सिंगाजी महाराज का प्रसिद्ध निमाड़ी भजन
करा हाथ जोड़ अरदास

SINGER – SHREE RAMESH MAHARAJ JI
निमाड़ की संत परंपरा के महान संत सिंगाजी महाराज की वाणी गुरु-भक्ति, आत्मसमर्पण और सहज साधना का अनुपम उदाहरण है। यह भजन “करा हाथ जोड़ अरदास” एक साधक की करुण पुकार है, जिसमें तीर्थ, व्रत और शास्त्रीय ज्ञान से ऊपर उठकर गुरु कृपा को ही जीवन-उद्धार का मार्ग बताया गया है। भक्ति, प्रेम और वैराग्य से ओत-प्रोत यह निमाड़ी भजन आज भी जनमानस को भीतर से जाग्रत करता है और गुरु शरण की महिमा का बोध कराता है।
करा हाथ जोड़ अरदास, शरण म लिजो, शरण म लिजो,
म्हारा गुरुजी मख, भक्ति दान दई दिजो।
नही जाऊँ तीरथ बरत म, न गंगा नी नहाऊँ,
न गंगा नी नहाऊँ,
साहेब जी म्हारा गुरुजी,
हाऊँ सदा शरण सुख पाऊँ।
नही जानूँ वेद पुराण, गुरुजी ख ध्याऊँ,
गुरुजी ख ध्याऊँ,
साहेब जी म्हारा गुरुजी,
हाऊँ गुरु चरण चित लाऊँ।
भक्ति की बेल कुम्भलाई, प्रेम जल सिंचो,
प्रेम जल सिंचो,
म्हारा गुरुजी साहेब जी,
मख भक्ति दान दई दीजो।
भगति की ज्योत जगाओ, जगाओ म्हारा मन म,
जगाओ म्हारा मन म,
आसा सकल तीरथ ख,
बताई देवो इना तन म।
कस्तूरी खोज म मृग, फिर रे वन–वन म,
फिर रे वन–वन म,
असो भटकी रयो यो जीव,
इना नर तन म।
कसी करूँ पूजा अरदास, कसा तुम रीझो,
कसा तुम रीझो,
म्हारा गुरुजी साहेब जी,
मख भक्ति दान दई दिजो।
कसा भव सी उतरंगा पार, सागर छे गहरो,
सागर छे गहरो,
आसा हम भी चलंगा साथ,
गुरुजी जरा ठहरो।
नही सुन यो मन की पुकार, समय छे बहरो,
समय छे बहरो,
यहाँ आठों याम तैनात,
काल को पहरो।
गुरु दे अमरत को प्यालों, ज्ञानी जन पीजो,
ज्ञानी जन पीजो,
म्हारा गुरुजी मख,
भक्ति दान दई दिजो।
Kara haath jod ardaas, sharan ma lijo, sharan ma lijo,
Mhara guruji makh, bhakti daan dai dijo.
Nahi jaaun teerath barat ma, na Ganga ni nahaun,
Na Ganga ni nahaun,
Saheb ji mhara guruji,
Haun sada sharan sukh paaun.
Nahi jaanun Ved Puran, guruji kha dhyaun,
Guruji kha dhyaun,
Saheb ji mhara guruji,
Haun guru charan chit laaun.
Bhakti ki bel kumbhlaai, prem jal sincho,
Prem jal sincho,
Mhara guruji saheb ji,
Makh bhakti daan dai dijo.
Bhagati ki jyot jagao, jagao mhara man ma,
Jagao mhara man ma,
Aasa sakal teerath kha,
Batai devo ina tan ma.
Kasturi khoj ma mrig, phir re van–van ma,
Phir re van–van ma,
Aso bhatki rayo yo jeev,
Ina nar tan ma.
Kasi karun pooja ardaas, kasa tum rijho,
Kasa tum rijho,
Mhara guruji saheb ji,
Makh bhakti daan dai dijo.
Kasa bhav si utaranga paar, saagar chhe gehro,
Saagar chhe gehro,
Aasa hum bhi chalanga saath,
Guruji zara thahro.
Nahi sun yo man ki pukaar, samay chhe bahro,
Samay chhe bahro,
Yahaan aathon yaam tainaat,
Kaal ko pahro.
Guru de amrat ko pyaalo, gyaani jan peejo,
Gyaani jan peejo,
Mhara guruji makh,
Bhakti daan dai dijo.
🙏 “करा हाथ जोड़ अरदास”🙏

व्याख्या
यह भजन गुरु-भक्ति, आत्मसमर्पण और आंतरिक साधना का अत्यंत गहन प्रतीक है। संत सिंगाजी महाराज ने सरल निमाड़ी भाषा में जीवन का सबसे बड़ा सत्य बताया है कि मोक्ष, शांति और सुख का मार्ग बाहरी आडंबरों में नहीं, बल्कि गुरु शरण में है।
1. गुरु शरण की करुण पुकार
“करा हाथ जोड़ अरदास, शरण म लिजो…”
भजन की शुरुआत एक विनम्र प्रार्थना से होती है। भक्त हाथ जोड़कर गुरु से शरण मांगता है और किसी सांसारिक वस्तु की नहीं, बल्कि भक्ति-दान की याचना करता है। यह दर्शाता है कि सच्चा साधक केवल ईश्वर और गुरु की कृपा चाहता है।
2. बाह्य तीर्थ और कर्मकांड का त्याग
“नही जाऊँ तीरथ बरत म, न गंगा नी नहाऊँ…”
यहाँ संत कहते हैं कि तीर्थ, व्रत, स्नान जैसे बाहरी कर्म तब तक निरर्थक हैं, जब तक मन गुरु-शरण में न हो। गुरु की शरण में रहने से ही वास्तविक सुख और शांति प्राप्त होती है।
3. शास्त्र ज्ञान से ऊपर गुरु ध्यान
“नही जानूँ वेद पुराण, गुरुजी ख ध्याऊँ…”
संत सिंगाजी महाराज शास्त्रीय विद्वता को नकारते नहीं, पर स्पष्ट करते हैं कि गुरु ध्यान ही सर्वोच्च साधना है। गुरु के चरणों में चित्त लगाना ही जीवन की सार्थकता है।
4. भक्ति को जीवित रखने का संदेश
“भक्ति की बेल कुम्भलाई, प्रेम जल सिंचो…”
भक्ति को एक बेल के रूप में बताया गया है, जो प्रेम रूपी जल से ही पनपती है। बिना प्रेम के भक्ति सूख जाती है। यहाँ गुरु से प्रार्थना है कि वे भक्ति का दान दें, ताकि साधक का जीवन फलदायी बने।
5. शरीर में ही तीर्थ की अनुभूति
“भगति की ज्योत जगाओ… सकल तीरथ इना तन म…”
संत बताते हैं कि यदि मन में भक्ति की ज्योत जल जाए, तो सभी तीर्थ इस शरीर में ही प्रकट हो जाते हैं। आत्मज्ञान ही सच्चा तीर्थ है।
6. कस्तूरी मृग का रूपक
“कस्तूरी खोज म मृग, फिर रे वन–वन म…”
यह प्रसिद्ध आध्यात्मिक उपमा है। जैसे कस्तूरी मृग सुगंध को बाहर खोजता है, जबकि वह उसी के भीतर होती है, वैसे ही यह जीव सुख और ईश्वर को बाहर खोजता फिरता है, जबकि सत्य उसके भीतर ही है।
7. साधक की असहायता
“कसी करूँ पूजा अरदास, कसा तुम रीझो…”
यहाँ भक्त अपनी अज्ञानता स्वीकार करता है और कहता है कि वह नहीं जानता कि ईश्वर को कैसे प्रसन्न किया जाए। अंततः वही प्रार्थना—भक्ति का दान।
8. संसार सागर और गुरु नाव
“कसा भव सी उतरंगा पार, सागर छे गहरो…”
संसार को गहरे सागर की संज्ञा दी गई है। गुरु ही वह नाव हैं, जिनके बिना इस भव-सागर को पार करना असंभव है। शिष्य गुरु से साथ चलने की विनती करता है।
9. समय और काल का भय
“नही सुन यो मन की पुकार… काल को पहरो…”
यह पंक्तियाँ जीवन की नश्वरता को दर्शाती हैं। समय बहिरा है, काल हर क्षण तैनात है। इसलिए विलंब नहीं, अब ही गुरु शरण आवश्यक है।
10. अमृत का प्याला – गुरु ज्ञान
“गुरु दे अमरत को प्यालों…”
अंत में गुरु से ज्ञान-अमृत का वरदान मांगा गया है, जिसे केवल ज्ञानी और जागरूक जन ही पी सकते हैं। यही अमृत जन्म-मरण के बंधन से मुक्त करता है।
भजन का मूल संदेश
गुरु ही ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग हैंबाहरी आडंबर नहीं, आंतरिक भक्ति आवश्यकप्रेम से सिंचित भक्ति ही फल देती हैआत्मज्ञान ही सच्चा तीर्थ है



