लोक-गीतों का आत्मस्वर है। बाह्य रूप में चाहे इन गीतों की भाषा, लय या शैली बदली हो, किंतु इनकी आत्मा, इनकी आनंदमयी भावना, सदा एकरस बनी रही है।
पर्वतों की चोटियों से लेकर नदी-घाटियों तक, अरण्यों, ग्रामों और नगरों में लोक-गीतों का एक विस्तृत ताना-बाना फैला हुआ है। इनमें भारतीय जीवन की उन्मुक्त प्राण-शक्ति भी है और संस्कृति के अनुशासन में ढली कोमल संवेदनाएँ भी। लोक-गीतों का यह विराट महाकाव्य—यह राष्ट्रीय संहिता—आज के आधुनिक युग में भी अपनी संपूर्ण शक्ति और सौंदर्य के साथ हमारे मानस में उपस्थित है और हमें कृतज्ञता से भर देता है।
नर्मदा अंचल : संस्कृति की पालना

नर्मदा के उपकंठ की भूमि अत्यंत प्राचीन संस्कृति की जननी रही है। इस महादेवी-स्वरूपा नदी की क्षीरधारिणी छाया में मानव जीवन का सर्वांगीण विकास संभव हुआ। इस संग्रह में संकलित लोक-गीत उसी जीवन की अंतर-मालिका हैं। ये गीत नदी-तटों पर, खेतों में, गांवों की चौपालों में और पर्वतीय गुफाओं तक में गूंजते रहे हैं।
गांवों और जनपदों में, दूरस्थ पर्वतीय अंचलों में शहद के छत्तों की भांति भरी हुई जनता अब राष्ट्रीय चेतना के आलोक में धीरे-धीरे सामने आ रही है और भारतीय सांस्कृतिक चेतना का अभिन्न अंग बन रही है। नर्मदा या निमाड़ केवल एक प्रतीक है—वास्तव में यह सांस्कृतिक जागरण कश्मीर की कृष्णगंगा से लेकर दक्षिण कोसल की इंद्रावती और शबरी तक समान रूप से प्रवाहित हो रहा है।
आज एक नए युग का आगमन हुआ है। फागुन की प्राणवंत बयार ने उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्चिम—चारों दिशाओं को स्पर्श किया है और हमें अपने जीवन के बहुआयामी सौंदर्य को पहचानने की नई दृष्टि प्रदान की है। राजस्थानी, भोजपुरी, काश्मीरी, पंजाबी, गढ़वाली, छत्तीसगढ़ी, सोरठी—इन सभी लोक-गीतों के संग्रह इस बात का प्रमाण हैं कि लोक-साहित्य संपूर्ण राष्ट्र की साझा धरोहर है।
विवाह गीत : लोक-जीवन का महायज्ञ

लोक-गीतों में विवाह गीतों का स्थान सबसे विशिष्ट और सरस है। मानव जीवन की सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक घटना विवाह है, जो व्यक्ति के जीवन को संस्कार-संपन्न बनाती है। मानव जीवन का सबसे प्रभावशाली रस—श्रृंगार—इन्हीं गीतों में संयमित और पवित्र रूप में अभिव्यक्त होता है।
जैसे किसी यज्ञ में मंत्र और गान साथ-साथ प्रवाहित होते हैं, वैसे ही विवाह-यज्ञ का विस्तृत विधान इन लोक-गीतों में सजीव रूप में दिखाई देता है। गणपति-पूजन से लेकर कन्या-विदाई तक, प्रत्येक चरण लोक-गीतों के माध्यम से मंगलमय बन जाता है।
गणपति के सात विश्राम-स्थलों की कल्पना—सरवर, उद्यान, बस्ती, तोरण, गृहस्थ स्त्रियाँ, मंडप और वर-वधू—मानव जीवन के सात सुख-सोपानों का प्रतीक है। यह परंपरा वैदिक काल से लोक-परंपरा तक निरंतर प्रवाहित रही है।
गनगौर और मातृ-देवी परंपरा

निमाड़ी लोक-गीतों में गनगौर और रणुबाई (रणणा देवी) का विशेष स्थान है। यह देवी परंपरा विश्व-मातृ देवी अम्बिका से जुड़ती है। सूर्य-उपासना, वैदिक कल्पनाएँ और लोक-आस्था—सब मिलकर स्त्री-जीवन की पवित्रता, शक्ति और सौंदर्य को प्रतिष्ठित करते हैं। रणुबाई केवल देवी नहीं, बल्कि प्रत्येक कन्या के रूप में विवाह-मंडप में विराजमान होती है।
धर्म, करुणा और समन्वय का लोक-स्वर

इस संग्रह में ऐसे गीत भी हैं जो भारतीय संस्कृति की मूल आत्मा—धर्म, अहिंसा और करुणा—को अत्यंत प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत करते हैं। गाय और सिंह का प्रसिद्ध लोक-गीत इसका अनुपम उदाहरण है, जहाँ सत्य, प्रेम और समर्पण के सामने हिंसा भी पराजित हो जाती है। यह गीत भारतीय जीवन-दर्शन की उस गहरी समझ को प्रकट करता है, जिसमें धर्म केवल उपदेश नहीं, बल्कि जीवन का स्वाभाविक अनुशासन है।
उपसंहार
ये लोक-गीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि मनोभावनाओं का कोमल इतिहास हैं। इनमें जीवन का उल्लास भी है और करुणा भी; संयोग भी है और वियोग भी; प्रेम भी है और त्याग भी। यही कारण है कि लोक-गीत आज भी जीवित हैं, क्योंकि उनका वास्तविक स्थान जीवन की भूमि पर है, मंचों तक सीमित नहीं।
यह संग्रह उसी जीवंत परंपरा का एक विनम्र प्रयास है—निमाड़ के स्वर को भारतीय लोक-संस्कृति के विराट आकाश में सम्मानपूर्वक प्रतिष्ठित करने का।


