ब्रजभान दुलारी चली होली खेलन को | ब्रज होली फाग लोकगीत | Rajesh Bhai Revaliya

🎶 होली लोकगीत : ब्रजभान दुलारी चली होली खेलन को
लेखक (Lyrics): उस्ताद मुरली दादा
गायक (Singer): राजेश भाई रेवळिया
गीत प्रकार: ब्रज / होली लोकगीत
भाषा: हिंदी (ब्रज भाव)
🎼 स्थायी (मुखड़ा)
बृजभान दुलारी चली होली खेलन को,
हो महाराज… जहाँ पर रहे मुरारी जी।
भर-भर रंग की ले पिचकारी राधा प्यारी जी…
क्या धूम मची होली की आज गोकुल में,
हो महाराज, कही न मुख से जाई जी।
रंग-बिरंगे हुए वहाँ पर कृष्ण कन्हाई जी…
🎼 अंतरा 1
धेर किशन को लिया सभी सखियों ने,
ओ महाराज… रंग बहुरंग उड़ाई जी।
भर-भर रंग की ले पिचकारी राधा प्यारी जी…
झेला
देखण आये होली आये, वहाँ ब्रजवासी,
रहे जहीं पर राधा संग अविनाशी।
ओ महाराज… रंग में भीगे गिरधारी जी…
भर-भर रंग की ले पिचकारी राधा प्यारी जी…
🎼 अंतरा 2
मौका पाके घेरे किशन राधे को,
ओ महाराज… रंग सब ऊपर डाली जी।
भींगी तन की साड़ी कुसुम्बी, ऊपर चोली जी।
हुए कृष्ण के संग सभी ब्रज ग्वाले,
ओ महाराज… बनाकर अपनी टोली जी।
ग्वाल-बालू सब खेल रहे फागुन की होली जी।
झेला
तरह-तरह के रंग किशन बरसाए,
केशर सारे कुंज-कुंज महकाए।
ओ महाराज… छवि है जग से न्यारी जी…
भर-भर रंग की ले पिचकारी राधा प्यारी जी…
🎼 अंतरा 3
क्या बाजे छप्पन बजे और शहनाई,
ओ महाराज… ताल-चौताल बजाई जी।
निरख राधे-कृष्ण वहाँ पर खुशियाँ छाई जी।
देखन होली आये वहीं सुर सारे,
ओ महाराज… पुष्पों की झड़ी लगाई जी।
उठा के मुरली कृष्णचंद्र ने राग सुनाई जी।
झेला
झूम उठे सब नार वहीं मतवाली,
जैसे बगिया में खिले फूल की डाली।
ओ महाराज… खुशी है नगरी सारी जी।
उठा के मुरली उनके कृष्णचंद्र ने राग सुनाई जी,
मुरली दास ने आज होरी कथा गाई।
ओ महाराज… दयाराम कविता सारी जी।
भर-भर रंग की ले पिचकारी राधा प्यारी जी…
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🎼 Lyrics English
Brijbhan Dulari Chali Holi Khelan Ko,
Ho Maharaj… jahan par rahe Murari ji.
Bhar-bhar rang ki le pichkari Radha pyari ji…
Kya dhoom machi Holi ki aaj Gokul mein,
Ho Maharaj, kahi na mukh se jai ji…
Rang-birange hue wahan par Krishna Kanhai ji…
Antara 1
Dher Kishan ko liya sabhi sakhiyon ne,
O Maharaj… rang bahurang udayi ji…
Bhar-bhar rang ki le pichkari Radha pyari ji…
Jhela
Dekhan aaye Holi aaye, wahan Brijvasi,
Rahe jahin par Radha sang Avinashi,
O Maharaj… rang mein bheege Girdhari ji…
Bhar-bhar rang ki le pichkari Radha pyari ji…
Antara 2
Mauka paake ghere Kishan Radhe ko,
O Maharaj… rang sab upar daali ji…
Bheengi tan ki saadi kusumbi, upar choli ji,
Hue Krishna ke sang sabhi Braj gwale,
O Maharaj… banakar apni toli ji…
Gwal-balu sab khel rahe Phagun ki Holi ji…
Jhela
Tarah-tarah ke rang Kishan barsaaye,
Kesar saare kunj-kunj mehkaaye,
O Maharaj… chhavi hai jag se nyari ji…
Bhar-bhar rang ki le pichkari Radha pyari ji…
Antara 3
Kya baaje chhappan baje aur shehnai,
O Maharaj… taal-chautaal bajai ji…
Nirakh Radhe-Krishna wahan par khushiyan chhai ji…
Dekhan Holi aaye wahin sur saare,
O Maharaj… pushpon ki jhadi lagai ji…
Utha ke murli Krishnachandra ne raag sunai ji…
Jhela
Jhoom uthe sab naar wahin matwali,
Jaise bagiya mein khile phool ki daali,
O Maharaj… khushi hai nagri saari ji…
Utha ke murli unke Krishnachandra ne raag sunai ji,
Murli Das ne aaj hori katha gai,
O Maharaj… Dayaram kavita saari ji…
Bhar-bhar rang ki le pichkari Radha pyari ji…
यह ब्रज होली फाग लोकगीत भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी की दिव्य होली लीला का सुंदर और आनंदमय चित्रण करता है।
गीत में बताया गया है कि ब्रजभानू की दुलारी राधा होली खेलने के लिए उस स्थान पर जाती हैं जहाँ श्रीकृष्ण (मुरारी) विराजमान हैं। गोकुल और ब्रजभूमि में चारों ओर रंग, पिचकारियाँ, हँसी-खुशी और उल्लास छा जाता है। सखियाँ, ग्वाले-बाल, ब्रजवासी और देवगण सभी मिलकर इस पावन उत्सव में सहभागी बनते हैं।
रंगों की वर्षा, शहनाइयों की गूंज, मुरली की मधुर तान और फूलों की झड़ी के साथ राधा-कृष्ण की अलौकिक छवि उभरकर सामने आती है। यह गीत फागुन के महीने में मनाए जाने वाले ब्रज की पारंपरिक होली उत्सव, प्रेम, भक्ति और आनंद का प्रतीक है, जो श्रोता को भक्ति-रस और उल्लास से भर देता है।


