मैं जंगल का पेड़ भला | पर्यावरण संरक्षण पर भावपूर्ण कविता – Gitesh Kumar Bhargava

🔹 Content Introduction (कविता से पहले)
“मैं जंगल का पेड़ भला” एक विचारोत्तेजक हिंदी कविता है, जिसमें एक पेड़ स्वयं बोलकर मानव से प्रश्न करता है। यह कविता विकास के नाम पर हो रहे जंगल विनाश, पूँजीवाद, लालच और पर्यावरण संकट को भावनात्मक और सशक्त शब्दों में उजागर करती है।
“मैं जंगल का पेड़ भला” पर्यावरण संरक्षण पर आधारित एक संवेदनशील हिंदी कविता है, जो जंगलों की कटाई, विकास के नाम पर विनाश और प्रकृति की पीड़ा को मार्मिक शब्दों में प्रस्तुत करती है।
मैं जंगल का पेड़ भला
मैं जंगल का पेड़ भला,
मैं अरावली की गोद पला,
मैं माँधाता के गीत सुना,
मैं हँसा धूप, बरसात खिला।
मैं जंगल का पेड़ भला…
पर अब तो ये हरियाली है रोती,
अपनी अस्मत को हर दिन है खोती।
कागज़ों पर तो “प्रगति” लिखी जाती,
पर जड़ें रोज़ ही दर्द को सहती।
आज अचानक कैसे खला?
मैं जंगल का पेड़ भला…
कहा गया — “विकास हो रहा”,
पर किसका? मेरा तो विनाश हो रहा!
जो छाँव में घर पलता था तेरा,
अब वही बन रहा राख का ढेरा।
मन मानी अब क्यों करने चला?
मैं जंगल का पेड़ भला…
मुझ संग उजड़ रहे हैं जनपद,
अपने बच्चे सपने बुनते थे।
वो जंगल आज हो रहे हैं खाली,
जिन जंगलों में जीवन चुनते थे।
मेरे कारण ही अंत टला।
मैं जंगल का पेड़ भला…
पूँजी के नाम पे जंगल बिके,
लालच ने धरती का खून पिया।
मैं गिरा, तो जंगल गूँज उठा,
धरती रोई — आज ये तूने क्या किया?
मैं ही तो तेरे लिए जला।
मैं जंगल का पेड़ भला…
स्वार्थ के कुछ सिक्कों के खातिर,
अब बचे-कुचों की गिनती करता।
बर्बाद गुलिस्ताँ हो जाएगा,
मत काट मुझे — मैं विनती करता।
क्यों आज तेरा हथियार चला?
मैं जंगल का पेड़ भला…
मैं ही तो हूँ हर साँस तेरी,
मैं ही तो हूँ जल की धारा।
अब रोक ले यह पागलपन, प्रेमी,
क्यों काट रहा जंगल सारा?
फिर रह जाएगा हाथ मला।
मैं जंगल का पेड़ भला…
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- मैं जंगल का पेड़ भला
🔹 Author
✍️ रचना: —गीतेश कुमार भार्गव – Gitesh Kumar Bhargava
विषय: पर्यावरण, जंगल संरक्षण
भाषा: हिंदी



