निमाड़ी गणगौर के परंपरागत 4 गीत – LYRICS 1952

“निमाड़ी गणगौर गीत – LYRICS 1952”
यह संग्रह निमाड़ अंचल की उस समृद्ध लोकपरंपरा को समर्पित है, जिसमें गणगौर पर्व स्त्री-संवेदनाओं, लोकआस्था और सांस्कृतिक स्मृतियों के साथ जीवंत होता है। इसमें संकलित छह पारंपरिक निमाड़ी गणगौर गीत पीढ़ियों से गाए जाते रहे हैं—घर-आंगन, कुएँ-तलाई, साज-श्रृंगार और सुहाग की कामनाओं के बीच।
इन गीतों की भाषा सरल निमाड़ी है, जिसमें प्रकृति, नारी मन, लोकदेवियाँ और सामाजिक जीवन के बिंब सहज रूप से उभरते हैं। LYRICS 1952 शीर्षक के अंतर्गत प्रस्तुत यह संग्रह न केवल लोकगीतों के शाब्दिक रूप को सुरक्षित करता है, बल्कि निमाड़ की सांस्कृतिक पहचान और गणगौर परंपरा की आत्मा को भी संजोकर रखता है—ताकि आने वाली पीढ़ियाँ इस लोकविरासत से जुड़ सकें।
1-रनूबाई का अंगणा मं ताड़ को झाड़

रनूबाई का अंगणा मं ताड़ को झाड़
माता ताड़ को झाड़ , वहां रहे देवी को रहेवास |
माता आड़ी रुळ तो घागरो, न कड़ी रुळता केश,
माता गोदी लियो बालुड़ो , न पेलो पेरी जाय ।
Runubai ka angna mein taad ko jhaad
Runubai ka angna mein taad ko jhaad,
Maata taad ko jhaad, wahan rahe devi ko rehvaas.
Maata aadi rul to ghaghro, na kadi rulta kesh,
Maata godi liyo baludo, na pelo peri jaay.
2-माता समुन्दर की झबर सुहाणी लाग हो

माता समुन्दर की झबर सुहाणी लाग हो।
माता झबर झबर रथ हिलोला लेय,
रत्नाकर आम्बो मौरियों | ।
माता रथ मं सी राणी रनुबाई काई बोल
माता कुण म्हारो आणो लई जाय
माता दूर का अमुक भाई मानवी हो
माता ऊ तुम्हारो आणो लई जाये
माता समुन्दर की झबर सुहाणी लाग हो॥
Maata samundar ki jhabar suhaani laag ho
Maata jhabar jhabar rath hilola ley,
Ratnaakar aambo mauriyon.
Maata rath mein si raani Runubai kai bol,
Maata kun mharo aano lai jaay?
Maata door ka amuk bhai maanvi ho,
Maata oo tumharo aano lai jaaye.
Maata samundar ki jhabar suhaani laag ho.
3-दुधन भरी तलावडी

दुधन भरी तलावडी, लोणी बाधी पाळ
वहां मोला धशणियेर नहावणा कर
रनुबाई हुआ पनियार
न्हावतज घोवत मथों मथयों, कुण घर जासा भेजवान,
कुण घर अम्बा आमली, कुण घर दाड़िम अनार,
ऊ घर सूखा केवड़ा हो, रन॒वाई मेहका लेय ।
दूर का अमुक भाई अरज कर , उन् घर हुसा भेजवान ॥
Dudhan bhari talaavdi
Dudhan bhari talaavdi, loni baadhi paal,
Wahan mola dhashaniyer nahaavna kar,
Runubai hua paniyaar.
Nhavatj ghovat mathon mathyon,
Kun ghar jasa bhejvaan?
Kun ghar amba aamli,
Kun ghar daadim anaar?
Oo ghar sukha kevda ho,
Runubai mehka ley.
Door ka amuk bhai araj kar,
Un ghar husa bhejvaan.
4-राणी रनुबाई हो

तुम देवों रजा घर जावां,
राणी रनुबाई हो॥
चूल्हा पर खीचड़ी खद-बद ,
राणी रनुबाई हो॥
अंगार सीज दाल ,
राणी रनु बाई हो॥
ससराजी सूता द्वार,
राणी रनुबाई हो॥
सासूजी दीसे गाळ,
राणी रनु बाई हो ॥
म्हारा स्वामी सोया सुख सेज,
राणी रनु बाई हो॥
तुम देवों रजा घर जावां,
राणी रनु बाई हो ॥
Raani Runubai ho
Tum devon raja ghar jaavaan,
Raani Runubai ho॥
Choolha par khichdi khad-bad,
Raani Runubai ho॥
Angaar seej daal,
Raani Runubai ho॥
Sasraaji soota dvaar,
Raani Runubai ho॥
Saasuji deese gaal,
Raani Runubai ho॥
Mharo swami soya sukh sej,
Raani Runubai ho॥
Tum devon raja ghar jaavaan,
Raani Runubai ho॥
गणगौर के चारों गीतों का भावार्थ – By GiteshKumar Bhargava
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1. रनूबाई का अंगणा मं ताड़ को झाड़ — भावार्थ
इस गीत में माता रनूबाई को एक देवी स्वरूप में प्रस्तुत किया गया है।
उनके आँगन में ताड़ का वृक्ष है, जो पवित्रता और स्थायित्व का प्रतीक है। उसी ताड़ के नीचे देवी का वास माना गया है।
माता का पहनावा अत्यंत सादा है—
घाघरा उलझा हुआ है, केश खुले हैं, फिर भी उनमें कोई असंयम नहीं, बल्कि मातृत्व की सहजता है।
वे अपनी गोद में बालक को लिए हुए हैं और उसे छोड़ना नहीं चाहतीं।
भाव:
यह गीत माता रनूबाई के मातृत्व, करुणा और देवी रूप को दर्शाता है।
सादगी में भी दिव्यता है—यही इस पद का मुख्य भाव है।
2. माता समुन्दर की झबर सुहाणी लाग हो — भावार्थ
इस गीत में माता रनूबाई को समुद्र तट की सुंदर हवा (झबर) से जोड़ा गया है।
समुद्र की लहरों के बीच माता का रथ हिलोरें ले रहा है—यह देवी की दिव्य यात्रा का संकेत है।
रत्नाकर (समुद्र) और आम्र-वृक्ष की मौरियाँ समृद्धि और सौभाग्य का प्रतीक हैं।
रथ में बैठी राणी रनूबाई पूछती हैं—
“मुझे कौन लेने आएगा?”
तब दूर का अमुक भाई आगे आकर कहता है—
“मैं तुम्हें लेने आऊँगा।”
भाव:
यह गीत मायके से ससुराल या देवी के आगमन-प्रस्थान की कथा कहता है।
भाई-बहन के स्नेह, सम्मान और सामाजिक रिश्तों की मधुरता इसमें झलकती है।
3. दुधन भरी तलावड़ी — भावार्थ
यह गीत अत्यंत लोकजीवन और स्त्री-संवेदना से जुड़ा है।
दूध से भरी तलावड़ी और मजबूत पाल समृद्ध गांव का चित्र खींचते हैं।
माता रनूबाई स्नान करती हैं और पानी भरने वाली (पनिहार) बन जाती हैं।
स्नान करते समय वे सोचती हैं—
मुझे किस घर भेजा जाएगा?
किस घर में आम-इमली होंगी?
किस घर में दाड़िम-अनार होंगे?
जिस घर में भले ही सूखा केवड़ा हो,
पर वहां से माता की सुगंध फैल जाती है।
अंत में दूर का अमुक भाई विनती करता है कि माता को उसी घर भेजा जाए।
भाव:
यह गीत नारी के भाग्य, विवाह, घर-परिवर्तन और उसके सौभाग्य को दर्शाता है।
माता जहां जाती हैं, वहां सुगंध, मंगल और समृद्धि फैल जाती है—यही देवी तत्व है।
4. राणी रनुबाई हो — भावार्थ
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यह गीत विवाहित स्त्री की मर्यादा और कर्तव्य को दर्शाता है।
राणी रनूबाई घर जाने की अनुमति माँगती हैं।
घर का हर दृश्य सामने है—
चूल्हे पर खिचड़ी उबल रही है
दाल अंगारों पर सिज रही है
ससुर द्वार पर सो रहे हैं
सास गाली देती प्रतीत होती है
पति सुख से शय्या पर सो रहा है
इन सबके बीच भी राणी रनूबाई अपने कर्तव्यों से विमुख नहीं होतीं और मर्यादा में बंधी रहती हैं।
भाव:
यह गीत नारी की सहनशीलता, त्याग और पारिवारिक संतुलन का प्रतीक है।
गणगौर में यह स्त्री के गृहस्थ जीवन और उसकी आस्था को उजागर करता है।



