निमाड़ी कलाकार

सुनता है गुरु ज्ञानी Raag Based Kabir Bhajan Lyrics | Live Kabir Mahotsav

सुनता है गुरु ज्ञानी Raag Based Kabir Bhajan Lyrics | Live Kabir Mahotsav

 

 भूमिका

“सुनता है गुरु ज्ञानी” संत कबीरदास जी की निर्गुण वाणी का एक अत्यंत गूढ़ और आध्यात्मिक भजन है। यह रचना साधक को नाद, बिंदु, शून्य, त्रिकुटी और गुरु–तत्त्व की अनुभूति कराती है।
कबीर महोत्सव के पावन अवसर पर इस भजन की राग आधारित, लाइव शास्त्रीय प्रस्तुति की गई है, जो स्वर्गीय पं. कुमार गंधर्व जी की गायकी परंपरा से प्रेरित है।

इस दुर्लभ प्रस्तुति का Live Video Recording
👉 गीतेश कुमार भार्गव द्वारा किया गया है, जिसे उनके YouTube चैनल पर प्रकाशित किया जा रहा है।

सुनता है गुरु ज्ञानी
सुनता है गुरु ज्ञानी

🎶 रचना: संत कबीरदास

🎼 शैली: राग आधारित निर्गुण भजन

🎤 प्रस्तुति: पंडित श्री कोमकली कालापिनी जी

🎵 प्रेरणा परंपरा: स्व. पं. कुमार गंधर्व

🎥 Live Video Recording: गीतेश कुमार भार्गव

📍 आयोजन: कबीर महोत्सव

सुनता है गुरु ज्ञानी
गगन में आवाज हो रही झीनी-झीनी

पहिले आए आए पहिले आए
नाद बिंदु से पीछे जमया पानी पानी हो जी
सब घट पूरण गुरु रह्या है
अलख पुरुष निर्बानी हो जी ॥1॥

वहां से आया पता लिखाया
तृष्णा तूने बुझाई बुझाई
अमृत छोड़सो विषय को धावे
उलटी फाँस फंसानी हो जी ॥2॥

गगन मंडलू में गौ भी आनी
भोई से दही जमाया जमाया
माखन माखन संतों ने खाया
छाछ जगत बापरानी हो जी ॥3॥

बिन धरती एक मंडल दीसे
बिन सरोवर जूँ पानी रे
गगन मंडलू में होए उजियाला
बोल गुरु-मुख बानी हो जी ॥4॥

ओऽहं सोऽहं बाजा बाजे
त्रिकुटी धाम सुहानी रे
इडा पिंगला सुषुमना नारी
सून ध्वजा फहरानी हो जी ॥5॥

कहत कबीरा सुनो भई साधो
जाय अगम की बानी रे
दिन भर रे जो नज़र भर देखे
अजर अमर वो निशानी हो जी ॥6॥


Sunta Hai Guru Gyani
Gagan mein awaaz ho rahi jheeni-jheeni

Pehile aaye aaye pehile aaye
Naad bindu se peechhe jamya paani paani ho ji
Sab ghat pooran guru rahya hai
Alakh purush nirbani ho ji ॥1॥

Wahan se aaya pata likhaya
Trishna toone bujhai bujhai
Amrit chhodso vishay ko dhaave
Ulti faans phansani ho ji ॥2॥

Gagan mandalu mein gau bhi aani
Bhoi se dahi jamaya jamaya
Makhan makhan santon ne khaya
Chhaachh jagat baparani ho ji ॥3॥

Bin dharti ek mandal deese
Bin sarovar joon paani re
Gagan mandalu mein hoye ujiyala
Bol guru-mukh baani ho ji ॥4॥

O’ham so’ham baaja baaje
Trikuti dhaam suhaani re
Ida pingala sushumna naari
Soon dhwaja phaharani ho ji ॥5॥

Kahat Kabira suno bhai saadho
Jaay agam ki baani re
Din bhar re jo nazar bhar dekhe
Ajar amar wo nishani ho ji ॥6॥


🔸 मुखड़ा

सुनता है गुरु ज्ञानी

      सुनता है गुरु ज्ञानी  , गगन में आवाज हो रही झीनी-झीनी

व्याख्या:
यहाँ “गगन” से आशय बाहरी आकाश नहीं, बल्कि अंतर आकाश (चित्त/चेतना) है।
“झीनी-झीनी आवाज” उस अनहद नाद की ओर संकेत है, जो ध्यान की गहराई में सुनाई देता है।
कबीर कहते हैं—इस सूक्ष्म ध्वनि को केवल वही सुन सकता है जो गुरु-ज्ञानी हो, यानी जिसने आत्मबोध प्राप्त कर लिया हो।

🔸 पद 1

पहिले आए आए पहिले आए
नाद बिंदु से पीछे जमया पानी पानी हो जी
सब घट पूरण गुरु रह्या है
अलख पुरुष निर्बानी हो जी

व्याख्या:
कबीर सृष्टि की उत्पत्ति की बात करते हैं।
“नाद” (ध्वनि) और “बिंदु” (बीज) से पहले भी एक अवस्था थी—जहाँ केवल चेतना थी।
“पानी जमना” सृजन की प्रक्रिया का प्रतीक है।
गुरु को वे सर्वव्यापी बताते हैं—जो हर घट (शरीर) में विद्यमान हैं।
गुरु ही वह अलख, निर्गुण पुरुष हैं, जिन्हें शब्दों में नहीं बाँधा जा सकता।


🔸 पद 2

वहां से आया पता लिखाया
तृष्णा तूने बुझाई बुझाई
अमृत छोड़सो विषय को धावे
उलटी फाँस फंसानी हो जी

व्याख्या:
यह पद आत्मिक यात्रा का संकेत देता है।
गुरु के मार्गदर्शन से साधक को अपने वास्तविक स्वरूप का “पता” मिलता है।
परंतु मन बार-बार विषय-वासनाओं की ओर भागता है और अमृत (आत्मिक रस) को छोड़ देता है।
“उलटी फाँस” का अर्थ है—इंद्रियों की बाह्य दौड़ को भीतर की ओर मोड़ना, जो कठिन साधना है।


🔸 पद 3

गगन मंडलू में गौ भी आनी
भोई से दही जमाया जमाया
माखन संतों ने खाया
छाछ जगत बापरानी हो जी

व्याख्या:
यह पूरा पद रूपक (प्रतीक) से भरा है।
“गौ” आत्मा है, “दूध” साधना का रस, “दही” ज्ञान की स्थिरता।
संत “माखन” यानी तत्त्वज्ञान को ग्रहण करते हैं।
जबकि सामान्य संसार “छाछ”—अर्थात् बाहरी आडंबर और अवशेष में उलझा रहता है।


🔸 पद 4

बिन धरती एक मंडल दीसे
बिन सरोवर जूँ पानी रे
गगन मंडलू में होए उजियाला
बोल गुरु-मुख बानी हो जी

व्याख्या:
यहाँ कबीर कहते हैं कि आत्मिक लोक भौतिक नियमों से परे है।
बिना धरती के मंडल है, बिना सरोवर के पानी है—यह अद्वैत अनुभव है।
यह उजियाला केवल गुरु-वाणी से ही प्रकट होता है,
अर्थात् सद्गुरु के शब्द से ही ज्ञान का प्रकाश मिलता है।


🔸 पद 5

ओऽहं सोऽहं बाजा बाजे
त्रिकुटी धाम सुहानी रे
इडा पिंगला सुषुमना नारी
सून ध्वजा फहरानी हो जी

व्याख्या:
“ओऽहं सोऽहं” का अर्थ है—मैं वही हूँ (आत्मा और परमात्मा की एकता)।
“त्रिकुटी” भ्रूमध्य का केंद्र है, जहाँ चेतना स्थिर होती है।
इड़ा, पिंगला और सुषुमना—योग की तीन प्रमुख नाड़ियाँ हैं।
जब साधना पूर्ण होती है, तो शून्य में ध्वजा—अर्थात् आत्मज्ञान की विजय—लहराती है।


🔸 पद 6

कहत कबीरा सुनो भई साधो
जाय अगम की बानी रे
दिन भर रे जो नज़र भर देखे
अजर अमर वो निशानी हो जी

व्याख्या:
कबीर साधकों को सावधान करते हैं—यह मार्ग अगम (दुर्गम) है।
जो व्यक्ति बाहरी दृश्य नहीं, बल्कि अंतर दृष्टि से देखता है,
वही अजर-अमर (आत्मतत्त्व) की पहचान कर पाता है।
यही आत्मज्ञान की अंतिम अवस्था है।


भजन का भावार्थ

इस भजन में कबीर साहब अंतर्नाद (झीनी-झीनी आवाज) की बात करते हैं—जो बाहरी कानों से नहीं, बल्कि अंतर चेतना से सुनी जाती है।
“नाद-बिंदु”, “गगन मंडल”, “त्रिकुटी”, “इड़ा-पिंगला-सुषुमना”—ये सभी योग और साधना के सूक्ष्म प्रतीक हैं।

कबीर कहते हैं कि गुरु सर्वत्र व्याप्त हैं, वही अलख और निर्गुण हैं।
जो साधक विषय-वासनाओं को छोड़कर उलटी दृष्टि करता है, वही अमृत का पान करता है।
अंत में कबीर यह संकेत देते हैं कि जो इस सत्य को पहचान ले, वही अजर–अमर हो जाता है।

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