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प्यारी प्यारी  चुनरिया निरगुण भजन

प्यारी प्यारी चुनरिया | Nirguni Bhajan Lyrics

🎶 प्यारी प्यारी चुनरिया | Nirguni Bhajan Lyrics

           (निरगुण लोकगीत / भक्ति पद)

          गायक – गीतेश कुमार भार्गव       लेखक – श्री ब्रजमोहन जी चौकसे                                                                                                                                                                                                                                                                     

✍️ गीत परिचय

यह पद भारतीय निरगुण भक्ति परंपरा से जुड़ा हुआ एक गूढ़ और भावपूर्ण लोकगीत है। इसमें चुनरिया को आत्मा, प्रेम, भक्ति और ईश्वर से जुड़ाव का प्रतीक बताया गया है। करतार (ईश्वर) द्वारा बुनी गई यह चुनरिया पूरे संसार को ढँकती है और साधक को संसार से ऊपर उठाकर परमात्मा तक ले जाती है।


🪔 गीत के बोल

प्यारी प्यारी  चुनरिया निरगुण भजन

तुन खूब बुनि रे करतार, प्यारी प्यारी चुनरिया
जिसको ओढ़े है सब संसार, प्यारी प्यारी चुनरिया

पाँच तत्व का कतार लगाया, निरगुण रूपी रंग चढ़ाया
या तो करि रही भाव सी पार, प्यारी प्यारी चुनरिया

गणिका ओढ़ी, शिवरी न ओढ़ी, मीरा न ओढ़ क दुनिया छोड़ी
अपने जीवन की लिंया है संवार, प्यारी प्यारी चुनरिया

चुनरि ओढ़ी क पिया घर जाऊँ, लौटी न वापस फिर नहीं आऊँ
उनका हर पल करूँ दीदार, प्यारी प्यारी चुनरिया

एनी चुनार तो प्रेमी न ओढ़ी, गीत न ओढ़ी उद्धव न ओढ़ी
बुन बुनकर गुरु भरतार, प्यारी प्यारी चुनरिया

Tun khoob buni re Kartar, pyari pyari chunariya
Jisko odhe hai sab sansaar, pyari pyari chunariya

Paanch tatva ka kataar lagaya, nirgun roopi rang chadhaya
Ya to kari rahi bhaav se paar, pyari pyari chunariya

Ganika odhi, Shivri na odhi, Meera na odh ke duniya chhodi
Apne jeevan ki li hai sanvaar, pyari pyari chunariya

Chunari odhi ke piya ghar jaaun, lauti na vaapas phir nahi aaun
Unka har pal karun deedaar, pyari pyari chunariya

Aisi chunar to premi na odhi, Geet na odhi, Uddhav na odhi
Bun bunkar Guru bhartar, pyari pyari chunariya


📖 गीत का विस्तृत भावार्थ

यह निरगुण भजन ईश्वर (करतार) और जीवात्मा के गहरे आध्यात्मिक संबंध को चुनरिया के प्रतीक के माध्यम से प्रकट करता है। कवि कहता है कि करतार ने अत्यंत प्रेम और कुशलता से यह चुनरिया बुनी है, जिसे पूरा संसार ओढ़े हुए है। यह चुनरिया जीवन, माया और ईश्वर की रचना का प्रतीक है।

गीत में कहा गया है कि यह चुनरिया पाँच तत्वों—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—से बनी है और उस पर निरगुण भक्ति का रंग चढ़ा हुआ है। यह भक्ति साधक को संसारिक बंधनों से पार ले जाकर भाव-सागर से पार कर देती है।

अगले चरण में गणिका, शबरी और मीरा जैसे उदाहरण दिए गए हैं। गणिका और शबरी ने भक्ति भाव से इस चुनरिया को ओढ़ा, जबकि मीरा ने इसे ओढ़कर संसार ही त्याग दिया। यह दर्शाता है कि सच्ची भक्ति जीवन को संवार देती है और आत्मा को परमात्मा के समीप ले जाती है।

गीत में आत्मा के परम लक्ष्य का भी वर्णन है—जब साधक यह चुनरिया ओढ़कर पिया (परमात्मा) के घर पहुँच जाता है, तो फिर संसार में लौटने की इच्छा नहीं रहती। वह हर क्षण केवल ईश्वर के दर्शन में लीन रहना चाहता है।

अंत में कवि स्पष्ट करता है कि यह चुनरिया सामान्य प्रेमियों या ज्ञानी पुरुषों ने नहीं ओढ़ी, बल्कि गुरु-परंपरा द्वारा इसे बुना गया है। अर्थात् गुरु की कृपा और मार्गदर्शन से ही यह आध्यात्मिक वस्त्र प्राप्त होता है, जो जीव को मोक्ष के मार्ग पर ले जाता है।

निष्कर्ष

यह निरगुण भजन मानव जीवन के परम सत्य को अत्यंत सरल और भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करता है। चुनरिया यहाँ केवल वस्त्र नहीं, बल्कि भक्ति, गुरु-कृपा और आत्मा की शुद्ध यात्रा का प्रतीक है। कवि यह स्पष्ट करता है कि जब जीव गुरु के मार्गदर्शन में निरगुण भक्ति को अपनाता है, तब उसका जीवन संवर जाता है और वह संसारिक मोह-माया से ऊपर उठकर परमात्मा से जुड़ जाता है। यह भजन हमें सिखाता है कि सच्ची भक्ति बाहरी आडंबर नहीं, बल्कि भीतर के भाव, समर्पण और प्रेम से प्राप्त होती है। अंततः यही चुनरिया जीव को ईश्वर के द्वार तक पहुँचाकर मोक्ष की ओर ले जाती है।

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