हो देवी – निमाड़ी परम्परागत गणगौर गीत 1952 Lyrics

यह रचना “हो देवी (नारी – जीवन का एक करुण चित्र)” लोकभाषा में कही गई उस पीड़ा की कथा है, जिसे नारी सदियों से मौन होकर सहती आई है। इसमें एक स्त्री का जीवन, उसकी विवशता, सामाजिक असमानता, और रिश्तों के नाम पर उस पर ढाए गए अत्याचारों का मार्मिक चित्रण है। पीपल के पेड़ से लेकर चादर-पिछोड़ी, माय-बाप और मावसी के उल्लेख तक—हर प्रतीक नारी के संघर्ष, असहायता और टूटते विश्वास को उजागर करता है।
यह गीत केवल एक कथा नहीं, बल्कि समाज से एक प्रश्न है—जब अपने ही साथ छोड़ दें, तब नारी का सहारा कौन बने? कलयुग में मानवीयता की तलाश करती यह रचना पाठक और श्रोता के हृदय को झकझोरती है, और नारी के दर्द, उसकी गरिमा तथा उसके अधिकारों पर गंभीर चिंतन के लिए विवश करती है।
हो देवी ( नारी – जीवन का एक करुण चित्र )

उच्चो सो पीप्पल कोपळयो हो देवी,
वहाँ बढ़ी गाय गोठाण।
चादर पिछोड़ी को गाळणो हो देवी,
रनवाई भात लई जाय।
आवतज धनियर जी न देख्या हो राजा,
मोड़ी लीनी कनिएर सोठी।
एक जो मारी, न दूसरी न हो राजा,
तीसरी म जोड़या दुई हाथ।
जो तुम धनियर सोठी मारसो हो राजा,
नहीं म्हारो माय न बाप।
नहीं हमारी माय न मावसी हो राजा,
कुण म्हारो आणों लई जाय।
कलयुग म अमुक भाई मानवी राजा,
ऊ तुम्हारा आणो लई जाय।
अमुक भाई दीसे तुमक वाजुट हो राजा,
लाड़ीबाई लागसे तुम्हारा पांय।
हो देवी – निमाड़ी परम्परागत गणगौर गीत 1952 Lyrics
Ho Devi (Naari – Jeevan ka ek Karun Chitra)
Ucho so peepal kopalyo ho devi,
Wahan badhi gaay gothaan.
Chaadar pichhodi ko gaalno ho devi,
Ranwaai bhaat lai jaay.
Aavatj dhaniyar ji na dekhya ho raja,
Modi leeni kaniyer sothi.
Ek jo maari, na doosri na ho raja,
Teesri mein jodya dui haath.
Jo tum dhaniyar sothi maarso ho raja,
Nahin mharo maay na baap.
Nahin humaari maay na maavsi ho raja,
Kun mharo aano lai jaay.
Kalyug mein amuk bhai maanvi raja,
Oo tumhaaro aano lai jaay.
Amuk bhai deese tumak waajut ho raja,
Laadibaai laagse tumhaara paany
गीत का भावार्थ

यह लोकगीत नारी के जीवन की उस करुण सच्चाई को सामने लाता है, जहाँ उसका अस्तित्व संघर्ष, सहनशीलता और अकेलेपन से घिरा रहता है। गीत में प्रयुक्त प्रत्येक पंक्ति प्रतीकात्मक है और स्त्री की सामाजिक स्थिति को उजागर करती है।
1.
“उच्चो सो पीप्पल कोपळयो हो देवी,
वहाँ बढ़ी गाय गोठाण।”
पीपल का ऊँचा और छायादार पेड़ जीवन, आस्था और समाज का प्रतीक है। उसके नीचे बना गोठान बताता है कि यह कथा किसी एक स्त्री की नहीं, बल्कि पूरे समाज की है। यहाँ नारी जीवन के केंद्र में होते हुए भी स्वयं निर्णय लेने में असमर्थ दिखाई देती है।
2.
“चादर पिछोड़ी को गाळणो हो देवी,
रनवाई भात लई जाय।”
चादर और पिछोड़ी स्त्री की मर्यादा, सम्मान और सुरक्षा का प्रतीक हैं। उनका “गाळणो” यानी उतारा जाना नारी की इज़्ज़त छिनने का संकेत है। ‘रनवाई भात’ यह दर्शाता है कि स्त्री को मजबूरी में, अपमान सहते हुए, जीवन-यापन के लिए निकलना पड़ता है।
3.
“आवतज धनियर जी न देख्या हो राजा,
मोड़ी लीनी कनिएर सोठी।”
यह पंक्तियाँ बताती हैं कि पति या परिवार के मुखिया के न रहने या सहयोग न मिलने पर स्त्री पूरी तरह असुरक्षित हो जाती है। उसकी स्थिति कमजोर और विवश हो जाती है।
4.
“एक जो मारी, न दूसरी न हो राजा,
तीसरी म जोड़या दुई हाथ।”
यह पंक्ति नारी पर लगातार होने वाले अत्याचारों की ओर संकेत करती है। पहली और दूसरी मार के बाद भी न्याय नहीं मिलता, तब तीसरी बार वह हाथ जोड़कर समाज से, सत्ता से, राजा से दया की गुहार लगाती है।
5.
“जो तुम धनियर सोठी मारसो हो राजा,
नहीं म्हारो माय न बाप।”
यहाँ स्त्री अपनी पूर्ण असहायता व्यक्त करती है। उसके पास न माता-पिता हैं, न कोई ऐसा जो उसके पक्ष में खड़ा हो सके। वह पूरी तरह समाज और व्यवस्था की दया पर निर्भर है।
6.
“नहीं हमारी माय न मावसी हो राजा,
कुण म्हारो आणों लई जाय।”
यह पंक्तियाँ उस सामाजिक सच को उजागर करती हैं जहाँ स्त्री के अपने रिश्ते भी उसका साथ छोड़ देते हैं। वह पूछती है—अब मुझे अपनाने वाला कौन है?
7.
“कलयुग म अमुक भाई मानवी राजा,
ऊ तुम्हारा आणो लई जाय।”
कलयुग में भी यदि कोई सच्चा, संवेदनशील और मानवीय व्यक्ति है, तो वही नारी का सहारा बनता है। यह आशा की एक छोटी-सी किरण है कि इंसानियत अभी पूरी तरह मरी नहीं है।
8.
“अमुक भाई दीसे तुमक वाजुट हो राजा,
लाड़ीबाई लागसे तुम्हारा पांय।”
यहाँ नारी उस व्यक्ति के प्रति कृतज्ञता प्रकट करती है जिसने उसे अपनाया, सहारा दिया। वह सम्मान और आशीर्वाद के रूप में उसके चरणों में झुकती है।
निष्कर्ष – गीतेश कुमार भार्गव
यह गीत केवल एक स्त्री की कथा नहीं, बल्कि पूरे समाज के सामने एक प्रश्न है—
जब नारी के अपने ही उसे त्याग दें, तब उसका सहारा कौन बनेगा?
“हो देवी” नारी के दर्द, उसकी चुप चीख और उसकी अद्भुत सहनशक्ति का सजीव दस्तावेज़ है। यह रचना हमें संवेदनशील बनने, अन्याय के विरुद्ध खड़े होने और नारी को सम्मान देने की सीख देती है।



