निमाड़ी कलाकार

निमाड़ में - विवाह के गीत

निमाड़ में – विवाह के गीत 1952

निमाड़ में विवाह के गीत

संपादक – गीतेश कुमार भार्गव

निमाड़ में - विवाह के गीत 1952
निमाड़ में – विवाह के गीत 1952

लोक-संस्कृति, भावनाओं और रिश्तों का जीवंत उत्सव

निमाड़ अंचल में विवाह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं होता, बल्कि यह पूरे समाज, परिवार और पीढ़ियों को जोड़ने वाला एक सांस्कृतिक अनुष्ठान होता है। यहाँ विवाह के गीत सिर्फ गाए नहीं जाते, बल्कि वे रिश्तों की मर्यादा, प्रेम, सम्मान और सामाजिक मूल्यों को स्वर देते हैं।

महान साहित्यकार रवीन्द्रनाथ ठाकुर के शब्दों में—
विवाह कोई साधारण घटना नहीं, बल्कि मानव-समाज का एक मजबूत स्तम्भ है।
निमाड़ के लोकगीत इस विचार को जीवंत रूप में प्रस्तुत करते हैं।


जब निमाड़ गाता है…

सामान्य जीवन में जिन्हें दुनिया तुच्छ समझती है—वही वर और वधू विवाह के दिन राजा-रानी बन जाते हैं।
फूलों की सजावट, वेद-मंत्रों का उच्चारण और लोकगीतों की मधुर ध्वनि—सब मिलकर इस दिन को अलौकिक बना देते हैं।

निमाड़ी विवाह गीतों में वर-वधू का सम्मान केवल आभूषणों से नहीं, बल्कि रस, भावना और लोक-विश्वास से किया जाता है।


पाँच बधाइयाँ : रिश्तों का मधुर गीत

निमाड़ के विवाह गीतों में “पाँच बधाइयाँ” एक अत्यंत लोकप्रिय और भावनात्मक गीत है।
यह गीत विवाह के अवसर पर उन पाँच बधाइयों का वर्णन करता है जो—

  1. श्वसुर के घर से

  2. पिता के घर से

  3. जेठ के घर से

  4. भाई के घर से

  5. और सबसे महत्वपूर्ण—माँ की कोख से जुड़ी होती हैं

इन बधाइयों के माध्यम से गीत यह संदेश देता है कि विवाह केवल पति-पत्नी का नहीं, बल्कि पूरे परिवार और रिश्तों का साझा उत्सव है।

इस गीत में माँ की ममता, बहन की ललक, भाई का स्नेह और ससुराल की स्वीकृति—सब कुछ एक साथ झलकता है।


गीतों में झलकता नारी सम्मान

निमाड़ी विवाह गीतों की सबसे बड़ी विशेषता है—नारी का सम्मान
चाहे वह माँ हो, बहन हो, भाभी हो या छोटी बहू—हर रिश्ते को गीतों में आदर और स्नेह के साथ प्रस्तुत किया गया है।

“सोना-चाँदी नहीं माँगते,
मन तो छोटी बहू के गहनों में लगा है”—
यह पंक्ति बताती है कि यहाँ भावनात्मक रिश्ता, भौतिक वस्तुओं से कहीं ऊपर है।


नई रीत, पुरानी परंपरा

विवाह तय होते ही निमाड़ में “खन-मादी” की रस्म होती है।
गाँव की महिलाएँ गीत गाते हुए पवित्र मिट्टी लाती हैं,
जिससे हाथ से बने चूल्हे और कोठियाँ तैयार की जाती हैं।

यहीं से विवाह का शुभारंभ होता है—
और साथ ही गूँजते हैं नई रीत के बधाई गीत

इन गीतों में नरवरगढ़ का चूड़ा, सूर्य का प्रकाश, सास-ससुर का स्वागत, माता-पिता का आशीर्वाद—सब कुछ लोककाव्य की तरह सजा होता है।


लोकगीत जो पीढ़ियों को जोड़ते हैं

निमाड़ी विवाह गीत सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक धरोहर हैं।
ये गीत हमें बताते हैं कि रिश्तों की जड़ें कितनी गहरी होती हैं और समाज किस तरह मिलकर एक नए जीवन की शुरुआत करता है।

आज डिजिटल युग में भी, जब ये गीत मंचों, यूट्यूब और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में गूँजते हैं—
तो लगता है कि निमाड़ आज भी गा रहा है… पूरे गर्व और प्रेम के साथ।


निमाड़ में विवाह के गीत : विरह से उल्लास तक की लोक-अभिव्यक्ति

निमाड़ अंचल में विवाह केवल एक सामाजिक संस्कार नहीं, बल्कि भावनाओं, प्रतीकों और लोक-आस्थाओं से जुड़ा एक जीवंत उत्सव है। यहाँ के विवाह गीत जीवन के हर रंग को समेटे हुए होते हैं—विरह, प्रतीक्षा, श्रद्धा, आनंद और अंततः उल्लास। इन गीतों के माध्यम से परिवार, संबंध और परंपरा का गहरा भाव प्रकट होता है।

विवाह के शुभ कार्यों की शुरुआत में जब परिवार के सभी सदस्य उपस्थित नहीं होते, तब घर सूना-सूना सा लगने लगता है। यही भाव निमाड़ी विवाह गीतों में अत्यंत मार्मिक रूप से व्यक्त होता है। गीत में यह दर्शाया गया है कि माता-पिता, भाई-बहिन के बिना विवाह का हर आयोजन अधूरा प्रतीत होता है।

इस गीत की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि पारिवारिक संबंधों को रामायण के आदर्श पात्रों से जोड़ा गया है—
पिता को दशरथ, माता को कौशल्या, भाइयों को राम-लक्ष्मण और बहिन को सुभद्रा के रूप में संबोधित किया गया है। यह उपमाएँ लोकगीत को न केवल भावनात्मक बनाती हैं, बल्कि उसे सांस्कृतिक गरिमा भी प्रदान करती हैं।

विरह की अवस्था के गीत

जब अपने प्रिय जन नहीं आते, तब गीत के बोल कुछ इस प्रकार भाव प्रकट करते हैं—

“जी हो आज म्हारों पटसाछ सूनो लागे,
नहीं आया म्होरा दशरथ बाप,
हरखत पगरण आरंभियो।”

“जी हो आज म्हारो पालणो सूनो लागे,
नहीं आई म्हारी कौशल्या माय,
हरखत पगरण आरंभियो।”

“जी हो आज म्हारो मंडप सूनो लागे,
नहीं आया म्हारा राम-लछमण बीरा,
हरखत पगरण आरंभियो।”

“जी हो आज म्हारी आरती सूनी लागे,
नहीं आई म्हारी सुभद्रा बेण,
हरखत पगरण आरंभियो।”

इन पंक्तियों में विवाह से पहले की वह मनःस्थिति झलकती है, जहाँ शुभ कार्य तो आरंभ हो जाता है, लेकिन अपनों की अनुपस्थिति मन को व्यथित कर देती है। इसके बाद परंपरानुसार गणेश पूजन किया जाता है, जिससे विघ्न दूर हों और शुभ आगमन हो।

उल्लास और मंगल की अवस्था

उल्लास और मंगल की अवस्था
उल्लास और मंगल की अवस्था

गणेश पूजन के पश्चात जब परिवार के सभी सदस्य उपस्थित होते हैं, तब वही सूना घर उल्लास से भर उठता है। गीत का स्वर बदल जाता है और आनंद झलकने लगता है—

“जी हो आज म्हारी पटसाछ लहलहे,
आया म्हारा दशरथ बाप,
हरखत पगरण आरंभियो।”

“जी हो आज म्हारो पालणो लहलहे,
आई म्हारी कौशल्या माय,
हरखत पगरण आरंभियो।”

“जी हो आज म्हारो मंडप लहलहे,
आया म्हारा राम-लछमण बीरा,
हरखत पगरण आरंभियो।”

“जी हो आज म्हारी आरती लहलहे,
आई म्हारी सुभद्रा बेण,
हरखत पगरण आरंभियो।”

अब वही घर, वही आँगन, वही मंडप खुशियों से भर जाता है। विवाह के सभी संस्कार उत्साह और मंगल भाव के साथ सम्पन्न होते हैं। गीत में यह स्पष्ट हो जाता है कि अपनों की उपस्थिति ही विवाह को पूर्ण बनाती है।

१९५२ में प्रकाशित एक निमाड़ी साहित्य ” जब निमाड़ गाता है ” निमाड़ी विवाह गीतों के लिए यहाँ क्लिक करे

 

 

निष्कर्ष –

निमाड़ के विवाह गीत लोकजीवन की आत्मा हैं। ये गीत केवल गाए नहीं जाते, बल्कि जिए जाते हैं। इनमें परिवार का महत्व, धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक प्रतीक और मानवीय संवेदनाएँ गहराई से रची-बसी हैं। विरह से उल्लास तक की यह यात्रा ही निमाड़ी विवाह गीतों को अद्वितीय और कालजयी बनाती है।

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