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मत पे रे म्हारा भाई दारु निमाड़ी दारू विरोधी गीत

मत पे रे म्हारा भाई दारु | निमाड़ी दारू विरोधी गीत | Nimadi Song

मत पे रे म्हारा भाई दारु | निमाड़ी दारू विरोधी गीत | Nimadi Song

 

मत पे रे म्हारा भाई दारु निमाड़ी दारू विरोधी गीत

मत पे रे म्हारा भाई दारु

निमाड़ी सामाजिक लोकगीत


🔷 Song Credits

गीत: मत पे रे म्हारा भाई दारु
लेखक: मोहन भाई यादव
गायक: गितेश कुमार भार्गव
भाषा: निमाड़ी
शैली: सामाजिक संदेशात्मक लोकगीत
विषय: शराब के दुष्परिणाम

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🔷 भूमिका / Introduction

यह निमाड़ी लोकगीत समाज को शराब से होने वाले शारीरिक, पारिवारिक और आर्थिक नुकसान के प्रति जागरूक करता है।
गीत सरल निमाड़ी भाषा में भाईचारे के भाव से समझाता है कि दारू कैसे जीवन, परिवार और सम्मान को बर्बाद कर देती है।


🎶 गीत की Lyrics

🎵 मुखड़ा

मत पे रे म्हारा भाई दारु,
मत पे रे म्हारा भाई दारु, या दारु की हाथ थारा सारू।
खड़-खड़ भाई या दारु तो, तु क बणय दे ग रे बाजाक,
या दाऊ नी हाय थारा सारू…
मत पे रे म्हारा भाई दारु।


🎵 अंतरा 1

कै क छोड़ियो जो तु क छोड़ग, बड़ी गंदी छे या शराब रे,
पुरा शरीर को मारा करण न, लीवर करग खराब रे।

→ नस-नस थारा दर्द बढ़ग, घेला की नी चैन पड़ग,
रात-दिन फिर थारा नाव सी, रड़ती फिरग थारी पारू।
या दाऊ नी हाय थारा सारू…
मत पे रे म्हारा भाई दारु।


🎵 अंतरा 2

यनी दाऊ का कारण रोज-रोज, थारा घर म होयग झगड़ो रे,
इज्जत माटी म मिली जायग, कभी मीट नी यो रगड़ी रे।

→ घर की बरकत पूरी घटग, करजो थारा माया बठग,
ऐरु-गेरु कॉलर पकड़ग, कसो तु करे सुधारु।
या दाऊ नी हाय थारा सारू…
मत पे रे म्हारा भाई दारु।


🎵 अंतरा 3

दारु-दारु म केतरय उजड़िगा, अच्छा-अच्छा परिवार,
फोकट साट लुट्य गया, भाई बालक न का अधिकार रे।

→ जमीन पीगा, मकान पी गए,
सोनू-चाँदी, दुकान पी-पी गा,
पी-पी न लगी गया भीख मागण,
कसी बात क आज सवारु।
या दाऊ नी हाय थारा सारू…
मत पे रे म्हारा भाई दारु।


🎵 अंतरा 4

समय, शरीर और पैसा को सब, नाश होयग ज्यादा रे,
भरी जवानी चली जायग, सब टूटग थारा वादा रे।

→ मोहन लिख भाई गीत जुबानी, बचनु होय तो ल पहचानि,
कया बीना म्हारो मन नही मान, मन क कहाँ तक मारु।
या दाऊ नी हाय थारा सारू…
मत पे रे म्हारा भाई दारु।

Mat pe re mhaara bhai daaru,
Mat pe re mhaara bhai daaru, ya daaru ki haath thaara saaru.
Khad-khad bhai ya daaru to, tu k banay de ga re baajak,
Ya daau ni haay thaara saaru…
Mat pe re mhaara bhai daaru.


🎵 Antara 1

Kai k chhodiyo jo tu k chhodg, badi gandi chhe ya sharaab re,
Pura shareer ko maara karan na, liver karag kharaab re.

Nas-nas thaara dard badhg, ghela ki ni chain padg,
Raat-din phir thaara naav si, radti phirg thaari paaru.
Ya daau ni haay thaara saaru…
Mat pe re mhaara bhai daaru.


🎵 Antara 2

Yani daau ka kaaran roj-roj, thaara ghar ma hoyg jhagdo re,
Izzat maati ma mili jaayg, kabhi meet ni yo ragdo re.

Ghar ki barkat poori ghatg, karjo thaara maaya bathg,
Aeru-geru collar pakadg, kaso tu kare sudhaaru.
Ya daau ni haay thaara saaru…
Mat pe re mhaara bhai daaru.


🎵 Antara 3

Daaru-daaru ma ketaray ujadiga, achha-achha parivaar,
Fokat saat lutya gaya, bhai baalak na ka adhikaar re.

Zameen peega, makaan pee gaye,
Sonu-chaandi, dukaan pee-pee ga,
Pee-pee na lagi gaya bheekh maagan,
Kasi baat k aaj sawaaru.
Ya daau ni haay thaara saaru…
Mat pe re mhaara bhai daaru.


🎵 Antara 4

Samay, shareer aur paisa ko sab, naash hoyg zyaada re,
Bhari jawaani chali jaayg, sab tootg thaara waada re.

Mohan likh bhai geet zubaani, bachanu hoy to l pehchaani,
Kya bina mhaaro mann nahi maan, mann k kahaan tak maaru.
Ya daau ni haay thaara saaru…
Mat pe re mhaara bhai daaru.


“मत पे रे म्हारा भाई दारु”

की 🌿 पूरा विस्तृत भावार्थ / Detailed Song Explanation
सरल भाषा, लोकभावना और सामाजिक संदेश के साथ प्रस्तुत है।


🌱 गीत का समग्र भाव (Overview)

यह गीत नशा मुक्ति और सामाजिक सुधार का सशक्त संदेश देता है।
निमाड़ी लोकशैली में रचा गया यह गीत किसी को डाँटता नहीं, बल्कि भाई बनकर समझाता है कि शराब कैसे धीरे-धीरे शरीर, परिवार, सम्मान और भविष्य को नष्ट कर देती है।


🎵 मुखड़े का भावार्थ

“मत पे रे म्हारा भाई दारु”

मुखड़ा पूरे गीत की आत्मा है।
कवि भाईचारे के भाव से चेतावनी देता है—

  • शराब तुम्हारे हाथ में नहीं रहती,

  • बल्कि तुम्हें ही अपना गुलाम बना लेती है।

  • “या दाऊ नी हाय थारा सारू” से तात्पर्य है कि
    दारू हर तरह से नुकसानदायक है।

➡️ संदेश:
शराब को मनोरंजन नहीं, विनाश समझो।


🎶 अंतरा 1 का भावार्थ

यह अंतरा शारीरिक नुकसान पर केंद्रित है।

  • शराब पूरे शरीर को कमजोर कर देती है।

  • सबसे पहले लीवर खराब होता है।

  • नस-नस में दर्द, बेचैनी और नींद की कमी होती है।

  • घर की स्त्री (पारू) दिन-रात चिंता में रोती रहती है।

➡️ संदेश:
शराब सिर्फ पीने वाले को नहीं, उसके पूरे परिवार को दुख देती है।


🎶 अंतरा 2 का भावार्थ

यह अंतरा पारिवारिक और सामाजिक प्रभाव बताता है।

  • रोज-रोज घर में झगड़े होते हैं।

  • समाज में इज्जत मिट्टी में मिल जाती है।

  • घर की बरकत खत्म हो जाती है।

  • आदमी गलत संगत में फँस जाता है।

➡️ संदेश:
नशा इंसान को गलत रास्ते पर ले जाकर उसकी पहचान खत्म कर देता है।


🎶 अंतरा 3 का भावार्थ

यह अंतरा आर्थिक तबाही का चित्रण करता है।

  • शराब की लत से अच्छे-अच्छे परिवार उजड़ गए।

  • जमीन, मकान, सोना-चाँदी, दुकान—सब बिक गए।

  • अंत में आदमी भीख माँगने को मजबूर हो जाता है।

  • बच्चों का भविष्य और अधिकार छिन जाते हैं।

➡️ संदेश:
शराब गरीबी नहीं लाती, बल्कि समृद्धि को नष्ट कर देती है।


🎶 अंतरा 4 का भावार्थ

यह अंतरा समय रहते चेतने की सीख देता है।

  • समय, शरीर और पैसा—तीनों नष्ट हो जाते हैं।

  • जवानी यूँ ही निकल जाती है।

  • सारे वादे टूट जाते हैं।

यहाँ गीतकार मोहन भाई यादव स्वयं बोलते हैं—
अगर बात समझ में आए तो पहचान लो,
क्योंकि बाद में पछताने से कुछ नहीं मिलता।

➡️ संदेश:
आज का निर्णय ही कल का भविष्य बनाता है।


गीत का मूल संदेश (Core Message)

यह गीत सिखाता है कि—

  • शराब आदमी को नहीं, आदमी शराब को छोड़ दे

  • नशा छोड़ना कमजोरी नहीं, हिम्मत है

  • परिवार, इज्जत और स्वास्थ्य सबसे बड़ी पूँजी हैं

👉 गीत समाज के हर वर्ग को नशा मुक्ति की ओर प्रेरित करता है।


 निष्कर्ष

“मत पे रे म्हारा भाई दारु”
केवल एक निमाड़ी गीत नहीं, बल्कि—

✔ सामाजिक चेतावनी
✔ भाईचारे की सीख
✔ नशा मुक्ति का आंदोलन
✔ लोकभाषा में सच्चा उपदेश

है।

🌱 गीत का संदेश

यह गीत स्पष्ट रूप से बताता है कि—

  • शराब शरीर को बीमार बनाती है

  • परिवार में झगड़े और गरीबी लाती है

  • सम्मान और भविष्य दोनों नष्ट कर देती है

  • समय रहते छोड़ना ही सच्चा सुधार है

👉 गीत भाईचारे के भाव से चेतावनी देता है, न कि तिरस्कार से।

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