निमाड़ी कलाकार

“तुमक सत् सन् नमन गुरुजी म्हारा”

तुमक सत् सन् नमन – गुरुजी म्हारा | Nimadi Lokgeet Lyrics | Nimar Lok Sangeet

तुमक सत् सन् नमन – गुरुजी म्हारा | Nimadi Lokgeet Lyrics | Nimad Lok Sangeet

“तुमक सत् सन् नमन गुरुजी म्हारा”

About This Song 

SINGER : GITESH KUMAR BHARGAVA

      LYRICS  : PANKAJ PARMAR

 

“तुमक सत् सन् नमन गुरुजी म्हारा”  निमाड़ी भाषा का एक अत्यंत आध्यात्मिक लोकभजन

गीत में—
  • गुरु की महिमा

  • देह के रहस्य

  • शिव–ब्रह्मा–विष्णु की उपस्थिति

  • दस द्वार (दश-द्वार)

  • मोक्ष का मार्ग

  • कबीर का ज्ञान

जैसे अद्वैत तत्वों का बहुत सुंदर वर्णन है।
यह भजन निमाड़ के लोकसंगीत में अत्यंत लोकप्रिय है और गाँव–गाँव में गाया जाता है।

🎵 तुम क सत् सन् नमन – गुरुजी म्हारा 

 

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“ गुरु गोविन्द्र दोऊ एक है, दुजा सब आकार

आपा मेटे हरि भजे, तब पावे दीदार ”

तुमक सत् सन् नमन हमारो रे गुरुजी म्हारा,
हो एनी काया को भेद बतायो रे गुरुजी म्हारा।


अंतरा 1

एनी रे काया म गुरु म्हारा चंदा न सूरज – (2)
असा ए म ही नवलख तारा रे गुरुजी म्हारा।


अंतरा 2

एनी रे काया म गुरु म्हारा ब्रह्मान विष्णु,
असा एम ही शिव समाया रे गुरुजी म्हारा।


अंतरा 3

एनी रे काया म गुरु म्हारा सात समन्दर,
असा कोई मीठा न कोई खारा रे गुरुजी म्हारा।


अंतरा 4

एनी रे काया म गुरु म्हारा दस दखाजा,
असा एम ही बैकुण्ठ द्वारा रे गुरुजी म्हारा।


अंतरा 5

कहत कबीरा, सुनो धर्मदासा,
करो लख चौरासी सी पार रे गुरुजी म्हारा।

         SONG CREDITS TO

• Song: Tumak Sat San Naman – Guruji Mhaara
• Genre: Nimadi Lokgeet / Guru Bhakti
• Language: Nimadi (Nimaadi)
• Region: Nimar / Nimad (MP)
• Type: Bhakti / Adhyatmik Lokgeet

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🌼 Lyrics ( English )

“Guru Govindr dou ek hai, duja sab aakaar
Aapa mete Hari bhaje, tab paave deedaar”

Tumak sat san naman hamaaro re Guruji mhaara,
Ho eni kaaya ko bhed bataayo re Guruji mhaara.


Antra 1

Eni re kaaya me Guru mhaara chanda n sooraj – (2)
Asa em hi navlakh taara re Guruji mhaara.


Antra 2

Eni re kaaya me Guru mhaara Brahma n Vishnu,
Asa em hi Shiv samaaya re Guruji mhaara.


Antra 3

Eni re kaaya me Guru mhaara saat samandar,
Asa koi meetha n koi khaara re Guruji mhaara.


Antra 4

Eni re kaaya me Guru mhaara das dakhaja,
Asa em hi Baikunth dwaara re Guruji mhaara.


Antra 5

Kahat Kabira, suno Dharmdasa,
Karo lakh chauraasi si paar re Guruji mhaara.



🌿 Detailed Explanation (भावार्थ / Meaning)

 दोहे का भावार्थ

“Guru Govindr dou ek hai…”
कबीर साहब कहते हैं कि गुरु और गोविंद (ईश्वर) एक ही हैं। बाकी सब केवल बाहरी रूप और आडंबर हैं। जब व्यक्ति अपने अहंकार (आपा) को मिटाकर हरि-भजन करता है, तब उसे साक्षात ईश्वर का दर्शन होता है।
👉 अर्थात, ईश्वर तक पहुँचने का सच्चा मार्ग गुरु के माध्यम से ही है।


 मुखड़े का भाव

“Tumak sat san naman hamaaro…”
कवि गुरु को सच्चे मन से नमन करता है और कहता है कि गुरु ने इस देह (काया) का रहस्य समझाया। यह काया केवल मांस-पिंड नहीं, बल्कि ब्रह्म का निवास स्थान है।


अंतरा 1 – गुरु ब्रह्मांड के प्रकाश हैं

इस अंतरे में कहा गया है कि इस शरीर के भीतर ही

  • चाँद

  • सूरज

  • और करोड़ों तारे

विद्यमान हैं।
भाव यह है कि पूरा ब्रह्मांड मानव देह के भीतर समाया हुआ है, और गुरु ही हमें इस दिव्य सत्य का बोध कराते हैं।


अंतरा 2 – त्रिदेव का वास

यहाँ गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और शिव के स्वरूप में बताया गया है।
अर्थात —

  • सृजन

  • पालन

  • और संहार

तीनों शक्तियाँ मानव काया में विद्यमान हैं। गुरु हमें यह ज्ञान देते हैं कि ईश्वर बाहर नहीं, अपने भीतर ही स्थित है


 अंतरा 3 – समता और संतुलन का संदेश

इस अंतरे में कहा गया है कि इस देह में सात समंदर भी हैं, जिनमें

  • कोई मीठा नहीं

  • कोई खारा नहीं

भाव यह है कि आत्मिक जगत में द्वंद्व नहीं होता। वहाँ सुख-दुख, अच्छा-बुरा, मीठा-खारा जैसे भेद समाप्त हो जाते हैं।


अंतरा 4 – काया ही बैकुंठ

यहाँ कहा गया है कि इस शरीर में ही दसों दिशाएँ और बैकुंठ का द्वार है।
मतलब —
👉 स्वर्ग, वैकुंठ या मुक्ति कहीं बाहर नहीं, बल्कि इसी देह और इसी जीवन में संभव है, यदि गुरु का ज्ञान प्राप्त हो जाए।


 अंतरा 5 – जन्म-मरण से मुक्ति

अंतिम अंतरे में कबीर साहब धर्मदास से कहते हैं कि
यदि गुरु-ज्ञान को धारण कर लिया जाए,
तो लाख चौरासी योनियों के चक्र से मुक्ति मिल सकती है।
यही मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य है।


 संपूर्ण निष्कर्ष

यह भजन हमें सिखाता है कि —

  • गुरु और ईश्वर अलग नहीं हैं

  • मानव काया स्वयं एक ब्रह्मांड है

  • सच्चा ज्ञान भीतर की यात्रा से मिलता है

  • गुरु-कृपा से जन्म-मरण का बंधन टूट जाता है

यह भजन निर्गुण भक्ति और आत्म-बोध का अत्यंत गूढ़ संदेश देता है।

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