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निमाड़ी विवाह गीत आंगणा मं किच्चड़ सखिबाई – Nimadi Lyrics

निमाड़ी विवाह गीत आंगणा मं किच्चड़ सखिबाई – Nimadi Lyrics

संपादक – गीतेश कुमार भार्गव

निमाड़ी विवाह गीत आंगणा मं किच्चड़ सखिबाई
निमाड़ी विवाह गीत आंगणा मं किच्चड़ सखिबाई

लोक-संस्कृति पर आधारित

भारतीय लोक-जीवन में स्नान केवल शारीरिक शुद्धि नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक उत्सव भी रहा है। विशेष रूप से राजपरिवारों और संपन्न परिवारों में स्नान के समय गीत, विधि और विशेष वस्तुओं का प्रयोग किया जाता था। ऐसे अवसरों पर गाए जाने वाले गीतों में प्रकृति, समाज, परिवार और बालक के प्रति प्रेम झलकता है।

लोकगीतों में कई बार प्रश्न और उत्तर की शैली अपनाई जाती है—जैसे आंगन में कीचड़ होने का कारण पूछा जाता है और फिर स्नेहपूर्वक बताया जाता है कि यह किसी राजकुमार या लाड़ले बालक के स्नान से हुआ है। इससे समाज की सोच, बालक के प्रति आदर और उत्सव का भाव प्रकट होता है।


निमाड़ी विवाह गीत आंगणा मं किच्चड़ सखिबाई – आंगन का कीचड़ और लोक-स्नान परंपरा गीत

आंगन का कीचड़ और लोक-स्नान परंपरा गीत
आंगन का कीचड़ और लोक-स्नान परंपरा गीत

स्नान-गीत  

समाज नी गरज्यो सखिबाई, मेहुलड़ो सो बरस्यो आज,
आंगणा मं किच्चड़ सखिबाई, किन्‍न कियो जी ।
मोठाजी भाई को लाड़क छोरो, सवा घड़ो नहाव राज,
आंगणा मं किच्चड़ सखिबाई, उन्‍न कियो जी।

गहूँ रे चणा केरो उगारुणो, आंवरी तिल्‍ली को तेल,
रायजादां बढठया उगासणो, आवो म्हांरा पिताजी तुम देखो,
तुम देखो हम, सुख होय,रायजादा बठया उगासणो।


गीत का भावार्थ

सखी पूछती है—
आज आंगन में कीचड़ कैसे हो गया?
न तो बिजली चमकी, न बादल गरजे,
फिर पानी कहाँ से आया?

उत्तर मिलता है—
घर का लाड़ला, कुल का दीपक,
दूध से स्नान कर रहा है।
उसके स्नान के जल से ही
पूरा आंगन भीग गया है।

स्नान के लिए
गेहूँ और चने का उबटन तैयार है,
उसमें तिल्ली का तेल मिला है।
राजदुलारा स्नान के लिए बैठा है।

पिता से कहा जाता है—
आइए, अपने पुत्र को स्नान करते देखिए,
केवल देखने मात्र से
हृदय में सुख और मंगल भर जाता है।


सांस्कृतिक व्याख्या

1. कीचड़ का प्रतीकात्मक अर्थ

यहाँ कीचड़ गंदगी नहीं, बल्कि उत्सव और समृद्धि का प्रतीक है। यह बताता है कि घर में खुशी है, जीवन है, और परंपरा जीवित है।

2. बालक को राजा का सम्मान

लोक-समाज में बालक को ईश्वर का रूप माना गया है। स्नान के समय उसे राजा की तरह सम्मान देना स्नेह, सुरक्षा और भविष्य की कामना को दर्शाता है।

3. स्नान की वस्तुएँ
  • गेहूँ-चना उबटन: शुद्धता और पोषण का प्रतीक

  • तिल्ली का तेल: आरोग्य और समृद्धि
    इन वस्तुओं का प्रयोग यह दिखाता है कि लोक-जीवन प्रकृति से कितना जुड़ा हुआ है।

4. पिता की उपस्थिति

पिता को बुलाकर स्नान दिखाना इस बात का संकेत है कि
परिवार की खुशी सामूहिक अनुभव है,
और संतान का सुख पूरे घर का सुख होता है।


निष्कर्ष

यह लोकगीत और उससे जुड़ी परंपरा हमें सिखाती है कि
छोटी-छोटी दैनिक क्रियाएँ भी
जब प्रेम, सम्मान और संस्कृति से जुड़ जाती हैं,
तो वे उत्सव बन जाती हैं

आंगन का कीचड़ यहाँ अव्यवस्था नहीं,
बल्कि जीवन की चहल-पहल और
परिवार की खुशहाली का प्रमाण है।

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