निमाड़ी कलाकार

आग रे झड़ – Nimadi song lyrics 2026

आग रे झड़ – Nimadi song lyrics 2026

आग रे झड़ - Nimadi song lyrics 2026
आग रे झड़ – Nimadi song lyrics 2026

Singer – Gitesh Kumar Bhargava

Lyrics – Rajesh Bhai Revaliya 


आग रे झड़ - Nimadi song lyrics 2026
आग रे झड़ – Nimadi song lyrics 2026

आग रे झड़

तावड़ो पड़ रे तेज़ घामलो पड़
जेठ का महीना म , आग रे झड़

याणा म सी चलन लग ताती ताती व्हाळा
दुफरी म लग जैसी आग जंजाळ
चिडया चिदाय का जसो पंख फड़फड़
जेठ का महीना म , आग रे झड़

बफारा का मरे असो जीव घबराय
चार कदम चलन म हपादो भराय
याणी सी संजा तक खूब तड़ तड़
जेठ का महीना म , आग रे झड़

नहीं मिल पिपला नहीं लीमड़ा की छाव
दूर दूर तक कोई नज़र नई आव
पंखा कूलर भी खूब भड़ भड़
जेठ का महीना म , आग रे झड़


Jeth ka mahina m, Aag re jhad

आग रे झड़ - Nimadi song lyrics 2026
आग रे झड़ – Nimadi song lyrics 2026

Taavdo pad re tej ghamlo pad
Jeth ka mahina m, Aag re jhad

Yaana m si chalan lag taati taati whaala
Dufri m lag jaisi aag janjaal
Chidaya chiday ka jaso pankh fadfad
Jeth ka mahina m, Aag re jhad

Bafaara ka mare aso jeev ghabraay
Chaar kadam chalan m hapaado bharaay
Yaani si sanja tak khoob tad tad
Jeth ka mahina m, Aag re jhad

Nahi mil pipla nahi leemda ki chhaav
Door door tak koi nazar nai aav
Pankha cooler bhi khoob bhad bhad
Jeth ka mahina m, Aag re jhad


यह गीत निमाड़ क्षेत्र की भीषण गर्मी और जेठ महीने की तपती दोपहर का जीवंत चित्र प्रस्तुत करता है। गीत में ग्रामीण जीवन, प्रकृति और इंसानों की हालत को बहुत ही सरल लेकिन प्रभावशाली निमाड़ी शब्दों में दिखाया गया है। पूरा गीत हास्य और देसी अंदाज़ के साथ गर्मी की कठिनाई को दर्शाता है।

मुखड़ा

“तावड़ो पड़ रे तेज़ घामलो पड़,
जेठ का महीना म , आग रे झड़”

यहाँ कवि कहता है कि जेठ के महीने में इतनी तेज धूप और गर्मी पड़ रही है मानो आसमान से आग बरस रही हो। “आग रे झड़” एक लोक शैली का प्रयोग है जो गर्मी की तीव्रता को बढ़ा-चढ़ाकर मजेदार तरीके से व्यक्त करता है।


पहला अंतरा

“याणा म सी चलन लग ताती ताती व्हाळा,
दुफरी म लग जैसी आग जंजाळ”

चारों दिशाओं से गर्म हवाएँ चल रही हैं। दोपहर का समय ऐसा लगता है जैसे चारों तरफ आग फैल गई हो। “आग जंजाळ” शब्द गर्मी की बेचैनी और कठिन परिस्थिति को दर्शाता है।

“चिडया चिदाय का जसो पंख फड़फड़”

भीषण गर्मी से पक्षी भी परेशान हैं और अपने पंख फड़फड़ाकर राहत पाने की कोशिश कर रहे हैं। यह पंक्ति प्रकृति पर गर्मी के प्रभाव को दिखाती है।


दूसरा अंतरा

“बफारा का मरे असो जीव घबराय”

उमस और गर्मी इतनी ज्यादा है कि इंसान का मन घबराने लगता है।

“चार कदम चलन म हपादो भराय”

सिर्फ चार कदम चलने में ही सांस फूल जाती है। यह गर्मी की तीव्रता और शरीर पर उसके असर को दर्शाता है।

“याणी सी संजा तक खूब तड़ तड़”

सुबह से शाम तक गर्मी लगातार तड़तड़ाती रहती है, यानी पूरे दिन चैन नहीं मिलता।


तीसरा अंतरा

“नहीं मिल पिपला नहीं लीमड़ा की छाव”

गर्मी से बचने के लिए कहीं पीपल या नीम के पेड़ की छाया भी नहीं मिल रही।

“दूर दूर तक कोई नज़र नई आव”

चारों ओर सूना और तपता हुआ वातावरण दिखाई देता है।

“पंखा कूलर भी खूब भड़ भड़”

इतनी गर्मी है कि पंखे और कूलर भी लगातार चलने के बावजूद राहत नहीं दे पा रहे। “भड़ भड़” शब्द मशीनों की आवाज़ और गर्मी की बेचैनी दोनों को मजेदार ढंग से व्यक्त करता है।


गीत का सार

यह गीत निमाड़ क्षेत्र की लोकभाषा और देसी हास्य शैली में जेठ महीने की भीषण गर्मी का वर्णन करता है। इसमें इंसान, पक्षी, वातावरण और ग्रामीण जीवन सभी पर गर्मी के असर को मनोरंजक अंदाज़ में दिखाया गया है। गीत सुनने वाले को हँसी भी आती है और वह गर्मी की स्थिति को महसूस भी कर पाता है।

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