निमाड़ी कलाकार

चल्यो किरसाण वावण वावणी को चास

चल्यो किरसाण वावण वावणी को चास | निमाड़ी किसान लोकगीत –GITESH KUMAR BHARGAVA – Lyrics

🌾चल्यो किरसाण वावण वावणी को चास | निमाड़ी किसान लोकगीत

 

धुरय न तीफन लगय निमाड़ी किसान लोकगीत lyrics
निमाड़ का किसान और उसकी खेती

चल्यो किरसाण वावण वावणी को चास…….

         निमाड़ी किसान लोकगीत

 


📖 भूमिका (Intro)

यह निमाड़ी लोकगीत किसान (किरसाण) के परिश्रम, बैलों के साथ उसके आत्मीय संबंध, खेती की दिनचर्या और वर्षा की आशा को जीवंत रूप में प्रस्तुत करता है। गीत में निमाड़ की मिट्टी की सोंधी खुशबू और श्रम की गरिमा स्पष्ट दिखाई देती है।

ABOUT SONG

SINGER –GITESH KUMAR BHARGAVA 
WRITER – UDHAV YADAV

🎵 गीत Lyrics

 

धुरय न तीफन लगय, बईल न क रास

चल्यो किरसाण वावण वावणी को चास


1) चार बजी न भाई, हुयो सोदारी
गौ का जाया न के कर दाण
चारो अबूती ठोकी न धरियो
पीराणो झकास…..                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                            चल्यो किरसाण वावण वावणी को चास


2) बाध्यो सिंगाद उन तीफन घुराई
धान वावण चली संग घर बुराई
घर की बाई सांझ पड़ तक
चल्यो किरसाण, पड़ तक वाळ नी सांस…..                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                  चल्यो किरसाण वावण वावणी को चास


3) रिमझिम पाणी पड़े, दादुर न चमक
गळा म बईल न का घुघरमाळ घमक
गीत उधव अच्छी व के
फसल की आस ……..                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                  चल्यो किरसाण वावण वावणी को चास

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ENGLISH LYRICS

Dhuray na teefan lagay, bail na ka raas
Chalyo kirsaan vaavan vaavani ko chaas


1)
Chaar baji na bhai, huyo sodari
Gau ka jaaya na ke kar daan
Chaaro abooti thoki na dhariyo
Peerano jhakaas
Chalyo kirsaan vaavan vaavani ko chaas


2)
Baadhyo singaad un teefan ghuraai
Dhaan vaavan chali sang ghar buraai
Ghar ki bai saanjh pad tak
Chalyo kirsaan, pad tak vaal ni saans
Chalyo kirsaan vaavan vaavani ko chaas


3)
Rimjhim paani pade, daadur na chamak
Gala ma bail na ka ghugarmal ghamak
Geet udhav achhi va ke
Fasal ki aas
Chalyo kirsaan vaavan vaavani ko chaas


🌿 भाव संकेत

यह गीत किसान के सुबह से शाम तक के परिश्रम, वर्षा की बूंदों से जगी आशा, बैलों की मेहनत और अच्छी फसल की कामना को दर्शाता है। यह निमाड़ की ग्रामीण संस्कृति और कृषि जीवन का सजीव चित्र है।

 गीत का विस्तृत भावार्थ

यह गीत निमाड़ के किसान (किरसाण) के जीवन की सच्ची तस्वीर प्रस्तुत करता है। इसमें खेत, बैल, हल, वर्षा और मेहनत से भरी दिनचर्या को बहुत सहज और भावनात्मक ढंग से उकेरा गया है। गीत बताता है कि किसान का जीवन प्रकृति के साथ गहराई से जुड़ा होता है।


🔹 मुखड़ा का भावार्थ

“धुरय न तीफन लगय, बईल न क रास चल्यो
किरसाण वावण वावणी को चास”

इस पंक्ति में किसान की पहली चिंता सामने आती है। वह चाहता है कि खेत जोतते समय हल (तीफन) में कोई बाधा न आए और बैल सही तरह से चलें। किसान पूरी लगन से बुवाई की तैयारी में जुटा है और उसके मन में खेती के प्रति उत्साह भरा हुआ है।


🔹 सुबह की शुरुआत और तैयारी

“चार बजी न भाई, हुयो सोदारी…”

यहाँ किसान की दिनचर्या दिखाई देती है। वह भोर होने से पहले उठ जाता है। गाय-बैलों की देखभाल करता है, उन्हें दाना-पानी देता है और खेती के काम के लिए तैयार करता है। यह किसान के परिश्रम और पशुओं के प्रति उसके स्नेह को दर्शाता है।


🔹 हल-बैल और खेत की मेहनत

“चारो अबूती ठोकी न धरियो
पीराणो झकास चल्यो किस्थाण”

किसान हल को मजबूती से जोड़ता है और पूरे जोश के साथ खेत की ओर निकल पड़ता है। इसमें किसान की तत्परता, शारीरिक श्रम और काम के प्रति समर्पण झलकता है।


🔹 घर-परिवार और साथ चलती चिंता

“धान वावण चली संग घर बुराई…”

धान की बुवाई के साथ किसान के मन में घर-परिवार की चिंता भी चलती रहती है। घर की स्त्रियाँ भी उसकी मेहनत में सहभागी हैं। शाम तक किसान बिना रुके काम करता रहता है, चाहे शरीर थक जाए।


🔹 शाम तक का संघर्ष

“सांझ पड़ तक चल्यो किरसाण…”

दिन ढलने तक किसान खेत में डटा रहता है। थकान के बावजूद वह रुकता नहीं, क्योंकि उसके परिश्रम पर ही पूरे परिवार का भविष्य टिका होता है।


🔹 वर्षा और आशा

“रिमझिम पाणी पड़े, दादुर न चमक…”

बारिश की हल्की बूंदें गिरने लगती हैं। मेंढकों की टर्र-टर्र और बिजली की चमक किसान के मन में नई आशा जगा देती है। यह संकेत है कि फसल अच्छी होगी।


🔹 बैलों की सजावट और आत्मीयता

“गळा म बईल न का घुघरमाळ घमक…”

बैल केवल पशु नहीं, बल्कि किसान के साथी हैं। उनके गले में बंधी घुंघरमाल की आवाज खेत में एक अलग ही लय पैदा करती है, मानो मेहनत का गीत गूंज रहा हो।


🔹 अच्छी फसल की कामना

“फसल की आस म चल्यो किरसाण”

पूरा गीत इस आशा पर समाप्त होता है कि मेहनत रंग लाएगी और फसल अच्छी होगी। यही आशा किसान को हर दिन नए उत्साह के साथ खेत की ओर ले जाती है।


🌿 समापन भाव

यह गीत किसान के संघर्ष, प्रकृति से जुड़ाव, पशुओं के प्रति प्रेम और भविष्य की आशा को दर्शाता है। “धुरय न तीफन लगय” केवल एक लोकगीत नहीं, बल्कि निमाड़ के किसान जीवन की आत्मा है।

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