निमाड़ी कलाकार

श्री गांगलेश्वर महादेव मंदिर – कसरावद रहस्य और आस्था का 13 हजार वर्ष पुराना इतिहास

निमाड़ की धरती पर स्थित श्री गांगलेश्वर महादेव का प्राचीन इतिहास

 

लेखक – किशोर कुमार भार्गव
संपादक – गीतेश कुमार भार्गव

मध्य प्रदेश के खंडवा संभाग अंतर्गत खरगोन जिले में स्थित कसरावद नगर निमाड़ क्षेत्र का एक ऐसा ऐतिहासिक और धार्मिक नगर है, जिसकी पहचान सदियों पुराने श्री गांगलेश्वर महादेव मंदिर से जुड़ी हुई है। यह मंदिर केवल आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि निमाड़ के प्राचीन इतिहास, पौराणिक कथाओं और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रमाण है।


श्री गांगलेश्वर महादेव मंदिर: परमारकालीन धरोहर

कसरावद नगर के बीच पहाड़ियों से घिरे क्षेत्र में स्थित श्री गांगलेश्वर महादेव मंदिर को परमारकालीन स्थापत्य से जोड़ा जाता है। लोक मान्यताओं और प्रचलित कथाओं के अनुसार, इस मंदिर का इतिहास लगभग 13 हजार वर्ष पुराना माना जाता है। यद्यपि यह काल निर्धारण ऐतिहासिक शोध का विषय है, परंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि यह मंदिर अत्यंत प्राचीन है और कई युगों का साक्षी रहा है।


पंच पांडवों की पूजा स्थल

स्थानीय जनमान्यता के अनुसार, पांचों पांडवों ने अपने अज्ञातवास या वनवास के दौरान स्वयं इस स्थान पर भगवान भोलेनाथ की पूजा की थी। इसी कारण यह स्थल विशेष रूप से पवित्र माना जाता है और आज भी श्रद्धालु यहां आकर मनोकामना पूर्ति के लिए जलाभिषेक करते हैं।


कैलाश कुंड और नाग-नागिन कुंड का रहस्य

कैलाश कुंड
कैलाश कुंड

मंदिर परिसर में एक समय कैलाश कुंड स्थित था, जिसे भगवान शिव के निवास कैलाश पर्वत का प्रतीक माना जाता था। दुर्भाग्यवश यह कुंड आज अतिक्रमण का शिकार हो चुका है और अपने अस्तित्व की अंतिम सांसें गिन रहा है।

इसके अतिरिक्त मंदिर के पास एक छोटा कुंड भी स्थित है, जिसके बारे में मान्यता है कि उसमें नाग-नागिन का जोड़ा स्नान करता है। लोक विश्वास है कि इस कुंड में स्नान करने से मनुष्य के शारीरिक और मानसिक कष्ट दूर होते हैं, और कई लोगों ने यहां चमत्कारी अनुभव होने की बात कही है।


हिरण्यगर्भा नदी का उद्गम स्थल

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, हिरण्यगर्भा नदी का उद्गम स्थल भी इसी क्षेत्र को माना जाता है। यह तथ्य इस स्थान के धार्मिक महत्व को और अधिक बढ़ा देता है। नदी का उल्लेख वैदिक और पौराणिक साहित्य में मिलता है, जिससे यह क्षेत्र प्राचीन काल से ही आध्यात्मिक गतिविधियों का केंद्र रहा है।


पहाड़ों के बीच बसा नगर और महेश्वर का दृश्य

श्री गांगलेश्वर महादेव मंदिर पहाड़ियों के बीच स्थित है। मंदिर की पहाड़ी की चोटी से देखने पर महेश्वर का ऐतिहासिक किला स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, जो निमाड़ की समृद्ध ऐतिहासिक धरोहर की एक और कड़ी को जोड़ता है।

इसी मंदिर के नाम पर यह नगर कसरावद के रूप में जाना गया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि इस स्थान की पहचान और अस्तित्व मंदिर से गहराई से जुड़ा हुआ है।


देवी अहिल्याबाई होलकर द्वारा जीर्णोद्धार

देवी अहिल्याबाई होलकर के कार्यकाल में जीर्णोद्धार
देवी अहिल्याबाई होलकर के कार्यकाल में जीर्णोद्धार

इतिहास में उल्लेख मिलता है कि माता देवी अहिल्याबाई होलकर के कार्यकाल में इस मंदिर का पुनः जीर्णोद्धार कराया गया था। इससे पहले मुगल आक्रांताओं द्वारा इस मंदिर को क्षति पहुंचाई गई थी। अहिल्याबाई होलकर ने न केवल इस मंदिर को पुनर्जीवित किया, बल्कि निमाड़ और मालवा क्षेत्र के कई धार्मिक स्थलों को संरक्षण भी प्रदान किया।


उपेक्षा, अतिक्रमण और संघर्ष

उपेक्षा, अतिक्रमण और संघर्ष
उपेक्षा, अतिक्रमण और संघर्ष

दुर्भाग्यवश, स्वतंत्रता के बाद यह मंदिर शासन-प्रशासन की उपेक्षा का शिकार हुआ। मंदिर की भूमि पर अवैध अतिक्रमण हुआ और धीरे-धीरे इसके अस्तित्व को समाप्त करने का प्रयास किया गया।

हालांकि पिछले कुछ वर्षों से श्री गांगलेश्वर मंदिर समिति एवं विभिन्न हिंदू संगठनों द्वारा शासन-प्रशासन के विरुद्ध एक निरंतर संघर्ष चलाया जा रहा है। इस प्रयास के परिणामस्वरूप मंदिर की भूमि से कुछ हद तक अवैध अतिक्रमण हटाया गया है और मंदिर की सीमाएं (बाउंड्री) निर्धारित की गई हैं, लेकिन पूर्ण सफलता अभी भी दूर है।


गांगलेश्वर मेले की परंपरा

कसरावद नगर में प्रत्येक वर्ष दिसंबर माह में लगने वाला प्रसिद्ध मेला भी इसी मंदिर के नाम पर प्राचीन काल से आयोजित होता आ रहा है। यह मेला केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है, जिसमें दूर-दूर से श्रद्धालु और व्यापारी भाग लेते हैं।


निष्कर्ष

श्री गांगलेश्वर महादेव मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि निमाड़ की आत्मा है। यह मंदिर इतिहास, आस्था, संघर्ष और संस्कृति का संगम है। आवश्यकता है कि इस धरोहर को पुरातात्विक संरक्षण, प्रशासनिक संवेदनशीलता और जन सहयोग के माध्यम से बचाया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस दिव्य और ऐतिहासिक स्थल की महिमा को अनुभव कर सकें।

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