हो रनादेव परंपरागत निमाड़ी गणगौर गीत – LYRICS 1952

🔸 Intro
निमाड़ अंचल की लोकसंस्कृति में गणगौर पर्व का विशेष स्थान है। यह पर्व मुख्य रूप से सुहाग, संतान-सुख और पारिवारिक समृद्धि की कामना से जुड़ा हुआ है। चैत्र मास में मनाया जाने वाला गणगौर उत्सव, माता पार्वती (गौर) और भगवान शिव के पावन दांपत्य का प्रतीक है।
परंपरागत निमाड़ी गणगौर गीत स्त्रियों की सामूहिक आस्था, घरेलू जीवन की आकांक्षाओं और लोकविश्वासों को स्वर देते हैं। इन गीतों में बेटी, बहू, सास-ननंद, पड़ोसन—सब एक साथ माता गौर की पूजा करती हैं और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद माँगती हैं। प्रस्तुत गीत इसी परंपरा का जीवंत उदाहरण है, जिसमें लोकजीवन की सरलता और श्रद्धा गहराई से झलकती है।
हो रनादेव

दुव का डाडळा, अकाव का फूल,
राणी ओ मोठी बहू अरघ देवाय।
अरघ दई न वर पाविया,
अमुक सरीका भरतार॥
आतुली पातुली, लाओ रे गंगाजल पाणी,
न्हावण कर रनूबाई राणी।
रनूबाई, रनूबाई, खोलो किवाड़,
पूजण वाळ्या ऊभी दुवार।
पूजण वाळ्या काई माँग?
दूध माँग, पूत माँग।
आह्वात माँग।
हटियाळो बालो माँग,
जटियाळो भाई माँग।
वहू को रांध्यो माँग,
बेटी को परोस्यों माँग।
टोंगळया उँडंतो गोबर माँग,
पोयचा बुड़ंतो गोरस माँग।
पूत की कमाई माँग,
धणी को राज माँग।
सोन्ना सी सरवर गऊर पूजां हो रनादेव।
मांय न बेटी गऊर पूजां हो रनादेव।
नणंद-भोजाई गऊर पूजां हो रनादेव।
देराणी-जेठाणी गऊर पूजां हो रनादेव।
सास न वहू गऊर पूजा हो रनादेव।
अड़ोसण-पड़ोसण गऊर पूजां हो रनादेव।
पड़ोसण पर टूटयो गरबो भान हो रनादेव।
कगी पत टूटयो गरबो भान हो रनादेव।
दूध केरी दवणी मजघेर हो रनादेव।
पूत्र केरो पालणो पटसाळ हो रनादेव।
स्वामी-सुत सुख लड़ी सेज हो रनादेव।
असी पत टूटयो गरबो भान हो रनादेव॥
ho Ranadev

Duv ka Dadla, Akaav ka Phool,
Rani o Mothi Bahu Aragh Devaay.
Aragh dai na var paaviya,
Amuk Sarika Bhartaar.
Aatuli Paatuli, Lao re Gangajal Paani,
Nhaavan kar Ranubai Rani.
Ranubai, Ranubai, Kholo Kivaad,
Poojan Vaalya Ubhi Duaar.
Poojan Vaalya Kai Maang?
Doodh maang, Poot maang,
Aahvaat maang.
Hatiyalo Baalo maang,
Jatiyalo Bhai maang.
Vahu ko Randhyo maang,
Beti ko Parosyon maang.
Tongalya Undanto Gobar maang,
Poycha Budanto Goras maang.
Poot ki Kamaai maang,
Dhani ko Raaj maang.
Sonna si Sarvar Gaur Poojaan ho Ranadev.
Maay na Beti Gaur Poojaan ho Ranadev.
Nanand Bhojai Gaur Poojaan ho Ranadev.
Derani Jethani Gaur Poojaan ho Ranadev.
Saas na Vahu Gaur Pooja ho Ranadev.
Adosan Padosan Gaur Poojaan ho Ranadev.
Padosan par Tootyo Garbo Bhaan ho Ranadev.
Kagi Pat Tootyo Garbo Bhaan ho Ranadev.
Doodh keri Davani Majgher ho Ranadev.
Pootra kero Paalano Patsaal ho Ranadev.
Swami Sut Sukh Ladi Sej ho Ranadev.
Asi Pat Tootyo Garbo Bhaan ho Ranadev.
🔸 गीत की विस्तृत व्याख्या – Gitesh kumar

🌿 1. शुभ आरंभ और पूजन सामग्री
गीत की शुरुआत दूब घास, अकाव के फूल जैसे पवित्र प्रतीकों से होती है। ये प्राकृतिक वस्तुएँ शुद्धता और समृद्धि का संकेत हैं। बड़ी बहू द्वारा अरघ (जल अर्पण) देना परिवार की ओर से माता गौर को सम्मान और श्रद्धा अर्पित करने का प्रतीक है।
💧 2. गंगाजल से स्नान – शुद्धि का भाव
“आतुली-पातुली लाओ रे गंगाजल पानी” पंक्ति से स्पष्ट होता है कि पूजा से पहले माता रनूबाई (गौर) को गंगाजल से स्नान कराया जा रहा है। यह शारीरिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक शुद्धि का भाव दर्शाता है।
🚪 3. माता से संवाद
“रनूबाई खोलो किवाड़” में भक्त माता को पुकारते हैं। द्वार पर यादगार खड़ी पूजने वाली स्त्रियाँ माता से विनम्रता से अपनी मनोकामनाएँ रखने को तैयार हैं। यह लोकगीतों की सुंदर परंपरा है—ईश्वर से सीधा संवाद।
🍼 4. संतान, परिवार और गृहस्थ जीवन की कामनाएँ
गीत का मुख्य भाग माँगों से भरा है—
दूध और पुत्र: संतान-सुख
हटियाला बालक, जटियाला भाई: स्वस्थ व बलवान परिवार
बहू का रांधना, बेटी का परोसना: सुगठित गृहस्थ जीवन
यह दिखाता है कि गणगौर पूजा केवल वैवाहिक सुख तक सीमित नहीं, बल्कि पूरा पारिवारिक संतुलन माँगती है।
🐄 5. पशुधन और आजीविका
गोबर, गोरस (दूध), पुत्र की कमाई और पति के राज की कामना—ये सब ग्रामीण अर्थव्यवस्था और जीवनशैली के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। माता से घर-गृहस्थी की निरंतर उन्नति की प्रार्थना की जाती है।
👩👩👧👦 6. सामूहिक स्त्री-संस्कृति
गीत में माँ-बेटी, ननंद-भोजाई, देवरानी-जेठानी, सास-बहू, पड़ोसन—सबका उल्लेख है। इससे स्पष्ट होता है कि गणगौर पूजा व्यक्तिगत नहीं बल्कि सामूहिक पर्व है, जो स्त्रियों को एक सूत्र में बाँधता है।
🌸 7. समृद्धि और सौभाग्य का आशीर्वाद
अंतिम पंक्तियों में दूध की दवणी, बच्चे का पालना, सुखमय दांपत्य और सोने-सा उजला जीवन वर्णित है। “गरबो भान टूटयो” जैसी पंक्तियाँ लोकमान्यता के अनुसार दुःख और दुर्भाग्य के अंत का संकेत देती हैं।
🔸 निष्कर्ष
यह परंपरागत निमाड़ी गणगौर गीत केवल एक लोकधुन नहीं, बल्कि नारी जीवन, पारिवारिक मूल्यों और ग्रामीण संस्कृति का दस्तावेज़ है। इसमें आस्था है, लोकज्ञान है और जीवन की सरल इच्छाएँ हैं। यही कारण है कि ये गीत पीढ़ी दर पीढ़ी आज भी जीवित हैं और निमाड़ की पहचान बने हुए हैं 🌺



