निमाड़ अंचल की लोक-संस्कृति में विवाह केवल एक सामाजिक संस्कार नहीं, बल्कि भावनाओं, रिश्तों और परंपराओं का जीवंत उत्सव होता है। मामेरा पेरावणी जैसे गीतों में मायके–ससुराल, भाई–बहन, पूर्वजों और परिवार के बीच के गहरे स्नेह को शब्दों और स्वरों में पिरोया गया है। यहाँ प्रस्तुत गीत पूर्णतः परम्परागत निमाड़ी लोकगीत हैं, जो निमाड़ के गाँवों में गाए जाने की परंपरा से प्राप्त हुए हैं। इन गीतों के भाव, प्रतीक और सांस्कृतिक संदर्भों को समझकर उनकी संक्षिप्त व्याख्या गितेश कुमार भार्गवद्वारा की गई है, ताकि आज की पीढ़ी निमाड़ी लोकगीतों की आत्मा, संवेदनशीलता और सामाजिक मूल्यों से जुड़ सके।
हे हंस ! तुम उड़कर जाओ
हे हंस ! तुम उड़कर जाओ
उड़ी हंस , उड़ी हंस, म्हारा पीयर जाजो।
न म्हारा पीयर की पत्रिका लावजो ॥।
बड़ मं जड़ होय तो कोपल भी आव।
घह मं कस होय तो रोटी भी आव।
कपास म बस होय तो सूत जी निसर।
बयण म गुण होय तो वीराजी आव॥
संक्षिप्त व्याख्या
यह निमाड़ी लोकगीत विरह, संदेश और आशा की भावनाओं को व्यक्त करता है। गीत में हंस पक्षी को दूत मानकर उससे आग्रह किया गया है कि वह उड़कर मायके (पीयर) जाए और प्रिय का संदेश लेकर आए। हंस की उड़ान प्रतीक है मन की व्याकुलता और दूरी को पाटने की इच्छा का।
आगे के पदों में प्रकृति और जीवन के सहज उदाहरण दिए गए हैं—जैसे बड़े वृक्ष में जड़ हो तो कोपल अवश्य आती है, घर में अन्न हो तो रोटी बनती है, कपास में बीज हो तो सूत निकलता है। इसी तरह यदि संबंधों में गुण और प्रेम हो, तो प्रिय अवश्य मिलने आएगा। यह गीत निमाड़ी लोक-संस्कृति में भरोसे, प्रतीक्षा और प्रेम की गहरी भावना को सरल प्रतीकों के माध्यम से प्रकट करता है।
चूनर लावजे
चूनर लावजे
बहइण का आँगणा म॑ पिपछई रे वीरा चूनर लावजे ॥
लाव तो सब सारू लावजे रे वीरा, नई तो रहेजे
अपणा देश ।
माड़ी जाया, चनर लावजे॥
सपत थोड़ी, विपत घणी हो बइण, कसी पत आऊं
थारा द्वार ।
माड़ी जाई, कसी पत आऊंँ थारा द्वार ॥
भावज रो कंकण गयणा मेल जे रे वीरा, चूनर लावजे।
असी पत् आवजे म्हारा द्वार, माड़ी जाया, चुनर लावजे ||
संक्षिप्त व्याख्या :
यह निमाड़ी लोकगीत बहन के स्नेह, अपनापन और भाई से की गई विनती को व्यक्त करता है। बहन अपने भाई (वीरा) से कहती है कि वह उसके आँगन में आकर चूनर लाए। चूनर यहाँ प्रेम, सम्मान और सौभाग्य का प्रतीक है। बहन आग्रह करती है कि यदि चूनर लानी हो तो अच्छी और सुंदर लाए, अन्यथा अपने देश ही रह जाए—यह पंक्ति भाई-बहन के रिश्ते में छेड़छाड़ और आत्मीयता को दर्शाती है।
गीत में बहन अपने जीवन की कठिन परिस्थितियों का उल्लेख भी करती है—सुख कम और विपत्तियाँ अधिक हैं, ऐसे में वह किस तरह भाई के द्वार तक आ पाए। अंत में भावज के कंगन-गहनों का उल्लेख कर यह संकेत दिया गया है कि पूरे परिवार की शुभता और रिश्तों की गरिमा बनी रहे। यह गीत निमाड़ी लोक-संस्कृति में भाई-बहन के अटूट प्रेम, भरोसे और भावनात्मक जुड़ाव को सरल और मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करता है।
पूर्वजो के लिए विवाह संदेसा
पूर्वजो के लिए विवाह संदेसा
सरग भवन्ति हो गिरधरनो, एक सन्देशों लई जाव ॥।
सरग का अमुक दाजी क थो कयजो, तुम घर अमुक
को ब्याव ॥।
जेम सर थो म सारजो हो, हमारो तो आवणो नी होय ॥।
जड़ी दिया ब्रज किवाड़, अग्गल जडी लुहा की जी ॥
संक्षिप्त व्याख्या :
यह निमाड़ी लोकगीत विरह और असमर्थता की भावना को व्यक्त करता है। गायक गिरधर (कृष्ण) से विनती करता है कि वह स्वर्ग जाकर एक संदेश पहुँचा दे। उस संदेश में किसी अपने दाजी को यह कहलवाया जाए कि घर में विवाह का आयोजन है, परंतु स्वयं गायक वहाँ आ पाने में सक्षम नहीं है।
गीत में कहा गया है कि चाहे स्वर्ग जैसा सुंदर स्थान ही क्यों न हो, वह भी यहाँ के अपने घर-परिवार से बढ़कर नहीं लगता। अंत की पंक्तियों में ब्रज के किवाड़ों और लोहे की अगल का उल्लेख बंधन और दूरी का प्रतीक है, जो यह दर्शाता है कि परिस्थितियों ने उसे रोक रखा है। यह गीत निमाड़ी लोक-संस्कृति में अपनापन, पारिवारिक लगाव और विवश विरह को भावपूर्ण ढंग से प्रकट करता है।
Author Thought
निमाड़ी लोकगीतों की यही विशेषता है कि वे साधारण शब्दों में असाधारण भाव व्यक्त करते हैं। मामेरा पेरावणी के ये गीत प्रेम, विरह, संदेश, आशा और पारिवारिक बंधनों को सहज लोक-प्रतीकों के माध्यम से जीवित रखते हैं। आज के बदलते समय में इन गीतों को सहेजना और समझना केवल सांस्कृतिक दायित्व नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़े रहने का माध्यम भी है। इन पारंपरिक गीतों की व्याख्या के माध्यम से यह प्रयास है कि निमाड़ की लोक-धरोहर आने वाली पीढ़ियों तक अपनी पूरी गरिमा, भावनात्मक गहराई और सांस्कृतिक पहचान के साथ पहुँचती रहे।