निमाड़ी कलाकार

निमाड़ में व्रत -उत्सव के गीत आस्था और गीतों का जीवन्त संसार

निमाड़ में व्रत -उत्सव के गीत आस्था और गीतों का जीवन्त संसार

निमाड़ में व्रत -उत्सव के गीत आस्था और गीतों का जीवन्त संसार

संपादक – गीतेश कुमार भार्गव

निमाड़ में व्रत -उत्सव के गीत

निमाड़ की व्रत–उत्सव परंपरा : लोक-जीवन, आस्था और गीतों का संगम

लोक-साहित्य की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसमें व्यक्ति नहीं, बल्कि लोक-मानस गाया जाता है। जब कोई देवता, पात्र या संबंध लोक की अनुभूति से जुड़ जाता है, तब वह अलौकिक न रहकर लोकजीवन का अंग बन जाता है। श्री विद्यानिवास मिश्र के शब्दों में, राम, कृष्ण, शिव, पार्वती, सीता, यशोदा या देवकी—लोक-साहित्य के मैदान में उतरते ही अपनी राजसी गरिमा छोड़कर लोक का बाना धारण कर लेते हैं। यही कारण है कि लोक-साहित्य की देव-सृष्टि अमानवीय या अपार्थिव नहीं लगती, बल्कि हमारे सुख-दुःख की सहभागी बन जाती है।

निमाड़ अंचल की व्रत–उत्सव परंपरा इसी लोक-भावना का सजीव उदाहरण है। यहाँ व्रत केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि स्त्री-जीवन की अनुभूति, पारिवारिक रिश्तों और सामुदायिक एकता का उत्सव हैं। हर व्रत, हर पर्व अपने साथ गीत, कथाएँ और लोकाचार लेकर आता है।

स्त्री-जीवन और व्रतों का लोक-संसार

निमाड़ में व्रत केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि स्त्री-जीवन की अनुभूतियों का सांस्कृतिक मंच हैं। हड़तालिका तीज, करवाचौथ, आखाती तीज और करवा जैसे व्रतों में शिव-पार्वती या पति-पत्नी का संबंध लोक-रूप में सामने आता है। यहाँ शिव कैलासवासी नहीं, बल्कि गृहस्थ पति हैं, और पार्वती तपस्विनी के साथ-साथ लोक-नारी का प्रतीक बन जाती हैं।
हड़तालिका तीज के गीतों में नारी की तपस्या, सौभाग्य की कामना और सखी-संवाद के भाव मिलते हैं। वहीं आखाती तीज को नए कामों, विवाह और शुभ आरंभ का प्रतीक मानते हुए उल्लासपूर्ण गीत गाए जाते हैं।

राखी और इरोस : रिश्तों की लोक-अभिव्यक्ति

राखी और इरोस : रिश्तों की लोक-अभिव्यक्ति
राखी और इरोस : रिश्तों की लोक-अभिव्यक्ति

निमाड़ में रक्षाबंधन (राखी) केवल भाई-बहन के रिश्ते तक सीमित नहीं रहता। इस अवसर पर गाए जाने वाले गीतों में भाई की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और दूर बसे भाई की याद का करुण स्वर मिलता है।
इसी प्रकार इरोस जैसे स्त्री-व्रतों में सखी-सहेलियों का सामूहिक भाव उभरता है। गीतों में मायके की स्मृति, ससुराल की जिम्मेदारियाँ और नारी-मन की कोमल पीड़ा सहज रूप से व्यक्त होती है।

करवाचौथ ,भाई दूज और पारिवारिक रिश्ते

करवाचौथ ,भाई दूज और पारिवारिक रिश्ते
करवाचौथ ,भाई दूज और पारिवारिक रिश्ते

करवाचौथ निमाड़ में दाम्पत्य संबंधों का लोक-पर्व है। इसमें पति की लंबी आयु की कामना के साथ-साथ नारी की आशंका, प्रतीक्षा और विश्वास के स्वर गीतों में उभरते हैं।
भाई दूज में बहन-भाई का रिश्ता केवल रक्त-संबंध नहीं रहता, बल्कि सुरक्षा, स्नेह और सामाजिक भरोसे का प्रतीक बन जाता है। इस दिन गाए जाने वाले गीतों में मायके की स्मृतियाँ और दूर बसे भाई की याद विशेष रूप से झलकती है।

एकादशी, पूर्णिमा और अमावस्या : लोक-आस्था का चक्र

एकादशी, पूर्णिमा और अमावस्या निमाड़ में केवल तिथियाँ नहीं, बल्कि लोक-जीवन की लय हैं। एकादशी के व्रत में विष्णु या कृष्ण लोक-नायक के रूप में आते हैं—ऐसे नायक जो गृहस्थ जीवन की कठिनाइयों को समझते हैं।
पूर्णिमा पर चंद्रमा को संबोधित गीतों में विरह, प्रतीक्षा और सौंदर्य का अद्भुत मिश्रण मिलता है, जबकि अमावस्या के गीत जीवन के अंधकार और आशा—दोनों को स्वर देते हैं।

श्रावण सोमवार और लक्ष्मी माता उद्यापन

श्रावण सोमवार और लक्ष्मी माता उद्यापन
श्रावण सोमवार और लक्ष्मी माता उद्यापन

श्रावण सोमवार निमाड़ की स्त्रियों के लिए विशेष महत्व रखता है। शिव यहाँ कैलासवासी नहीं, बल्कि गृहस्थ शिव हैं—पति, पिता और लोक-रक्षक। गीतों में पार्वती का शिव से संवाद लोक-नारी की अपनी कामनाओं और समर्पण का प्रतीक बन जाता है।
लक्ष्मी माता के उद्यापन में समृद्धि केवल धन तक सीमित नहीं रहती; वह घर की सुख-शांति, संतानों के स्वास्थ्य और आपसी प्रेम का रूप ले लेती है। इन अवसरों पर गाए जाने वाले गीत स्त्री की आशा और विश्वास को स्वर देते हैं।

तिथियाँ, प्रकृति और लोक-लय

एकादशी, पूर्णिमा, अमावस्या और सामौती अमावस्या निमाड़ के लोक-जीवन की लय निर्धारित करती हैं। सामौती अमावस्या को पितृ-स्मरण, नदी-स्नान और सामूहिक शांति की कामना से जोड़ा जाता है।
संक्रांति का पर्व ऋतु परिवर्तन और कृषि-चक्र से जुड़ा है। तिल, गुड़ और नए अन्न के साथ गाए जाने वाले गीत लोक-समृद्धि और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता को व्यक्त करते हैं।

नर्मदा जयंती :नर्मदा माँ और लोक जीवन
नर्मदा जयंती :नर्मदा माँ और लोक जीवन

निमाड़ की आत्मा माँ नर्मदा में बसती है। नर्मदा जयंती पर गाए जाने वाले गीतों में नर्मदा केवल नदी नहीं, बल्कि माँ, सखी और संरक्षिका बन जाती हैं। लोक-गीतों में नर्मदा लोक-दुःख हरने वाली, खेतों को जीवन देने वाली और मानव को शुद्ध करने वाली शक्ति के रूप में उपस्थित रहती हैं।

पोला, डोड़गलाई और कृषक जीवन

पोला, डोड़गलाई और कृषक जीवन
पोला, डोड़गलाई और कृषक जीवन

पोला पर्व और डोड़गलाई निमाड़ के कृषि-जीवन से जुड़े पर्व हैं। बैलों की पूजा, खेतों की स्मृति और पशुधन के प्रति कृतज्ञता इन पर्वों के गीतों में स्पष्ट दिखाई देती है। ये पर्व बताते हैं कि निमाड़ का लोक-जीवन प्रकृति और श्रम से किस गहराई से जुड़ा है।

निष्कर्ष

निमाड़ की व्रत–उत्सव परंपरा लोक-साहित्य की उसी जीवंत परंपरा का विस्तार है, जहाँ देवता लोक के हो जाते हैं और लोक-जीवन देवत्व से आलोकित हो उठता है। इन व्रतों के गीतों में स्त्री-मन की कोमलता, पारिवारिक संबंधों की ऊष्मा और सामूहिक जीवन की आत्मा समाई हुई है। यही कारण है कि ये लोक-व्रत आज भी जीवित हैं—क्योंकि वे परंपरा नहीं, बल्कि लोक-अनुभूति का सतत प्रवाह हैं।

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