निमाड़ क्षेत्र में रबी की फसल गेहूं-चना 1 पारंपरिक खेती
खेत की तैयारी से कटाई तक संपूर्ण मार्गदर्शिका

नर्मदा अंचल का निमाड़ क्षेत्र, विशेषकर निमाड़, मध्य प्रदेश का एक प्रमुख कृषि क्षेत्र है जहाँ रबी मौसम में गेहूं और चने की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। यहाँ की काली कपासीय मिट्टी, नर्मदा का जल, मध्यम सर्दी और अनुकूल तापमान इन फसलों के लिए अत्यंत उपयुक्त माने जाते हैं। किसान पीढ़ियों से पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीक का संतुलित उपयोग करते हुए उच्च उत्पादन प्राप्त करते आ रहे हैं।
यह विस्तृत लेख निमाड़ क्षेत्र में गेहूं-चना की खेती की पूरी प्रक्रिया — खेत की तैयारी, बुवाई, खाद प्रबंधन, सिंचाई, वृद्धि, रोग नियंत्रण और कटाई — को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विस्तारपूर्वक समझाता है।
1. रबी फसल क्या होती है और निमाड़ में इसका महत्व
रबी फसल वे फसलें हैं जो सर्दियों में उगाई जाती हैं। इनकी बुवाई अक्टूबर-नवंबर में और कटाई फरवरी-मार्च या अप्रैल में होती है।
निमाड़ में रबी की प्रमुख फसलें
गेहूं 🌾
चना 🌱
मसूर
सरसों
निमाड़ की जलवायु में:
✔ सर्दियाँ हल्की-मध्यम
✔ दिन में धूप अच्छी
✔ रातें ठंडी
✔ सिंचाई के लिए नर्मदा जल उपलब्ध
इसी कारण गेहूं और चना यहाँ अत्यधिक सफल फसलें हैं।
2. खेत की तैयारी (Land Preparation)

अच्छी पैदावार की नींव सही खेत तैयारी से ही शुरू होती है।
(क) पहली जुताई — मिट्टी पलटना

अक्टूबर के आसपास किसान खेत में गहरी जुताई करते हैं।
उद्देश्य:
मिट्टी को ऊपर-नीचे पलटना
कीट व रोग के अंडों को नष्ट करना
खरपतवार खत्म करना
मिट्टी में वायु संचार बढ़ाना
पारंपरिक रूप से यह काम बैलों से हल चलाकर किया जाता था, लेकिन अब ट्रैक्टर से रिवर्सिबल हल या डिस्क हल का उपयोग होता है।
(ख) धूप दिखाना (Soil Solarization Effect)

जुताई के बाद खेत को कुछ दिन खुला छोड़ दिया जाता है।
इससे:
धूप से मिट्टी में मौजूद कीट मरते हैं
नमी संतुलित होती है
मिट्टी भुरभुरी बनती है
निमाड़ में तेज धूप इस प्रक्रिया को और प्रभावी बनाती है।
(ग) बख्खर से मिट्टी को भुरभुरा करना
पहली जुताई के बाद मिट्टी में बड़े-बड़े ढेले बन जाते हैं।
इन्हें तोड़ने के लिए:
बख्खर (पाटा/कुल्टीवेटर) चलाया जाता है
1–2 बार अतिरिक्त जुताई की जाती है
उद्देश्य:
✔ मिट्टी को पतली व समतल बनाना
✔ बीज अंकुरण के लिए आदर्श वातावरण बनाना
(घ) खेत की मेढ़ और पाले बनाना

निमाड़ में किसान खेत के चारों ओर मजबूत पाले बनाते हैं।
इससे:
पानी का संरक्षण होता है
सिंचाई नियंत्रित रहती है
मिट्टी का कटाव नहीं होता
3. जैविक खाद का प्रयोग

बुवाई से पहले ही खेत में गोबर खाद या कम्पोस्ट डाल दिया जाता है।
लाभ
मिट्टी की संरचना सुधरती है
सूक्ष्म पोषक तत्व मिलते हैं
जल धारण क्षमता बढ़ती है
लंबे समय तक उर्वरता बनी रहती है
निमाड़ के किसान पारंपरिक रूप से पशुपालन करते हैं, जिससे जैविक खाद आसानी से उपलब्ध रहती है।
4. बुवाई की प्रक्रिया
(क) बुवाई का समय
निमाड़ में सामान्यतः:
गेहूं: अक्टूबर अंत — नवंबर
चना: अक्टूबर मध्य — नवंबर प्रारंभ
समय पर बुवाई अत्यंत महत्वपूर्ण है।
(ख) पारंपरिक विधि — तिफन और बैल

पहले किसान “तिफन” (बीज बोने का यंत्र) को बैलों से जोड़कर बीज बोते थे।
विशेषताएँ:
कम लागत
सटीक गहराई
पारंपरिक ज्ञान पर आधारित
(ग)

आजकल अधिकांश किसान ट्रैक्टर संचालित सीड ड्रिल का उपयोग करते हैं।
लाभ:
✔ समय की बचत
✔ श्रम कम
✔ बीज की समान दूरी
✔ बेहतर अंकुरण
✔ उर्वरक साथ में डालने की सुविधा
5. अंकुरण और प्रारंभिक वृद्धि
बुवाई के लगभग 8–10 दिन बाद बीज अंकुरित होने लगते हैं।
अंकुरण के लिए आवश्यक स्थितियाँ
पर्याप्त नमी
उपयुक्त तापमान (15–25°C)
भुरभुरी मिट्टी
अच्छी बीज गुणवत्ता
जब खेत में हरी कतारें दिखाई देने लगती हैं, तब किसान को फसल की सफलता का पहला संकेत मिलता है।
6. सिंचाई प्रबंधन (Irrigation Management)

गेहूं विशेष रूप से सिंचाई पर निर्भर फसल है, जबकि चना अपेक्षाकृत कम पानी में भी उग सकता है।
पहली सिंचाई — अत्यंत महत्वपूर्ण
बुवाई के बाद या अंकुरण के समय हल्की सिंचाई की जाती है।
⚠️ ध्यान रखें:
पानी हल्का दें
तेज बहाव से पौधे दब सकते हैं
मिट्टी कट सकती है
गेहूं के लिए सामान्य सिंचाई अनुसूची (निमाड़ क्षेत्र)
1️⃣ पहली सिंचाई — अंकुरण/क्राउन रूट चरण
2️⃣ दूसरी — 50–60 दिन
3️⃣ तीसरी — 75–80 दिन
4️⃣ चौथी — 95–100 दिन
5️⃣ आवश्यकता अनुसार एक अतिरिक्त सिंचाई
कुल: लगभग 4–5 सिंचाई
महत्वपूर्ण सावधानियाँ
✔ सिंचाई हमेशा हल्की करें
✔ पानी ठहरना नहीं चाहिए
✔ अंतिम सिंचाई (दाना भरते समय) बहुत जरूरी
✔ देरी से बुवाई पर समय बदल सकता है
7. उर्वरक प्रबंधन

जैविक खाद के साथ रासायनिक उर्वरकों का संतुलित उपयोग उच्च उत्पादन के लिए आवश्यक है।
20–25 दिन बाद
जब पौधे लगभग 6 इंच तक बढ़ जाते हैं, तब:
यूरिया (नाइट्रोजन स्रोत)
जिंक उर्वरक
का प्रयोग किया जाता है।
यूरिया का सही उपयोग
✔ नमी होने पर डालें
✔ सिंचाई से 1–2 दिन पहले या बाद
✔ खड़ी फसल में छिड़काव या टॉप ड्रेसिंग
नाइट्रोजन पौधे की हरी वृद्धि और दाने की गुणवत्ता बढ़ाती है।
8. खरपतवार नियंत्रण

खरपतवार पौधों से पोषण और पानी छीन लेते हैं।
नियंत्रण के तरीके:
हाथ से निराई
खुरपी से गुड़ाई
यांत्रिक उपकरण
आवश्यकता होने पर चयनात्मक खरपतवारनाशी
9. रोग और कीट प्रबंधन
निमाड़ में सामान्य समस्याएँ:
दीमक
तना छेदक
पत्ती रोग
फफूंदी
रोकथाम के उपाय
✔ स्वस्थ बीज
✔ फसल चक्र
✔ संतुलित खाद
✔ समय पर सिंचाई
✔ आवश्यकता पर जैविक या रासायनिक नियंत्रण
10. फसल का विकास चरण
गेहूं के प्रमुख विकास चरण:
अंकुरण
टिलरिंग (कल्ले बनना)
बालियाँ निकलना
फूल आना
दाना भरना
पकना
दाना भरने के समय पानी की कमी उत्पादन को बहुत घटा सकती है।
11. चना की खेती — विशेष बातें
चना अपेक्षाकृत सूखा सहनशील फसल है।
विशेषताएँ:
✔ कम सिंचाई
✔ नाइट्रोजन स्थिरीकरण
✔ कम लागत
✔ अच्छी बाजार मांग
अक्सर चना बिना सिंचाई के भी सफल हो जाता है यदि मिट्टी में पर्याप्त नमी हो।
12. कटाई का समय
निमाड़ क्षेत्र में:
📅 फरवरी अंत — मार्च तक फसल तैयार हो जाती है
पकने के संकेत:
पौधा पीला पड़ना
दाना सख्त होना
नमी कम होना
13. कटाई के तरीके

पारंपरिक कटाई
दरांती से मजदूरों द्वारा
छोटे किसानों में प्रचलित
आधुनिक कटाई
हार्वेस्टर मशीन
समय और श्रम की बचत
बड़े खेतों में उपयोग
14. मड़ाई और भंडारण

कटाई के बाद:
दानों को अलग किया जाता है
धूप में सुखाया जाता है
सुरक्षित भंडारण किया जाता है
सही भंडारण से कीट नुकसान से बचाव होता है।
15. निमाड़ की खेती की विशेषताएँ
निमाड़ क्षेत्र की खेती को सफल बनाने वाले प्रमुख कारक:
✔ नर्मदा का जल
✔ उपजाऊ काली मिट्टी
✔ पारंपरिक अनुभव
✔ आधुनिक तकनीक का उपयोग
✔ मेहनती किसान
निष्कर्ष
निमाड़ में गेहूं और चना की रबी खेती परंपरा और विज्ञान का अद्भुत संगम है। खेत की सही तैयारी, समय पर बुवाई, संतुलित खाद, उचित सिंचाई और सावधानीपूर्वक देखभाल से किसान उच्च उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। फरवरी-मार्च में जब सुनहरी बालियाँ खेतों में लहराती हैं, तब यह केवल फसल नहीं बल्कि पूरे वर्ष की मेहनत का परिणाम होती है।
रबी की यह खेती न केवल किसानों की आजीविका का आधार है बल्कि क्षेत्र की खाद्य सुरक्षा और अर्थव्यवस्था की रीढ़ भी है।



