हिंडो मंड्यो – Gangaur geet Lyrics

Hindo Mandyo – Gangaur Geet

Champa ri daali, hindo mandyo, resham ri gaj dor.
Ji o mhe hindo mandyo.
Mhāre hindol Ishardas ji padharya, le bai Gavara ne saath.
Ji o mhe hindo mandyo.
Hole se jhoto diya o pataliya, darap lo najuk jeev.
Ji o mhe hindo mandyo.
Champa ri daali hindo mandyo, resham ri gaj dor.
Ji o mhe hindo mandyo.
“हिंडो मंड्यो” – गणगौर गीत का अर्थ और व्याख्या

राजस्थान और निमाड़ क्षेत्र में Gangaur का पर्व बहुत श्रद्धा और उत्साह से मनाया जाता है। यह पर्व माता Gauri (पार्वती) और भगवान Shiva (ईसर/ईसरदास) के पवित्र दांपत्य और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। इस पर्व के दौरान महिलाएँ और युवतियाँ कई पारंपरिक लोकगीत गाती हैं, जिनमें “हिंडो मंड्यो” भी एक सुंदर गणगौर गीत है।
इस गीत में माता गौरा और भगवान ईसर के स्वागत, प्रेम और श्रद्धा का भाव व्यक्त किया गया है। नीचे इस गीत का सरल हिंदी में अर्थ दिया गया है।
1.
चम्पा री डाली , हिन्डो माण्डयो , रेशम री गज डोर।
जी ओ म्हे हिन्डो माण्डयो।
अर्थ:
चम्पा के पेड़ की डाली पर रेशम की मजबूत डोरी से एक सुंदर झूला बांधा गया है।
हमने बड़े प्रेम और श्रद्धा से यह झूला तैयार किया है।
भाव:
यह पंक्ति भगवान ईसर और माता गौरा के स्वागत की तैयारी को दर्शाती है। चम्पा का पेड़ पवित्रता और सौंदर्य का प्रतीक माना जाता है।
2.
म्हारे हिंडोल इशरदास जी पधारया , ले बाई गवरा ने साथ।
जी ओ म्हे हिन्डो माण्डयो।
अर्थ:
हमारे झूले पर भगवान ईसरदास (भगवान शिव) माता गौरा को साथ लेकर पधारे हैं।
भाव:
इस पंक्ति में भगवान शिव और माता पार्वती के पवित्र मिलन और उनके आगमन की खुशी व्यक्त की गई है। महिलाएँ मानती हैं कि गणगौर के दिनों में देवी-देवता उनके घर और गांव में पधारते हैं।
3.
होले से झोटो दिया ओ पातलीया डरप लो नाजूक जीव।
जी ओ म्हे हिंडो मण्डियों।
अर्थ:
झूले को धीरे-धीरे झुलाओ, क्योंकि गौरा माता का शरीर बहुत कोमल और नाजुक है।
भाव:
यह पंक्ति माता गौरा के प्रति प्रेम और सम्मान को दर्शाती है। गीत गाने वाली महिलाएँ देवी को अपनी बेटी या बहन की तरह स्नेह से देखती हैं।
4.
चम्पा री डाली हिंडो मांडियो ,रेशम री गज डोर।
जी ओ म्हे हिंडो मंड्यो।
अर्थ:
चम्पा की डाली पर रेशम की डोरी से झूला सजाया गया है और उसे प्रेम से तैयार किया गया है।
भाव:
गीत की अंतिम पंक्ति फिर से उस खुशी और उत्सव को दोहराती है जिसमें महिलाएँ देवी-देवताओं के स्वागत के लिए झूला सजाती हैं।
गीत का सांस्कृतिक महत्व
यह गीत केवल एक लोकगीत नहीं बल्कि परंपरा और आस्था का प्रतीक है। गणगौर पर्व के दौरान महिलाएँ और युवतियाँ झूला सजाकर गौरा-ईसर की पूजा करती हैं और ऐसे ही गीत गाती हैं।
इस गीत में प्रेम, भक्ति, प्रकृति और पारिवारिक भावनाओं का सुंदर मेल दिखाई देता है।



