निमाड़ी कलाकार

बुढ़ापो कसो दियो भगवान

बुढ़ापो कसो दियो भगवान | निमाड़ी गीत भजन | Lyrics

बुढ़ापो कसो दियो भगवान | निमाड़ी गीत भजन | Lyrics

बुढ़ापो कसो दियो भगवान
बुढ़ापो कसो दियो भगवान

बुढ़ापो कसो दियो भगवान  ( निमाड़ी गीत  )

🎤 गायन: गीतेश कुमार भार्गव
✍️ लेखन: गोविंद भाई पाटीदार
🎶 शैली: निमाड़ी गीत भजन
📺 प्रस्तुति: Nimadi Kalakar – Official Channel

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भजन के बोल

घर म अब तो कोई नी सुणतो,
रोज होय रे अपमान,
बुढ़ापो कसो दियो भगवान।

मन की पीड़ा कोई नी समझे,
बड़ो बलवान,
बुढ़ापो कसो दियो भगवान।


मान-सम्मान तो छोड़ो रे भाई,
जरा भी नी वतलाव रे,
जरा कयनु तो बलकारी दे,
कोई भी नी सेलाव रे।

उमर बीती गयी , आयो बुढ़ापो,
हूय गयो रे परेशान,
बुढ़ापो कसो दियो भगवान।


रोटा न् की काय बात बतावां,
पाणी को भी नी पूछी रया,
दिखावटी सब करता फिरी रा,
कसो नातो यो निभ्य रया।

बड़ा ठप्पा सी चाय पेवाड़,
आव मिजवान,
बुढ़ापो कसो दियो भगवान।


दादा क खळा म सवण भेज,
दय ने मुडली खारली रे,
माय बिचारी जमीन बिछाव,
वा भी गोदड़ी फाटली रे।

गीत जुबानी गोविंद तुम्हारा,
करि राया गुण-गान।

बुढ़ापो कसो दियो भगवान।

Bhajan Lyrics 

 

Ghar mein ab to koi ni sunto,
Roz hoy re apmaan,
Budhaapo kaso diyo Bhagwan.

man ki Peeda koi ni samjhe,
Bado balwaan,
Budhaapo kaso diyo Bhagwan.

Maan-sammaan to chhodo re bhai,
Zara bhi ni vatlaav re,
Zara kaynu to balkari de,
Koi bhi ni selaav re.

umar biti gayi , aayo budhaapo,
Huy gayo re pareshaan,
Budhaapo kaso diyo Bhagwan.

Rota n ki kaay baat bataavaan,
Paani ko bhi ni poochhi raya,
Dikhaavati sab karta phiri ra,
Kaso naato yo nibhya raya.

Bada thappa si chaay pewaad,
Aav mijvaan,
Budhaapo kaso diyo Bhagwan.

Dada k khalaa mein sovan bhej,
Day ne mudli khaarli re,
Maay bichaari zameen bichhaav,
Wa bhi goddi faatli re.

Geet jubaani Govind tumhaara,
Kari raya gun-gaan.

Budhaapo kaso diyo Bhagwan.

 बुढ़ापो कसो दियो भगवान

 

विस्तृत भावार्थ व व्याख्या

यह भजन बुढ़ापे की उस पीड़ा को उजागर करता है, जिसे समाज अक्सर अनदेखा कर देता है। भजन के शब्दों में एक वृद्ध व्यक्ति की करुण पुकार छिपी है, जो भगवान से प्रश्न करता है कि बुढ़ापे में मनुष्य को इतना असहाय और अपमानित क्यों होना पड़ता है।


पहला भाव

“घर म अब तो कोई नी सुणतो, रोज होय रे अपमान”
इस पंक्ति में यह पीड़ा झलकती है कि वृद्ध व्यक्ति की बात अब घर में कोई नहीं सुनता। प्रतिदिन उसे उपेक्षा और अपमान सहना पड़ता है। परिवार, जो कभी सहारा था, वही अब अनदेखा करने लगता है।


दूसरा भाव

“पीड़ा कोई नी समझे, बड़ो बलवान”
यहाँ समाज की कठोर सच्चाई सामने आती है। कमजोर और वृद्ध व्यक्ति की पीड़ा को कोई समझने वाला नहीं रहता। ताकतवर और जवान लोग ही अपनी बात मनवा लेते हैं।


तीसरा भाव

“मान-सम्मान तो छोड़ो रे भाई”
इस अंश में बताया गया है कि वृद्धावस्था में सम्मान तो दूर, साधारण व्यवहार भी नहीं मिलता। थोड़ा-सा कुछ कहने पर गुस्से से जवाब दिया जाता है और बुजुर्गों की बात को कोई महत्व नहीं देता।


चौथा भाव

“गई जवानी, आयो बुढ़ापो”
यह जीवन के सत्य को दर्शाता है। जवानी चली गई है और बुढ़ापा आ गया है, जिसके साथ शारीरिक कमजोरी और मानसिक चिंता भी जुड़ जाती है। व्यक्ति स्वयं को असहाय और परेशान महसूस करता है।


पाँचवाँ भाव

“रोटा न् की काय बात बतावां, पाणी को भी नी पूछी रया”
यह पंक्तियाँ अत्यंत करुण हैं। यहाँ बताया गया है कि खाने-पीने जैसी मूल आवश्यकताओं की भी कोई परवाह नहीं करता। दिखावटी रिश्ते तो हैं, लेकिन सच्ची संवेदना कहीं नहीं दिखाई देती।


छठा भाव

“दिखावटी सब करता फिरी रा”
यह समाज के खोखले व्यवहार पर व्यंग्य है। बाहर से सब अपनेपन का दिखावा करते हैं, लेकिन वास्तव में कोई जिम्मेदारी निभाने को तैयार नहीं होता।


सातवाँ भाव

“दादा क खळा म सवण भेज”
इस पंक्ति में वृद्धों के साथ होने वाले अमानवीय व्यवहार को दर्शाया गया है, जहाँ उन्हें पशुओं के स्थान पर सुलाया जाता है, फटी-पुरानी चटाई दी जाती है और माता को भी फटी गुदड़ी पर सोना पड़ता है।


अंतिम भाव

“गीत जुबानी गोविंद तुम्हारा, करि राया गुण-गान”
यहाँ कवि स्वयं को माध्यम मानते हुए कहता है कि यह गीत समाज को आईना दिखाने का प्रयास है। यह केवल एक भजन नहीं, बल्कि समाज के लिए चेतावनी और आत्ममंथन का संदेश है।


समग्र संदेश

यह भजन हमें सिखाता है कि बुढ़ापा कोई अभिशाप नहीं, बल्कि सम्मान और करुणा का अधिकारी जीवन-काल है। जो आज दूसरों के बुढ़ापे को अनदेखा करता है, वही कल स्वयं इसी स्थिति में होगा। यह भजन समाज को अपने मूल्यों पर पुनः विचार करने की प्रेरणा देता है।

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