मृत्यु 1अमर सत्य : निमाड़ के काया-खोजी मसाण्या गीतों का लोक-दर्शन

मृत्यु शरीर का अनिवार्य धर्म है। जो जन्म लेता है, उसका अंत सुनिश्चित है। भारतीय दर्शन ने इस कटु सत्य को केवल शोक या भय का विषय नहीं माना, बल्कि इसे जीवन का एक गहन बोध, एक संस्कार और एक आध्यात्मिक उत्सव के रूप में स्वीकार किया है। शरीर नश्वर है, आत्मा अमर—इसी मूल तत्त्व के इर्द-गिर्द भारतीय लोकजीवन की असंख्य कथाएँ, गाथाएँ और गीत रचे गये हैं।
निमाड़ अंचल इस दृष्टि से अद्वितीय है कि यहाँ मृत्यु को केवल विदाई नहीं, बल्कि आत्मा की अमर यात्रा का मंगल अवसर माना जाता है। यही कारण है कि निमाड़ में मृत्यु के समय गाये जाने वाले गीत—मसाण्या गीत—लोक-आध्यात्मिक परम्परा की अत्यन्त गूढ़ और रहस्यात्मक अभिव्यक्ति हैं।
मसाण्या गीतों की परम्परा
‘मसाण्या’ शब्द का अर्थ है—श्मशान से सम्बन्धित गीत। निमाड़ में जब किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है, तब आत्मा की अमरता, शरीर की क्षणभंगुरता और संसार की निस्सारता को प्रकट करते हुए ये गीत गाये जाते हैं। यह परम्परा केवल निमाड़ तक सीमित नहीं, बल्कि कोरकू, मुरिया और गोंड जैसी आदिम जनजातियों में भी दसगात्र के अवसर पर मृत्यु-गीतों के रूप में जीवित है।
निमाड़ में मसाण्या गीतों की दो प्रमुख धाराएँ मिलती हैं—
यात्रान्त मसाण्या गीत – जो शवयात्रा के साथ घर से श्मशान तक गाये जाते हैं |

काया-खोजी मसाण्या गीत – जो मृत्यु के दसवें या तेरहवें दिन ‘सवा घड़ा’ अनुष्ठान में गाये जाते हैं।

लोकविश्वास है कि मृत्यु के बाद आत्मा दस से तेरह दिन तक अपनी देह की खोज में घर-आँगन में भटकती रहती है। इसी खोज की वेदना और रहस्य को स्वर देने वाले गीतों को ‘काया खोज’ के गीत कहा जाता है। अंततः आत्मा अपनी चिरपरिचित काया से नहीं मिल पाती और अनन्त में विलीन हो जाती है। ‘सवा घड़ा’ आत्मा-मुक्ति का लोकानुष्ठान है।
काया-खोज : लोक-आध्यात्म का अद्भुत विधान

काया-खोजी मसाण्या गीतों में शरीर और आत्मा के बीच संवाद मिलता है। आत्मा को दुल्हन, बंजारी या विरहिणी के रूप में चित्रित किया जाता है, जो अपनी काया की खोज में भटक रही है। इन गीतों में भारतीय योग-साधना और संत-परम्परा के गूढ़ तत्त्व—राग-विराग, सबद, अणहद, तिरवेणी, सूरत, अष्टकमल, सहस्त्रार—के साथ-साथ निमाड़ी लोक के अपने विशिष्ट शब्द और प्रतीक—हंसा, जीवड़ा, अमरगढ़, दसद्वार, दुलरी, चलावा, सासरिया, चूंदड़, सतगुरु—प्रयोग में आते हैं।
शव के जलने तक शरीर का सांगोपांग वर्णन गीतों के माध्यम से करना विश्व की विरल लोकपरम्पराओं में से एक है। यह परम्परा मृत्यु को भय नहीं, बल्कि आत्म-ज्ञान का अवसर बनाती है।
डोला और मृत्यु का सामाजिक स्वरूप
निमाड़ में किसी वृद्ध, प्रतिष्ठित, साधु-संत या लोकमान्य व्यक्ति की मृत्यु पर शवयात्रा गाते-बजाते निकाली जाती है, जिसे ‘डोला निकालना’ कहा जाता है। इसे मोक्ष-प्राप्ति का संकेत माना जाता है—
“चलो छुटका गति हुर्ह”
अर्थात् आत्मा बंधन से मुक्त हो गई।
वहीं अवयस्क, युवा या असामयिक मृत्यु पर यह धूमधाम नहीं होती। यह भेद लोक-समाज की संवेदनशील दृष्टि को दर्शाता है।
मसाण्या गीतों का दार्शनिक सार
मसाण्या गीतों में बार-बार यह बोध कराया जाता है कि यह शरीर हड्डी-माँस का पिंजरा है—
हाड़ मास का बणा रे पींजरा, भीतर भर्या भंगारा
जोबन धन पावणा दिन चारा…
यह गीत मनुष्य को समझाता है कि यौवन, धन और वैभव चार दिन के मेहमान हैं। पशुओं की खाल से बाजे बन जाते हैं, पर मनुष्य का शरीर तो अंततः जलकर भस्म हो जाता है। इसलिए अभिमान व्यर्थ है।
कबीर की वाणी के माध्यम से मसाण्या गीत संसार की निस्सारता, अहंकार के विनाश और भक्ति के महत्व को उद्घाटित करते हैं। रावण और रत्नाकर समुद्र के उदाहरण यह सिखाते हैं कि घमण्ड अंततः पतन का कारण बनता है।

लेखक की कलम से –
निमाड़ के काया-खोजी मसाण्या गीत केवल मृत्यु के गीत नहीं हैं, बल्कि वे जीवन के परम सत्य का लोक-दर्शन हैं। ये गीत मनुष्य को यह बोध कराते हैं कि जीवन क्षणभंगुर है, शरीर नश्वर है और आत्मा अमर। मृत्यु यहाँ अन्त नहीं, बल्कि आत्मा की मुक्ति-यात्रा का पड़ाव है।
निमाड़ी मसाण्या गीत भारतीय आध्यात्म की वह लोकधारा हैं, जहाँ दर्शन शास्त्र नहीं, बल्कि गीत बनकर जन-जन के जीवन में उतर आता है।


