तो नव दिन पीयर हम जावां जी GANGAUR GEET – LYRICS 1952

भूमिका –
यह लोकगीत निमाड़ अंचल की समृद्ध लोक-संस्कृति और स्त्री-जीवन की गहरी भावनाओं को अभिव्यक्त करता है। गीत में रानी रनुबाई के माध्यम से एक ऐसी नारी की छवि उभरती है जो मातृत्व, धर्म, संयम और सामाजिक मर्यादा के बीच अपने मन के भाव व्यक्त करती है।
निमाड़ी लोकगीतों में स्त्री के संवाद, पीहर-ससुराल का द्वंद्व, संतान के प्रति ममता और देवी-भाव का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। यह गीत भी उसी परंपरा का सजीव उदाहरण है, जहाँ रानी रनुबाई पीहर जाने की इच्छा व्यक्त करती हैं और देव-संवाद के माध्यम से उन्हें संयम का संदेश दिया जाता है।
तो नव दिन पीयर हम जावां जी GANGAUR GEET – LYRICS 1952
नव दिन पियर हम जावां जी
अगर चन्दन का बण्या रे किवाड़,
बावन चन्दन की कोठ्ड़ी,
कोठड़ी मं बठया राणी रनुबाई नार हो,
बाळा कुबवर की मावली ।
भोळा हो धणियेर, भोळा तुम्हारों राज,
नव दिन पियर हम जावां जी ।
तुम देवी मूरख गवार,
नव दिन पीयर मत जाओ।
तपs तपs चेत केरो घाम,
कड़ी को बाळौ कुम्हलई जासे ।
तुम्हारा बाळा ख राखो तुम्हारा पास,
नव दिन पियर हम जावां जी ॥
तो नव दिन पीयर हम जावां जी GANGAUR GEET – LYRICS 1952

To nav din Piyar hum jaavaan ji
Agar chandet ka banya re kivaad,
Baavan chandan ki kothdi,
Kothdi man bathya Rani Ranubai naar ho,
Baala Kubvar ki maavli.
Bhola ho dhaniyer, bhola tumharo raaj,
To nav din piyar hum jaavaan ji.
Tum devi moorakh gawaaar,
Nav din piyar mat jaao.
Tapas tapas chet kero ghaam,
Kadi ko baalo kumhlai jaase.
Tumhara baala kha raakho tumhara paas,
Nav din piyar hum jaavaan ji.
विस्तृत भावार्थ BY Gitesh Kumar Bhargava

1. चंदन की कोठड़ी और राजसी वैभव
गीत की शुरुआत अत्यंत सौंदर्यपूर्ण कल्पना से होती है—
“अगर चन्दत का बण्या रे किवाड़,
बावन चन्दन की कोठड़ी…”
यहाँ चंदन से बने किवाड़ और कोठड़ी राजसी वैभव, पवित्रता और शीतलता के प्रतीक हैं। चंदन भारतीय परंपरा में शुभता और दिव्यता का संकेत माना जाता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि रानी रनुबाई साधारण स्त्री नहीं, बल्कि उच्च कुल और देवी-स्वरूपा नारी हैं।
2. रानी रनुबाई और मातृत्व भाव
“कोठड़ी मं बठया राणी रनुबाई नार हो,
बाळा कुबवर की मावली”
इस पंक्ति में रानी रनुबाई को बालक कुंवर की माता के रूप में दर्शाया गया है। यहाँ मातृत्व सबसे प्रमुख भाव बनकर उभरता है। लोकगीत यह बताता है कि नारी का सबसे बड़ा धर्म उसका मातृत्व है, जो उसे देवी के समान पूजनीय बनाता है।
3. पीहर जाने की इच्छा – स्त्री मन की व्यथा
“भोळा हो धणियेर, भोळा तुम्हारों राज,
तो नव दिन वियर हम जावां जी”
यहाँ रानी अपने भोले-भाले पति/स्वामी से विनम्र आग्रह करती हैं कि उन्हें नौ दिनों के लिए पीहर जाने की अनुमति दी जाए। यह भाव भारतीय लोकगीतों में बार-बार दिखाई देता है, जहाँ विवाहित स्त्री अपने मायके के प्रति भावनात्मक जुड़ाव व्यक्त करती है।
4. देवी का उपदेश – संयम और कर्तव्य
“तुम देवी मूरख गवार,
नव दिन पीयर मत जाओ”
यहाँ देवी या दैवी चेतना रानी को समझाती है। रानी को देवी-स्वरूप मानते हुए उनसे कहा जाता है कि अभी पीहर जाना उचित नहीं है। यह संवाद आंतरिक विवेक और सामाजिक कर्तव्य का प्रतीक है।
5. तप, धूप और बालक की चिंता
“तपस तपस चेत केरो घाम,
कड़ी को बाळौ कुम्हलई जासे”
यह पंक्तियाँ कठिन समय, तपस्या और तेज धूप का संकेत देती हैं। आशय यह है कि यदि रानी चली गईं तो नन्हा बालक कठिन परिस्थितियों में कुम्हला जाएगा। यहाँ मातृत्व की जिम्मेदारी सर्वोपरि दिखाई गई है।
6. अंतिम संदेश – संतान ही सर्वोच्च धर्म
“तुम्हारा बाळा ख राखो तुम्हारा पास,
नव दिन पियर हम जावां जी”
गीत का निष्कर्ष अत्यंत मार्मिक है। रानी को यह समझाया जाता है कि संतान की रक्षा और पालन ही उनका प्रथम कर्तव्य है। पीहर जाने की इच्छा को त्याग कर मातृत्व को अपनाने का संदेश दिया गया है।
निष्कर्ष
यह लोकगीत केवल एक कथा नहीं, बल्कि निमाड़ी समाज की सोच, मूल्य और स्त्री-सम्मान का प्रतिबिंब है। इसमें स्त्री को देवी, माता और गृहिणी—तीनों रूपों में सम्मान दिया गया है।
रानी रनुबाई का चरित्र त्याग, ममता और धर्म का प्रतीक बनकर उभरता है, जो इस गीत को भावनात्मक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बनाता है।



