तुम सिरज्या जलम की वाँझ Nimadi Gangaur Geet Lyrics -1952

परिचय
“तुम सिरज्या जलम की वाँझ” राजस्थान की लोकपरंपरा से जुड़ा एक अत्यंत मार्मिक और सामाजिक चेतना जगाने वाला गीत है। यह रचना स्त्री-जीवन के उस दर्द को स्वर देती है, जहाँ संतान न होने पर नारी को तिरस्कार, अपमान और व्यंग्य सहना पड़ता है।
इस गीत में रणुबाई और रणादेव के संवाद के माध्यम से समाज में व्याप्त अहंकार, रिश्तों की तुलना और वंश-गौरव की मानसिकता को गहराई से उजागर किया गया है। यह गीत केवल कथा नहीं, बल्कि लोकसमाज का आईना है।
तुम सिरज्या जलम की वाँझ

ढेळ बठी हो रनुबाई बाळो धवाड़s
वांजुली झाकी झाकों जाय
काई झाको, काईं देखो हो, जलम की वाँझ,
थारी पड़s हो हमखs छावळई ।
एतरो गरब क्यो बोलो रनादेव,
सासू का जाया म्हारा यहां अति घणा।
सासू का जाया थारा देवर-जेठ कव्हासे,
तुम सिरज्या जलम की वाँझ।
एतरों गरब क्यो बोलो रनादेव,
देवर का जाया म्हारा यहां अति घणा।
देवर का जाया थारा नात्या-पोत्या कव्हासे,
तुम सिरज्या जलम की वाँझ।
एतरो गरब क्यों बोलो रनादेव,
जेंठ का जाया म्हारा यहां अति घणा,
जेंठ का जाया थारा भतीजा कव्हासे,
तुम सिरज्या जलम की वाँझ।
Tum sirajya jalam ki vaanjh

Dhel bathi ho Ranubai baalo Dhavaad,
Vaanjhuli jhaaki jhaakon jaay.
Kai jhaako, kaain dekho ho, jalam ki vaanjh,
Thaari pads ho humkha chaavlai.
Etro garab kyon bolo Ranadev,
Saasu ka jaaya mhaara yahaan ati ghana.
Saasu ka jaaya thaara devar-jeth kavhaase,
Tum sirajya jalam ki vaanjh.
Etro garab kyon bolo Ranadev,
Devar ka jaaya mhaara yahaan ati ghana.
Devar ka jaaya thaara naatya-potya kavhaase,
Tum sirajya jalam ki vaanjh.
Etro garab kyon bolo Ranadev,
Jenth ka jaaya mhaara yahaan ati ghana.
Jenth ka jaaya thaara bhatija kavhaase,
Tum sirajya jalam ki vaanjh.
गीत की विस्तृत व्याख्या

1️⃣ “ढेळ बठी हो रणुबाई…”
गीत की शुरुआत रणुबाई की पीड़ा से होती है। वह समाज की नज़रों में “वाँझ” कही जाती है।
लोग उसे बार-बार घूरते हैं, उसकी ओर तिरछी निगाहों से देखते हैं।
यह दृश्य उस मानसिक यातना को दर्शाता है, जिसमें एक स्त्री को उसकी जैविक स्थिति के कारण दोषी ठहराया जाता है।
➡️ यहाँ “झाकी-झाकों” समाज की उत्सुकता नहीं, बल्कि निर्दय जजमेंट का प्रतीक है।
2️⃣ “काई झाको, काईं देखो हो…”
इन पंक्तियों में स्त्री का मौन प्रश्न है—
क्या देखने आए हो? क्या मैं इंसान नहीं हूँ?
यह व्यथा बताती है कि कैसे समाज स्त्री को केवल संतान से जोड़कर आंकता है,
और उसके अस्तित्व, भावनाओं व सम्मान को नज़रअंदाज़ कर देता है।
3️⃣ “एतरो गरब क्यो बोलो रणादेव…”
यहाँ गीत संवाद का रूप ले लेता है।
रणादेव से पूछा जाता है कि वह इतना घमंड क्यों करता है?
कभी सासू के पुत्रों का गर्व
कभी देवर-जेठ की संतानों का
कभी नात्या-पोत्या और भतीजों का
➡️ गीत स्पष्ट करता है कि ये सभी रिश्ते दूसरों की संतानों पर आधारित हैं,
फिर भी रणुबाई को नीचा दिखाया जाता है।
4️⃣ “तुम सिरज्या जलम की वाँझ”
यह पंक्ति बार-बार दोहराई जाती है, जो समाज के क्रूर लेबल को दर्शाती है।
यह दोहराव श्रोता को झकझोरता है और यह सोचने पर मजबूर करता है कि—
क्या स्त्री का मूल्य केवल माँ बनने से तय होता है?
गीत इस मानसिकता पर मौन लेकिन तीखा प्रहार करता है।
समग्र भाव
यह लोकगीत हमें सिखाता है कि—
संतान होना या न होना किसी के वश में नहीं
रिश्तों का घमंड करना खोखला अभिमान है
स्त्री का सम्मान उसकी कोख से नहीं, उसके अस्तित्व से होना चाहिए
यह गीत लोकसंगीत के माध्यम से समाज को आईना दिखाता है और
मानवीय संवेदना, करुणा और समानता का संदेश देता है।



