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नर्मदा जयंती 2025 | मां रेवा 7 कल्पों से अमर

नर्मदा जयंती 2025 | मां रेवा 7 कल्पों से अमर

माघ मास में क्यों मनाई जाती है नर्मदा जयंती ?

लेखक – राजेश रेवलिया
संपादक – गीतेश कुमार भार्गव

मां रेवा 7 कल्पों से अमर

नर्मदा जयंती 2025 , मां रेवा 7 कल्पों से अमर

 

नर्मदा जयंती हिंदू धर्म की एक अत्यंत पावन एवं आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण तिथि है। यह पर्व माघ मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को अनादिकाल से श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ मनाया जाता आ रहा है। वर्ष 2025 में भी नर्मदा जयंती माघ शुक्ल सप्तमी को ही मनाई जाएगी।

नर्मदा जी का अवतरण क्यों माघ मास में हुआ?

धार्मिक ग्रंथों एवं पुराणों के अनुसार,
माघ मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी,
अश्विन नक्षत्र,
रविवार,
मकर राशि में सूर्य के स्थित रहते हुए,
मध्यान काल में
मां नर्मदा (रेवा) पृथ्वी पर प्रकट हुई थीं।

इसी दिव्य संयोग के कारण नर्मदा जयंती माघ शुक्ल सप्तमी को मनाने की परंपरा चली आ रही है। मां नर्मदा को जीवनदायिनी, मोक्षदायिनी एवं सिद्धिदायिनी माना गया है।

मां नर्मदा का आध्यात्मिक महत्व

मां नर्मदा का आध्यात्मिक महत्व

नर्मदा जी केवल एक नदी नहीं, बल्कि साक्षात शिवस्वरूपा मानी जाती हैं। शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि—

हरि, हर, सूर्य, चन्द्र, इन्द्र, वरुण, कुबेर, स्कंद, सनत्कुमार, नारद, नाचिकेत, वशिष्ठ, व्यास, कश्यप, गौतम, भारद्वाज, भृगु, याज्ञवल्क्य, मार्कण्डेय, पुरूरवा, हिरण्यरेता, गार्गेय, कंक सहित असंख्य
देवर्षि, महर्षि एवं राजर्षियों ने मां रेवा का जल सेवन कर उनके तट पर तपस्या की।

इन सभी ऋषियों ने यह अनुभव किया कि—
रेवा तट पर की गई तपस्या से सभी सिद्धियां सहज रूप से प्राप्त हो जाती हैं।
इसी कारण मां नर्मदा को “सिद्धिदायिनी मां रेवा” कहा गया है।

नर्मदा तट के प्रसिद्ध तीर्थ और ज्योतिर्लिंग

 

पुराणों में नर्मदा तटवर्ती अनेक पवित्र तीर्थों का वर्णन मिलता है, जिनमें प्रमुख हैं—

  • ओंकारेश्वर एवं ममलेश्वर 

ओंकारेश्वर एवं ममलेश्वर

  • शूलपाणीश्वर

शूलपाणीश्वर

  • गरुड़ेश्वर

गरुड़ेश्वर

  • हंसेश्वर

हंसेश्वर

  • विमलेश्वर

विमलेश्वर

  • महेश्वर

महेश्वर

  • मण्डलेश्वर

मण्डलेश्वर

  • सिद्धनाथ एवं ऋद्धनाथ

  • बद्रिकाश्रम

  • व्यास, अनसूया, भृगु क्षेत्र

“नर्मदा के कंकर सब शंकर”— यह कथन नर्मदा जी की सर्वत्र शिवमय उपस्थिति को प्रमाणित करता है।

नर्मदा परिक्रमा और मार्कण्डेय ऋषि की कथा

नर्मदा जी की प्रथम परिक्रमा महर्षि मार्कण्डेय ने
तीन वर्ष, तीन महीने और तेरह दिन में पूर्ण की थी।
इस दौरान उनमें अहंकार उत्पन्न हो गया, जिसे मां नर्मदा ने नष्ट कर दिया।

इसके पश्चात मार्कण्डेय ऋषि ने पुनः नर्मदा परिक्रमा तथा छोटी-छोटी नदियों की परिक्रमा की, जिसमें उन्हें सात वर्ष का समय लगा। यह कथा विनम्रता और भक्ति का महान संदेश देती है।

नर्मदा नाम का रहस्य – न मरने वाली

पुराणों के अनुसार प्रलय काल में समस्त नदियां और सागर नष्ट हो जाते हैं,
किन्तु सात कल्पों तक भी रेवा नष्ट नहीं हुईं।

इसी कारण उनका नाम पड़ा—
नर्मदा (न + मर + दा) अर्थात न मरने वाली।

नर्मदा स्नान का फल

जो व्यक्ति विधिपूर्वक—

  • नर्मदा स्नान

  • दान

  • जप

  • हवन

  • अर्चन

  • सेवा

आदि करता है, वह अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्यफल प्राप्त करता है।

नर्मदा जल का सेवन करने वाला व्यक्ति पाप समूह से मुक्त होकर अंततः
जन्म-मरण के बंधन से छूटकर मोक्ष पद को प्राप्त करता है।

यहां तक कि जो जीव नर्मदा तट पर मृत्यु को प्राप्त होता है,
वह मूक, जड़ या अज्ञानी होने पर भी स्वर्गगामी होता है।

नर्मदा जयंती 2025 का संदेश

नर्मदा जयंती हमें यह स्मरण कराती है कि मां रेवा केवल जलधारा नहीं,
बल्कि भक्ति, तप, त्याग और मोक्ष की सजीव धारा हैं।

इस पावन अवसर पर नर्मदा संरक्षण, स्वच्छता और श्रद्धा के साथ पूजन ही
मां नर्मदा के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।

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