UGC – समता के संवर्धन हेतु विनियम 2026
UGC Promotion of Equity Regulations 2026

समता की संवैधानिक मंशा, संरचनात्मक विवाद और भ्रम का राजनीतिक-सामाजिक मनोविज्ञान

जनवरी 2026 में अधिसूचित UGC (Promotion of Equity in Higher Educational Institutions) Regulations, 2026 को भारत के उच्च शिक्षा इतिहास में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में देखा जा रहा है।
इन नियमों का घोषित उद्देश्य है—
लेकिन जिस नियम का उद्देश्य भेदभाव को समाप्त करना था, वही नियम आज जनरल बनाम OBC/SC/ST के नए और तीखे विवाद का कारण बन गया है।
इस पूरे विवाद का केंद्र है—
👉 समता कमेटी (Equity Committee)
1. समता कमेटी क्या है और क्यों अनिवार्य की गई?

UGC के 2026 के नियमों के अनुसार, अब हर कॉलेज और यूनिवर्सिटी में एक इक्विटी कमेटी बनाना कानूनी रूप से अनिवार्य है।
इस कमेटी का कार्य होगा:
जाति आधारित भेदभाव की शिकायतों की सुनवाई
धार्मिक या सांस्कृतिक भेदभाव
लैंगिक उत्पीड़न या असमानता
दिव्यांगजनों के साथ भेदभाव
संस्थागत सामाजिक बहिष्कार (Institutional Exclusion)
यह कमेटी केवल शिकायत दर्ज करने की संस्था नहीं है, बल्कि जांच, सिफारिश और रिपोर्टिंग की शक्ति भी रखती है।
2. समता कमेटी की संरचना : विवाद की जड़
UGC Regulations 2026 में इक्विटी कमेटी की संरचना को बहुत स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है।
अनिवार्य सदस्य
नियमों के अनुसार कमेटी में निम्न वर्गों का प्रतिनिधित्व अनिवार्य है:
OBC (अन्य पिछड़ा वर्ग) का सदस्य
SC (अनुसूचित जाति) का सदस्य
ST (अनुसूचित जनजाति) का सदस्य
महिलाएं (Women Representatives)
दिव्यांगजन (Persons with Disabilities)
एंटी-डिस्क्रिमिनेशन ऑफिसर (एक वरिष्ठ फैकल्टी सदस्य)
अध्यक्ष (Chairperson)
संस्थान का प्रमुख
(Vice-Chancellor / Principal / Director)
3. विवाद का मुख्य बिंदु: “जनरल कैटेगरी कहाँ है?”
यहीं से विवाद की शुरुआत होती है।
🔴 आलोचकों का सवाल:

यदि OBC, SC, ST, Women और PwD के लिए प्रतिनिधित्व स्पष्ट और अनिवार्य है,
तो अनारक्षित (General) वर्ग के लिए ऐसी कोई स्पष्ट शर्त क्यों नहीं लिखी गई?
यह बात नियमों में लिखित रूप में अनुपस्थित है।
परिणामस्वरूप बनी धारणा:
जनरल कैटेगरी के छात्रों और शिक्षकों में यह डर पैदा हुआ कि “क्या हमारी शिकायतें निष्पक्ष रूप से सुनी जाएँगी?” “क्या कमेटी का संतुलन एकतरफा हो सकता है?”
यहाँ समस्या सिर्फ वास्तविक भेदभाव की नहीं है,
बल्कि न्याय की धारणा (Perception of Justice) की है।
4. उदाहरण से समझिए विवाद की गहराई
मान लीजिए:
एक OBC छात्र
किसी जनरल कैटेगरी प्रोफेसर पर
जातिगत भेदभाव का आरोप लगाता है
अब उस मामले की सुनवाई जिस कमेटी में हो रही है, उसमें:
OBC, SC, ST प्रतिनिधि हैं
महिला और दिव्यांग प्रतिनिधि हैं
लेकिन स्पष्ट रूप से “General Category Representative” नहीं है
यहाँ सवाल यह नहीं है कि कमेटी गलत फैसला करेगी,
बल्कि यह है कि—
👉 क्या फैसला आने से पहले ही एक पक्ष को असहजता महसूस होगी?
कानून और लोकतंत्र में एक स्थापित सिद्धांत है:
Justice must not only be done, it must also be seen to be done.
5. “कौन लोग निर्णय ले रहे हैं?” — जाति आधारित भ्रम
सोशल मीडिया पर एक और दावा ज़ोर पकड़ता जा रहा है:
“UGC समता कमेटी में निर्णय लेने वाले लोग उसी वर्ग से हैं,और विरोध करने वाले लोग भी उसी वर्ग से हैं , यानी दोनों पाले में एक ही वर्ग खेल रहा है।”
लेकिन यहाँ गंभीर विश्लेषण आवश्यक है
UGC Commission या National Monitoring Committee के सदस्यों की जाति या वर्ण की कोई आधिकारिक सूची सार्वजनिक नहीं होती
संवैधानिक या वैधानिक पदों पर बैठे व्यक्ति
अपने निर्णयों से पहचाने जाते हैं, न कि सामाजिक पहचान से
विडंबना यह है कि:
जो लोग जाति आधारित पूर्वाग्रह का विरोध कर रहे हैं,
वही लोग बिना प्रमाण के दूसरों की जाति तय कर रहे हैं
👉 यही वह मानसिक जाल (Cognitive Trap) है,
जिससे निकलने के लिए ये नियम बनाए गए थे।
6. UGC Commission: जिन्होंने नियम बनाए
समता रेगुलेशंस को मंजूरी देने वाली सर्वोच्च संस्था है—
University Grants Commission (UGC Commission)
वर्तमान पदाधिकारी (जनवरी 2026):
अध्यक्ष (Chairman)
डॉ. विनीत जोशी (अंतरिम/अतिरिक्त प्रभार)
उपाध्यक्ष (Vice-Chairman)
प्रो. दीपक कुमार श्रीवास्तव
अन्य सदस्य:
श्री आशीष कुमार चौहान (Chancellor, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी; MD/CEO, NSE)
श्री श्रीधर वेम्बू (CEO, Zoho Corporation)
प्रो. बद्री नारायण तिवारी
प्रो. राज कुमार मित्तल
प्रो. सचिदानंद मोहंती
प्रो. शशिकला गुलाबराव वंजारी
प्रो. ताना शोरेन
प्रो. वंदना मिश्रा
सरकारी प्रतिनिधि (Ex-Officio):
सचिव, उच्च शिक्षा विभाग (शिक्षा मंत्रालय)
सचिव/अपर सचिव, व्यय विभाग (वित्त मंत्रालय)
7. राष्ट्रीय निगरानी समिति (National Monitoring Committee)

UGC 2026 नियमों के तहत एक नई राष्ट्रीय निगरानी समिति बनाई जा रही है, जिसका उद्देश्य होगा:
देशभर में इक्विटी कमेटियों के कामकाज की निगरानी
शिकायतों के पैटर्न का अध्ययन
संस्थागत सुधार की सिफारिश
प्रस्तावित संरचना:
UGC प्रतिनिधि
AICTE, NMC जैसी वैधानिक परिषदों के सदस्य
सिविल सोसाइटी के सदस्य (NGO / मानवाधिकार कार्यकर्ता)
नई चिंता:
“सिविल सोसाइटी” की परिभाषा बहुत व्यापक है
चयन प्रक्रिया पारदर्शी न होने पर
विचारधारात्मक झुकाव की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता
8. असली समस्या कहाँ है?
इस पूरे विवाद को अगर गहराई से देखें, तो तीन मूल कारण सामने आते हैं:
1️⃣ नियम की मंशा
ऐतिहासिक रूप से वंचित वर्गों की सुरक्षा आवश्यक है
यह संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 की भावना के अनुरूप है
2️⃣ संरचनात्मक अस्पष्टता
जनरल कैटेगरी के प्रतिनिधित्व पर मौन
स्पष्ट भाषा की कमी
3️⃣ भरोसे का संकट
संस्थानों पर नहीं,
बल्कि प्रक्रिया और संतुलन पर सवाल
9. निष्कर्ष: समता बनाम समानता नहीं, संतुलन का प्रश्न
Equity (समता) का अर्थ है—
जिनके पास कम था, उन्हें ज़्यादा सहारा देना
लेकिन Justice (न्याय) का आधार है—
हर पक्ष को सुने जाने का विश्वास
यदि इक्विटी कमेटी को सच में सफल बनाना है, तो ज़रूरी है कि:
निर्णय प्रक्रिया पारदर्शी हो
सभी सामाजिक समूहों को प्रतिनिधित्व की धारणा मिले
और न्याय सिर्फ किया न जाए,
दिखाई भी दे
अंततः प्रश्न यह नहीं है कि—
कौन किस जाति से है,
बल्कि यह है कि—
👉 क्या हमारी संस्थाएं ऐसा माहौल बना पा रही हैं,
जहाँ हर व्यक्ति बिना डर अपनी बात रख सके?
यही इस पूरे विवाद का सार है।
और अधिक तार्किकता के लिए निचे UGC एक्ट १९५६ , UGC रेगुलेशन एक्ट २०१८ , UGC २०२६ PDF को पढ़ सकते है
UGC PDF IN HINDI



