बसंत बीती जाय – Nimadi basant geet Lyrics 2026

🔰 गीत का परिचय
लेखक – राजेश रेवलिया
संपादक – गीतेश कुमार भार्गव
“बसंत बीती जाय” एक अत्यंत मार्मिक और भावनात्मक निमाड़ी लोकगीत है, जिसे राजेश भाई रेवलिया जी ने लिखा है।
इस गीत को अपनी सधी हुई और भावों से भरी आवाज़ में गायक गितेश कुमार भार्गव ने प्रस्तुत किया है।
यह गीत निमाड़ी कलाकार YouTube चैनल पर उपलब्ध है और निमाड़ अंचल की लोक-संस्कृति, विरह-वेदना और नारी-मन की गहराई को अत्यंत सुंदर रूप में दर्शाता है।
यह गीत उस नायिका की पीड़ा को दर्शाता है, जो अपने प्रिय के परदेश जाने के बाद बसंत जैसे आनंदमय ऋतु में भी विरह और अकेलेपन का अनुभव कर रही है। लोकभाषा में रचा गया यह गीत सीधे दिल को छू जाता है।
बसंत बीती जाय

बसंत बीती जाय ओ सखी बाई बसंत बित्यो जाय हो ,
पिया को संदेसो नहीं आयो वह सखी बाई , बसंत बीती जाय हो
पिया गया म्हारा जबसि परदेश , आयो नहीं कोई उनको सन्देश
पिया बिना मन घबराय रे सखी बाई।।। बसंत बीती जाय हो
पिया बिना सब सुनो श्रृंगार , पिया का गम म हुयी गयी लाचार
भाव नई सोलह श्रृंगार ओ सखी बाई , बसंत बीती जाय हो
बिन भंवरा का जसी काली मुरझाई , जबसि गे म्हारी याद नी आयी
सुनी सेज नी सुहाय वह सखी बाई , बसंत बीती जाय हो
Basant Beeti Jaay

Basant beeti jaay o sakhi bai, basant bityo jaay ho,
Piya ko sandeso nahin aayo wah sakhi bai, basant beeti jaay ho.
Piya gaya mhara jabsi pardes,
Aayo nahin koi unko sandes,
Piya bina mann ghabraay re sakhi bai,
Basant beeti jaay ho.
Piya bina sab suno shringaar,
Piya ka gham mein hui gayi laachaar,
Bhaav na aaye solah shringaar,
O sakhi bai, basant beeti jaay ho.
Bin bhanwara ka jaisi kaali murjhaayi,
Jabsi ge mhari yaad na aayi,
Suni sej na suhaay wah sakhi bai,
Basant beeti jaay ho.
📖 गीत का विस्तृत भावार्थ

🌸 1. “बसंत बीती जाय ओ सखी बाई…”
गीत की शुरुआत नायिका के विलाप से होती है।
वह अपनी सखी से कहती है कि बसंत ऋतु बीतती जा रही है, लेकिन उसके प्रिय का कोई संदेश नहीं आया।
यहाँ बसंत आनंद, प्रेम और उल्लास का प्रतीक है,
लेकिन नायिका के जीवन में बसंत भी दुख बन गया है।
🏞️ 2. “पिया गया म्हारा जबसि परदेश…”
इस अंतरे में नायिका बताती है कि जब से उसका प्रिय परदेश गया है, तब से उसका कोई समाचार नहीं मिला।
न कोई चिट्ठी
न कोई संदेश
न कोई खबर
प्रिय के बिना उसका मन घबराया रहता है और हर पल बेचैनी बनी रहती है।
यह विरह की उस अवस्था को दर्शाता है, जहाँ प्रतीक्षा ही जीवन बन जाती है।
💍 3. “पिया बिना सब सुनो श्रृंगार…”
इस हिस्से में नायिका कहती है कि:
प्रिय के बिना सारे श्रृंगार व्यर्थ हैं
सोलह श्रृंगार भी उसे आनंद नहीं दे पा रहे
वह प्रिय के ग़म में इतनी लाचार हो गई है कि सजना-संवरना भी बोझ लगने लगा है।
यह दर्शाता है कि प्रेम केवल बाहरी सौंदर्य नहीं, बल्कि आत्मा का संबंध है।
🐝 4. “बिन भंवरा का जसी काली मुरझाई…”
यह बहुत ही सुंदर उपमा है।
नायिका स्वयं की तुलना एक ऐसी कली से करती है:
जिसमें भंवरा नहीं आता
जो बिना प्रेम के मुरझा जाती है
प्रिय के बिना वह सूनी हो गई है, उसकी सेज भी अब उसे नहीं सुहाती।
यह पंक्तियाँ नारी के एकांत, विरह और भावनात्मक सूनेपन को गहराई से दर्शाती हैं।
🌿 गीत का भाव और महत्व
यह गीत निमाड़ी लोक-संवेदना का सशक्त उदाहरण है
स्त्री-मन की पीड़ा, प्रतीक्षा और प्रेम को सरल शब्दों में व्यक्त करता है
लोकभाषा, भाव और संगीत—तीनों का सुंदर संगम है
“बसंत बीती जाय” केवल एक गीत नहीं, बल्कि विरह में डूबी एक आत्मा की पुकार है।


