लोक-संस्कृति, सामूहिक आनंद और मानवीय दर्शन की मधुर अभिव्यक्ति
मूल अध्यन साहित्य – “जब निमाड़ गाता है” – डॉ वासुदेवशरण अग्रवाल
लेखन संपादन – गीतेश कुमार भार्गव
निमाड़ में जन्म के गीत Since 1958
भूमिका
निमाड़ की लोक-संस्कृति में जन्म केवल एक परिवार की घटना नहीं, बल्कि पूरे समाज का उत्सव माना जाता है। यहाँ बच्चे का जन्म व्यक्तिगत सुख तक सीमित न रहकर सामूहिक आनंद, मानवीय गरिमा और सामाजिक सहभागिता का प्रतीक बन जाता है। यही कारण है कि निमाड़ में जन्म से जुड़े गीतों को विशेष सम्मान प्राप्त है और इन्हें “जच्चा के गीत” या “जन्म के गीत” कहा जाता है।
भारतीय परंपरा में जन्म से लेकर संस्कारों तक के सभी अनुष्ठानों में समाज की सहभागिता दिखाई देती है, किंतु निमाड़ अंचल में यह भाव और भी गहराई से प्रकट होता है। यहाँ घर के द्वार केवल सगे-संबंधियों के लिए नहीं, बल्कि अपरिचित जनों के लिए भी खुले रहते हैं। यह परंपरा यह दर्शाती है कि जन्म सम्पूर्ण मानवता की धरोहर है।
जन्म : व्यक्तिगत नहीं, सामाजिक उत्सव

निमाड़ की लोक-चेतना यह स्वीकार करती है कि
“जो जन्म लेता है, वह केवल किसी एक घर का नहीं होता,
वह समस्त मनुष्य समाज का गौरव बनकर जन्म लेता है।”इसी भाव को रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने भी रेखांकित किया है कि जन्म को यदि केवल घर की घटना माना जाए, तो उसका महत्व सीमित हो जाता है; किंतु जब समाज उसे जगत की घटना मानता है, तब वह ईश्वर के पूर्ण मंगल स्वरूप को प्रकट करता है।
निमाड़ में जन्म के समय घर के द्वार केवल सगे-संबंधियों के लिए नहीं, बल्कि अपरिचित, राहगीर और समाज के हर व्यक्ति के लिए खुले रहते हैं। यह परंपरा सामूहिकता और मानवीय एकता की सशक्त मिसाल है।
निमाड़ में जन्मोत्सव की परंपरा
निमाड़ में बच्चे का जन्म सुख, सौभाग्य और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। इस अवसर पर—
बधाइयाँ दी जाती हैं
मिठाइयाँ बाँटी जाती हैं
बाजे बजवाए जाते हैं
पूरे परिवार और समाज में हर्ष और उल्लास का वातावरण बनता है
इन अवसरों पर गाए जाने वाले गीतों को “जच्चा के गीत” कहा जाता है। इन गीतों में केवल खुशी ही नहीं, बल्कि सामाजिक रिश्तों, कर्तव्यों और आपसी अपनत्व का भी सुंदर चित्रण मिलता है।
“जच्चा के गीत” : जन्म का लोक-संस्कार

निमाड़ में जन्म अवसर पर गाए जाने वाले गीतों को “जच्चा के गीत” कहा जाता है।
इन गीतों में—
माता की पीड़ा का सम्मान
शिशु के आगमन का आनंद
परिवार की जिम्मेदारियाँ
समाज के प्रति कर्तव्य
—इन सभी भावों का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है।
जन्म-गीतों में पारिवारिक संबंधों का चित्रण
निमाड़ के जन्म-गीतों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनमें परिवार के हर सदस्य को संबोधित किया जाता है—ससुर, जेठ, देवर, ननदोई, स्वामी—और सभी को बच्चे के जन्म की शुभ सूचना दी जाती है।
🎶 जन्म-गीत ( निमाड़ी लोक-गीत )
बधाई बाबा नंन्द घर

न्हाई जs धोई देवी देवकी, ऑनs दियो पलंग पर पांव।
भोव्ठई दायण हो, धनकों ससुरो जगाव,
तुम जागो न ससराजी सुहावणा हो, गड़या ते गड़ीत्र हेड़ाव।
तुम्हारी बहुवर हो राजा, जायो नन्दलाल,
बधाई बाबा नन्द घर।भोवठई दायण हो, धन का जेंठ जगाव,
तुम जागो न जेठजी सुहावणा हो, नगर वस्त्र बटाव।
तुम्हारी बहुवर हो राजा, जायो नन्दलाल,
बधाई बाबा नन्द घर।भोव्ठई दायण हो, धन का देवर जगाव,
तुम जागो न देवरजी सुहावणा हो, नगर तमोव्ठ बटाव।
तुम्हारी भावज हो राजा, जायो नन्दलाल,
बधाई बाबा नन्द घर।भोव्ठई दायण हो, धन का नणदोई जगाव,
तुम जागो न नणदोई सुहावणा हो, नगर बजंत्र बजाव।
तुम्हारी बहुवर हो राजा, जायो नन्दलाल,
बधाई बाबा नन्द घर।भोव्ठई दायण हो, धन का स्वामी जगाव,
तुम जागो न स्वामी सुहावणा हो, दिया ते बवन।
तुम्हारी गोरी सम्हालो न हो राजा, जायो नन्दलाल,
बधाई बाबा नन्द घर।
जन्म-गीत 01 – बधाई बाबा नन्द घर
(निमाड़ी लोक-गीत)
अर्थ-व्याख्या
1️⃣ देवकी का स्नान और शुभ आरंभ
गीत की शुरुआत देवी देवकी के स्नान और शुद्धि से होती है। यह संकेत है कि अब घर में एक पवित्र और मंगल घटना घट चुकी है। देवकी पलंग पर पाँव रखती हैं, अर्थात प्रसव के बाद विश्राम की अवस्था में हैं। यह दृश्य बताता है कि ईश्वर-कृपा से पुत्र-जन्म हुआ है, और घर में शुभ समय आरंभ हो चुका है।
➡️ यहाँ जन्म को केवल शारीरिक घटना नहीं, बल्कि दैवी और आध्यात्मिक क्षण माना गया है।
2️⃣ ससुर को जगाने का भाव
दाई (दायण) से कहा जाता है कि वह सबसे पहले ससुर को जगाए। ससुर परिवार का वरिष्ठ और मर्यादा-पुरुष होता है। उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे प्रसन्न होकर—
धन निकालें
दान करें
समाज में आनंद बाँटें
➡️ इसका अर्थ है कि जन्म के साथ दान और पुण्य का आरंभ होना चाहिए।
3️⃣ “तुम्हारी बहू ने नन्दलाल को जन्म दिया”
हर अंतरे में दोहराया गया यह भाव बताता है कि—
बहू ने सुन्दर, तेजस्वी और ईश्वर-तुल्य बालक को जन्म दिया है
बालक को “नन्दलाल” कहा गया है, जो श्रीकृष्ण का प्रतीक है
➡️ इससे स्पष्ट होता है कि निमाड़ में हर पुत्र-जन्म को कृष्ण-जन्म के समान मंगलकारी माना जाता है।
4️⃣ जेठ को जगाने का भाव
अब दाई से कहा जाता है कि वह जेठ को जगाए।
जेठ परिवार में अनुशासन और मार्गदर्शन का प्रतीक होता है। उससे कहा जाता है कि—
नगर में वस्त्र बाँटे
सबको इस शुभ समाचार में सहभागी बनाए
➡️ यह संकेत है कि खुशी घर की सीमा में बंद न रहे, बल्कि पूरे समाज तक पहुँचे।
5️⃣ देवर को जगाने का भाव
इसके बाद देवर को जगाने का वर्णन है।
देवर युवा शक्ति और उत्साह का प्रतीक है। उससे अपेक्षा की जाती है कि—
नगर में तमोल (मिष्ठान/उपहार) बाँटे
सब जगह उल्लास फैलाए
➡️ यह दर्शाता है कि नवजीवन के स्वागत में युवा वर्ग भी सक्रिय भूमिका निभाए।
6️⃣ नणदोई को जगाने का भाव
फिर दाई से कहा जाता है कि वह नणदोई (बहन का पति) को जगाए।
नणदोई सामाजिक रिश्तों का विस्तार होता है। उससे कहा जाता है कि—
नगर में बाजे बजवाए
उत्सव का सार्वजनिक ऐलान करे
➡️ इसका भाव है कि जन्मोत्सव केवल घर का नहीं, पूरे नगर का पर्व बने।
7️⃣ स्वामी (पति) को जगाने का भाव
अंत में स्वामी, अर्थात शिशु के पिता को जगाने की बात आती है।
उनसे कहा जाता है कि—
दीप जलाएँ
घर की लक्ष्मी (पत्नी) और शिशु की देखभाल करें
➡️ यह दर्शाता है कि पिता की भूमिका केवल आनंद की नहीं, बल्कि कर्तव्य और संरक्षण की भी है।
8️⃣ दाई का महत्व
पूरे गीत में दाई को केंद्र में रखा गया है। वह—
संदेशवाहक है
संस्कारों की संरक्षिका है
लोक-परंपरा की वाहक है
➡️ यह दर्शाता है कि निमाड़ की लोक-संस्कृति में हर छोटे पात्र का भी बड़ा महत्व है।
9️⃣ सामाजिक और सांस्कृतिक संदेश
इस गीत का मूल संदेश है—
जन्म व्यक्तिगत घटना नहीं है
हर नया जीवन समाज की धरोहर है
खुशी बाँटने से बढ़ती है
दान, सेवा और सहभागिता जन्म का अनिवार्य अंग हैं
🔶 समग्र भाव
यह जन्म-गीत हमें सिखाता है कि—
“जब घर में बच्चा जन्म लेता है,
तो केवल एक परिवार नहीं,
पूरा समाज उत्सव मनाता है।”
निमाड़ का यह लोक-गीत मानवीय एकता, सामाजिक समरसता और ईश्वर-कृपा का जीवंत प्रतीक है।
(गीत आगे उसी रूप में प्रस्तुत है – जैसा आपने दिया है, बिना किसी परिवर्तन के)
👉 इन गीत-पंक्तियों में देवकी और नंद के माध्यम से कृष्ण-जन्म का रूपक दिखाई देता है, जिससे जन्म को दैवी और मंगलकारी माना गया है।
🎶 जन्म-गीत -02
(निमाड़ी लोक-गीत)

म्हरा घर मदनसिंह जलमियो।
हउँ तो जोसी घर भेजूँ बधाओ,
म्हारा घर पोथी – पुराण लई आवो।
पोथी वाचसे नानो – सो बालुड़ो,
पुराण वाचसे ओको बाप।
मारुणी न मदनसिंह जलमियो।
हउँ तो सोती घर भेजूँ बधाओ,
म्हारा घर कड़ा-तोड़ा लई आवो।
तोड़ा पेरसे नानो-सो बालुड़ो,
कड़ा पेरसे नाना को बाप।
मारुणी न मदनसिंह जलमियो।
हउँ तो बजाजी घर भेजूँ बधाओ,
म्हारा घर साड़ी-वागो लई आवो।
साड़ी पेरसे गा नाना की माय,
वागो पेरसे नाना को बाप।
मारुणी न मदनसिंह जलमियो।
हउँ तो दरजी घर भेजूँ बधाओ,
म्हारा घर झगो – टोपी लई आवो।
झगो पेरसे नानो -सो बालुड़ो,
टोपी पेरसे नाना को भाई।
मारुणी न मदनसिंह जलमियो।
हउँ तो बीराजी घर भेजूँ बधाओ,
म्हारा घर पंच-पेलो लई आवो।
पेली पेरसे नाना की माउली,
पचों बांधसे नाना को बाप।
मारुणी न मदनसिंह जलमियो।
हउँ तो सबई घर भेजूँ बधाओ,
म्हारा घर मदनसिंह जलमियो।
🎶 जन्म-गीत : “म्हरा घर मदनसिंह जलमियो”
विस्तृत भावार्थ (हिंदी में)
🔹 1. “म्हरा घर मदनसिंह जलमियो”
भावार्थ:
गायिका अत्यंत प्रसन्नता और गर्व के साथ यह घोषणा करती है कि उसके घर मदनसिंह नामक पुत्र का जन्म हुआ है। यह केवल नाम की घोषणा नहीं, बल्कि यह बताने का तरीका है कि घर में ईश्वर की कृपा से नया जीवन आया है।
यह पंक्ति पूरे गीत का केंद्र है, जो हर अंतरे के बाद दोहराकर आनंद और उल्लास को और गहरा करती है।
🔹 2. जोसी (ब्राह्मण) के घर बधाई भेजना
“हउँ तो जोसी घर भेजूँ बधाओ,
म्हारा घर पोथी-पुराण लई आवो।”
भावार्थ:
माँ सबसे पहले जोसी यानी ब्राह्मण के यहाँ बधाई भेजती है और उनसे पोथी-पुराण लाने का आग्रह करती है। इसका अर्थ है कि बच्चे के जीवन की शुरुआत ज्ञान, धर्म और संस्कारों से हो।
“पोथी वाचसे नानो-सो बालुड़ो,
पुराण वाचसे ओको बाप।”
➡️ यहाँ यह सुंदर भाव प्रकट होता है कि
बच्चा पढ़-लिखकर विद्वान बने
पिता धार्मिक ग्रंथों का पाठ कर परिवार को सही मार्ग दिखाए
यह निमाड़ की उस सोच को दर्शाता है जिसमें शिक्षा और संस्कार को जीवन की नींव माना गया है।
🔹 3. सोती (सुनार) के घर बधाई
“हउँ तो सोती घर भेजूँ बधाओ,
म्हारा घर कड़ा-तोड़ा लई आवो।”
भावार्थ:
अब माँ सुनार के यहाँ बधाई भेजती है और आभूषण मँगवाती है। यह संकेत है कि बच्चे का जीवन समृद्धि, सुरक्षा और वैभव से भरा हो।
“तोड़ा पेरसे नानो-सो बालुड़ो,
कड़ा पेरसे नाना को बाप।”
➡️ यहाँ पिता और पुत्र दोनों के लिए आभूषण का उल्लेख यह दर्शाता है कि परिवार में समान आनंद और सम्मान है।
🔹 4. बजाजी (कपड़ा व्यापारी) के घर बधाई
“हउँ तो बजाजी घर भेजूँ बधाओ,
म्हारा घर साड़ी-वागो लई आवो।”
भावार्थ:
माँ कपड़े वाले के यहाँ बधाई भेजती है और साड़ी-वागा (कोट) मँगवाती है।
“साड़ी पेरसे गा नाना की माय,
वागो पेरसे नाना को बाप।”
➡️ यहाँ वस्त्र मर्यादा, सम्मान और सामाजिक प्रतिष्ठा के प्रतीक हैं।
यह बताता है कि बच्चे के जन्म से माता-पिता दोनों का मान बढ़ता है।
🔹 5. दर्जी के घर बधाई
“हउँ तो दरजी घर भेजूँ बधाओ,
म्हारा घर झगो-टोपी लई आवो।”
भावार्थ:
दर्जी से बच्चे के लिए झगा और भाई के लिए टोपी मँगवाई जाती है।
“झगो पेरसे नानो-सो बालुड़ो,
टोपी पेरसे नाना को भाई।”
➡️ यह दर्शाता है कि बच्चे का जन्म केवल माता-पिता ही नहीं, बल्कि भाई-बहनों के लिए भी खुशी लेकर आता है। पूरा परिवार इस आनंद में सहभागी है।
🔹 6. बीराजी (भाई/करीबी संबंधी) के घर बधाई
“हउँ तो बीराजी घर भेजूँ बधाओ,
म्हारा घर पंच-पेलो लई आवो।”
भावार्थ:
यहाँ रिश्तेदारी और सामाजिक संबंधों का विस्तार दिखाई देता है। पीला वस्त्र और पगड़ी शुभता, मान-सम्मान और सौभाग्य के प्रतीक हैं।
“पेली पेरसे नाना की माउली,
पचों बांधसे नाना को बाप।”
➡️ इसका अर्थ है कि बच्चे के जन्म से माता और पिता दोनों को समाज में गौरव और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है।
🔹 7. सबके घर बधाई भेजने का भाव
“हउँ तो सबई घर भेजूँ बधाओ,
म्हारा घर मदनसिंह जलमियो।”
समग्र भावार्थ:
गीत का समापन इस विचार से होता है कि बधाई केवल कुछ लोगों तक सीमित न रहे, बल्कि पूरे समाज में बाँटी जाए।
यह निमाड़ की उस परंपरा को दर्शाता है जहाँ जन्म को व्यक्तिगत नहीं, सामूहिक उत्सव माना जाता है।
🌼 गीत का समग्र संदेश
इस गीत के माध्यम से निमाड़ की लोक-संस्कृति यह सिखाती है कि—
हर नया जन्म समाज की धरोहर है
ज्ञान, संस्कार, समृद्धि और संबंध—सब आवश्यक हैं
समाज का हर वर्ग बच्चे के जीवन से जुड़ा है
खुशी बाँटने से ही सच्चा उत्सव बनती है
✨ निष्कर्ष
“म्हरा घर मदनसिंह जलमियो” केवल एक जन्म-गीत नहीं, बल्कि निमाड़ की जीवन-दृष्टि का प्रतीक है।
यह गीत बताता है कि—
एक बच्चे का जन्म
पूरे परिवार और समाज के भविष्य का जन्म होता है।


