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कसा बिकिगा हीरा रे राजा हरिश्चंद्र गीत के lyrics – Uddhav Bhai Yadav

कसा बिकिगा हीरा रे – राजा हरिश्चंद्र गीत – उद्धव भाई यादव | Lyrics

 कसा बिकिगा हीरा रे – राजा हरिश्चंद्र गीत – उद्धव भाई यादव 

✍️ Intro

कसा बिकिगा हीरा रे” एक लोकप्रिय हिंदू भक्ति गीत है जो सत्य और धर्म के प्रतीक राजा हरिश्चंद्र की कथा पर आधारित है। प्रसिद्ध लोकगायक उद्धव भाई यादव द्वारा गाया गया यह गीत राजा हरिश्चंद्र के बलिदान, सत्यनिष्ठा, और गहरे आध्यात्मिक संदेश को निमाड़ी लोकशैली में प्रस्तुत करता है।
यहाँ आप इस प्रेरणादायी भक्ति गीत के संपूर्ण lyrics पढ़ सकते हैं
कसा बिकीगा हीरा रे
कसा बिकिगा हीरा रे – राजा हरिश्चंद्र भक्ति गीत

🎵कसा बिकीगा हीरा रे – राजा हरिश्चंद्र का सत्य और त्याग भजन

📌 Song Details 

कसा बिकीगा हीरा रे, काशी का बजार म कसा विकिगा हीरा


(1) पहला अंतरा

रोहित तारावती बामण का घर
बिकी गया एक साथ बिक्या हरिशचन्द्र
चांडाल का घर देखी नही जात
एक घड़ी म राजा बण्या फकीरा रे
कसा बिकीगा हीरा रे…


(2) दूसरा अंतरा

पाणी लेण जाय दुवय साथ म
गंगा जी का घाट
अछूत का घर हरिशचंद
तारा नी उठाव माथ
सत मारग तो रगती बड़ी कठीन रे
या वाट गंभीरा रे
कसा बिकीगा हीरा रे …


(3) तीसरा अंतरा

रोहित क ग्यो सांप
दसी न बद हुई रे सास
बिना पैसा सी हरिश्चंद्र
वा का बालन नी दे लाश
वा रे विधाता थारा हाथ की…
अमी ट लकीरा रे
कसा बिकीगा हीरा रे …

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🎵 Kasa Bikiga Heera Re Raja Harishchandra Bhajan – Lyrics

Raja Harishchandra Song

Kasa bikiga heera re,
Kashi ka bazaar mein kasa bikiga heera॥


(1) Pehla Antara

Rohit Tarawati baman ka ghar,
Biki gaya ek saath bikya Harishchandra।
Chandal ka ghar dekhi nahi jaat,
Ek ghadi mein raja banya fakira re।

Kasa bikiga heera re…


(2) Doosra Antara

Paani len jaay duvay saath mein,
Ganga ji ka ghaat।
Achhoot ka ghar Harishchand,
Taara ni uthaav maath।

Sat maarg to ragti badi kathin re,
Ya vaat gambheera re।

Kasa bikiga heera re…


(3) Teesra Antara

Rohit ko gayo saanp,
Dasi n bad hui re saans।
Bina paisa si Harishchandra,
Va ka baalan ni de laash।

Va re vidhata, thaara haath ki,
Amit si lakeera re।

Kasa bikiga heera re…

भूमिका : भजन का भाव और पृष्ठभूमि

यह भजन राजा हरिश्चंद्र की पौराणिक कथा पर आधारित है, जिन्हें भारतीय संस्कृति में सत्य, वचन-पालन और त्याग का सर्वोच्च प्रतीक माना जाता है। “कसा बिकीगा हीरा रे” में हीरा शब्द राजा हरिश्चंद्र के सत्य जैसे अमूल्य चरित्र का प्रतीक है। भजन यह प्रश्न करता है कि इतना अनमोल सत्य और धर्म भरे संसार में आखिर कैसे बिक सकता है?

काशी का बाजार यहाँ दुनियावी संसार का प्रतीक है, जहाँ धन, जाति और स्वार्थ का बोलबाला है, लेकिन सत्य का मूल्य कोई नहीं समझता।


मुखड़ा (स्थायी पंक्ति) की व्याख्या

“कसा बिकीगा हीरा रे, काशी का बजार म कसा विकिगा हीरा”

इस पंक्ति में कवि गहरे व्यंग्य और करुणा के साथ प्रश्न करता है—
सत्य जैसा अनमोल हीरा इस संसार के बाजार में कैसे बिकेगा?

काशी जैसे पवित्र नगर में भी, जहाँ धर्म और मोक्ष की बात होती है, वहाँ भी सत्य और नैतिकता को कोई खरीदने को तैयार नहीं। यह पंक्ति पूरे भजन का केंद्रीय भाव है—
👉 सत्य अमूल्य है, लेकिन संसार उसे समझ नहीं पाता।


पहला अंतरा : त्याग की शुरुआत

**“रोहित तारावती बामण का घर

बिकी गया एक साथ बिक्या हरिशचन्द्र”**

यहाँ राजा हरिश्चंद्र की सबसे बड़ी परीक्षा दिखाई देती है।

  • अपने वचन को निभाने के लिए वे अपनी पत्नी तारावती और पुत्र रोहित तक को ब्राह्मण के हाथों बेच देते हैं।

  • यह केवल परिवार को बेचने की घटना नहीं, बल्कि राजा का अपने सुख, मान और मोह का त्याग है।

यह पंक्ति दर्शाती है कि सत्य के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति सबसे पहले अपने निजी सुखों का बलिदान देता है।


**“चांडाल का घर देखी नही जात

एक घड़ी म राजा बण्या फकीरा रे”**

राजा हरिश्चंद्र, जो कभी महलों में रहते थे, अब चांडाल के घर पहुँच जाते हैं।

  • समाज की नजर में यह सबसे नीची जाति मानी जाती थी।

  • लेकिन सत्य के लिए राजा जाति, मान-मर्यादा और अहंकार सब त्याग देते हैं।

“एक घड़ी में राजा से फकीर” बन जाना इस बात का प्रतीक है कि सत्य के मार्ग पर पद, वैभव और सम्मान क्षण में छिन सकते हैं, लेकिन आत्मा अडिग रहती है।


दूसरा अंतरा : सत्य का कठिन मार्ग

**“पाणी लेण जाय दुवय साथ म

गंगा जी का घाट”**

तारावती अपने पुत्र रोहित के साथ गंगा घाट पर पानी लेने जाती हैं।
गंगा यहाँ पवित्रता और आशा का प्रतीक है, लेकिन उनके जीवन में दुखों की लहरें लगातार बह रही हैं।


**“अछूत का घर हरिशचंद

तारा नी उठाव माथ”**

यह पंक्ति सामाजिक पीड़ा को उजागर करती है।

  • हरिश्चंद्र चांडाल के घर रहते हैं।

  • तारावती सामाजिक अपमान के कारण अपना सिर नहीं उठा पातीं।

यह केवल व्यक्तिगत दुख नहीं, बल्कि उस समाज की कठोर सच्चाई है जहाँ सत्यवान भी अपमानित होता है।


**“सत मारग तो रगती बड़ी कठीन रे

या वाट गंभीरा रे”**

यह भजन का सबसे गहरा संदेश है।

  • सत्य का मार्ग सीधा नहीं, बल्कि अत्यंत कठिन और पीड़ादायक है।

  • यह रास्ता हर किसी के बस का नहीं।

कवि स्पष्ट करता है कि सत्य की राह पर चलने वाला व्यक्ति अकेला पड़ जाता है, लेकिन वही मार्ग अंततः महान बनाता है।


तीसरा अंतरा : चरम पीड़ा और परीक्षा

**“रोहित क ग्यो सांप

दसी न बद हुई रे सास”**

यहाँ कथा सबसे दर्दनाक मोड़ पर पहुँचती है।

  • रोहित को साँप डस लेता है और उसकी मृत्यु हो जाती है।

  • माँ तारावती का दुःख असहनीय हो जाता है।

यह दृश्य पाठक और श्रोता के हृदय को झकझोर देता है।


**“बिना पैसा सी हरिश्चंद्र

वा का बालन नी दे लाश”**

हरिश्चंद्र चांडाल के रूप में श्मशान में काम करते हैं।

  • उनके पास दाह-संस्कार के लिए आवश्यक धन नहीं है।

  • इसलिए वे अपने ही पुत्र की लाश जलाने की अनुमति नहीं दे पाते।

यहाँ सत्य की परीक्षा अपनी चरम सीमा पर है—
👉 पिता अपने पुत्र का अंतिम संस्कार भी नहीं कर पा रहा।


**“वा रे विधाता थारा हाथ की…

अमी ट लकीरा रे”**

इस पंक्ति में कवि विधाता (ईश्वर) से प्रश्न करता है।

  • तुम्हारे हाथों की लिखी रेखाएँ कितनी कठोर हैं।

  • क्या सत्य की परीक्षा इतनी निष्ठुर होनी चाहिए?

यह प्रश्न ईश्वर से शिकायत नहीं, बल्कि मानवीय पीड़ा की पुकार है।


निष्कर्ष : भजन का सार

कसा बिकीगा हीरा रे” केवल राजा हरिश्चंद्र की कथा नहीं है।
यह भजन हमें सिखाता है कि—

  • सत्य सबसे अनमोल हीरा है

  • त्याग बिना सत्य अधूरा है

  • धर्म का मार्ग कठिन है, लेकिन वही अमरता देता है

राजा हरिश्चंद्र की तरह जो सत्य पर अडिग रहता है, वही अंततः इतिहास में अमर हो जाता है।

यह भजन आज के समय में भी हमें आत्मचिंतन के लिए मजबूर करता है—
👉 क्या हम सत्य के लिए इतना त्याग कर सकते हैं?

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