नैहरवा
भजन | संत कबीर दास जी

✦ भजन परिचय
“नैहरवा हमका नहिं भावे” संत कबीर दास जी का एक गूढ़ और वैराग्य भाव से भरा भजन है। इस भजन में सांसारिक मोह, विरह वेदना और सद्गुरु की आवश्यकता को अत्यंत सरल लेकिन प्रभावशाली शब्दों में व्यक्त किया गया है। कबीर जी इस भजन के माध्यम से आत्मा की उस पुकार को सामने रखते हैं, जो परम सत्य और ईश्वर की ओर अग्रसर होना चाहती है।
✦ भजन के बोल
नैहरवा हमका नहिं भावे भजन
नैहरवा हमका नहिं भावे,
हमका नहिं भावै।
1.
साईं की नगरी परम अति सुंदर,
जहँ कोई जावे ना आवै।
चाँद सूरज जहाँ पवन ना पानी,
को संदेश पहुँचावे।
दरद यह साईं कौन सुनावै॥
2.
आगे चलो पंथ नहिं सूझै,
पीछै दोष लगावै।
केहि विधि ससुरे जाव मोरी सजनी,
बिरहा जोर जनावै।
विषय रस नाच नचावै॥
3.
बिन सद्गुरु अपनो नहिं कोई,
जो यह राह बतावै।
कहत कबीर सुनो भाई साधो,
अपने में प्रीतम पावै।
तपन यह जिय की बुझावै॥
Naiharwa Hamka Nahin Bhaave
Naiharwa hamka nahin bhaave,
hamka nahin bhaave.
1.
Saain ki nagari param ati sundar,
jahan koi jaave na aave.
Chaand suraj jahan pavan na paani,
kaun sandesh pahuchaave.
Darad yeh saain kaun sunaave.
2.
Aage chalo panth nahin soojhai,
peeche dosh lagaave.
Kehi vidhi sasure jaav mori sajni,
biraha zor janaave.
Vishay ras naach nachaave.
3.
Bin sadguru apno nahin koi,
jo yeh raah bataave.
Kahat Kabir suno bhai saadho,
apne mein preetam paave.
Tapan yeh jiya ki bujhaave.
नैहरवा हमका नहिं भावे व्याख्या – Gitesh kumar Bhargava
इस भजन में संत कबीर दास जी आत्मा की उस अवस्था को व्यक्त करते हैं, जहाँ उसे सांसारिक मोह-माया का संसार अब अच्छा नहीं लगता। यहाँ “नैहर” से तात्पर्य इस भौतिक संसार से है, जबकि “साईं की नगरी” परमात्मा का शाश्वत लोक है।
कबीर जी कहते हैं कि साईं की नगरी अत्यंत सुंदर है, वहाँ से कोई वापस नहीं आता। वहाँ न चाँद-सूरज हैं, न हवा-पानी—अर्थात वह स्थान भौतिक तत्वों से परे, शुद्ध आध्यात्मिक लोक है। उस लोक की पीड़ा और विरह को व्यक्त करने वाला भी कोई नहीं है, क्योंकि वह अनुभव शब्दों से परे है।
भजन के दूसरे पद में जीवन मार्ग की कठिनाइयों का वर्णन है। आगे बढ़ने पर सही रास्ता दिखाई नहीं देता और पीछे मुड़ने पर दोष और पछतावे का सामना करना पड़ता है। आत्मा अपने परमात्मा से मिलन के लिए व्याकुल है, लेकिन विषय-वासनाओं का आकर्षण उसे नाच नचाता रहता है और मार्ग से भटकाता है।
तीसरे पद में कबीर जी सद्गुरु की महिमा बताते हैं। वे कहते हैं कि सद्गुरु के बिना कोई अपना नहीं होता, क्योंकि वही सही मार्ग दिखा सकते हैं। अंत में कबीर जी साधकों को संबोधित करते हुए कहते हैं कि सच्चा प्रीतम बाहर नहीं, बल्कि अपने भीतर ही मिलता है। जब यह बोध हो जाता है, तब हृदय की जलन और आत्मिक पीड़ा शांत हो जाती है।



