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केशव फुल्यो अतिभार निमाड़ी होली भजन – गायक गीतेश कुमार भार्गव

केशव फुल्यो अतिभार | निमाड़ी होली भजन | गीतेश कुमार भार्गव

केशव फुल्यो अतिभार, न फागुण आयो

केशव फुल्यो अतिभार निमाड़ी होली भजन – गायक गीतेश कुमार भार्गव
केशव फुल्यो अतिभार

(निमाड़ी होली लोकभजन)


🎵 गीत विवरण (Song Details)

 

गीत शीर्षक: केशव फुल्यो अतिभार, न फागुण आयो

गीतकार (Lyrics): श्री सुमेरसिंह राव जी

गायक (Singer): गीतेश कुमार भार्गव

शैली (Genre): निमाड़ी लोकभजन / होली भजन

भाषा: निमाड़ी (हिंदी मिश्रित)

प्रस्तुति: Nimadi Kalakar – Official

उपलब्ध: Official YouTube Channel एवं सभी प्रमुख Audio Platforms

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🪔 गीत का भाव (Song Theme)

यह गीत ब्रज की होली और श्रीकृष्ण की लीलाओं का अत्यंत जीवंत वर्णन करता है।
फागुन के रंग, गुलाल, पिचकारी, ढोल-चंग की ताल और राधा–कृष्ण की होली—इन सबका निमाड़ी लोकशैली में सुंदर चित्रण इस रचना को विशेष बनाता है।


🎶 गीत के बोल (Lyrics)

मुखड़ा

केशव फुल्यो अतिभार, न फागुण आयो – 2
केशरिया की भरी पिचकारी, गुलाल उड़ायो


1️⃣ अंतरा

मन मोहन चल्यो मधुबन, यशोदा को लाल – 2
जे न सखा सखी सँग माड्यो, होळ्य को खयाल

जहाँ बज चंग अरु ढोल, ताल चौ ताल – 2
देखी मुखड़ा चमाचम चमक न, लाल म लाल

जब अबीर सना सन चल, अंधेरा छायो – 2
केशरिया की भरी पिचकारी, गुलाल उड़ायो…


2️⃣ अंतरा

एक तरफ ग्वालन को झुण्ड, बड़ी अलवारी – 2
आई दुजा टोळ म सगरी, बिरज की नारी

टोळ्य की प्रमुख ब्रजभान, वो राधा दुलारी – 2
रंग लायो यशोदा को लाल, कृष्ण गिरधारी

चली सनन सनन पिचकारी, रंग छिड़कायो – 2
केशरिया की भरी पिचकारी, गुलाल उड़ायो…


3️⃣ अंतरा

चोळय चुन्दड़ सब भीगी, जाम अरु साल – 2
होळय को खिलाड़ी खेल, काट अरु भाल

यमुना प उड़ जब रंग, वो लाल गुलाल – 2
बज पग घुंघरू छम-छम, दे ख तीरताल

गीत गाव सुमेरसिंह राव, सुमन मन भायो – 2
केशरिया की भरी पिचकारी, गुलाल उड़ायो…


🎵 Song Details

Song Title: Keshav Phulyo Atibhaar, Na Phagun Aayo

Lyrics: Shri Sumersingh Rao Ji

Singer: Gitesh Kumar Bhargava

Genre: Nimadi Folk Bhajan / Holi Bhajan

Language: Nimadi (Hindi mixed)

Presented By: Nimadi Kalakar – Official

Available On: Official YouTube Channel and all major Audio Platforms

🎶 Lyrics (English / Roman)

Mukhda

Keshav phulyo atibhaar, na phagun aayo – 2
Keshariya ki bhari pichkaari, gulaal udaayo


1️⃣ Antra

Man mohan chalyo Madhuban, Yashoda ko laal – 2
Je na sakha sakhi sang maadyo, holya ko khayaal

Jahan baj chang aru dhol, taal chau taal – 2
Dekhi mukhda chamacham chamak na, laal ma laal

Jab abeer sana san chal, andhera chhaayo – 2
Keshariya ki bhari pichkaari, gulaal udaayo…


2️⃣ Antra

Ek taraf gwaalan ko jhund, badi alwaari – 2
Aayi duja tol ma sagri, Biraj ki naari

Tolya ki pramukh Brajbhanu, vo Radha dulaari – 2
Rang laayo Yashoda ko laal, Krishna Giradhaari

Chali sanan sanan pichkaari, rang chhidkaayo – 2
Keshariya ki bhari pichkaari, gulaal udaayo…


3️⃣ Antra

Cholya chundad sab bheegi, jaam aru saal – 2
Holya ko khilaadi khel, kaat aru bhaal

Yamuna pa ud jab rang, vo laal gulaal – 2
Baj pag ghunghru chham-chham, dekh teer-taal

Geet gaav Sumersingh Rao, suman man bhaayo – 2
Keshariya ki bhari pichkaari, gulaal udaayo…

🎵 गीत का विस्तृत भावार्थ

केशव फुल्यो अतिभार, न फागुण आयो

यह गीत ब्रजभूमि की होली और श्रीकृष्ण की रसमयी लीलाओं का सजीव चित्रण है। इसमें फागुन के आगमन के साथ ही चारों ओर फैलते उल्लास, रंगों और भक्तिभाव को निमाड़ी लोकशैली में अत्यंत सुंदर ढंग से व्यक्त किया गया है।


🌸 मुखड़े का भाव

“केशव फुल्यो अतिभार, न फागुण आयो”
का अर्थ है कि फागुन का महीना आते ही श्रीकृष्ण का रूप और भी अधिक खिल उठा है। केशरिया रंग की पिचकारी से उड़ता गुलाल वातावरण को भक्ति और आनंद से भर देता है। यह मुखड़ा पूरे गीत के उल्लास और रंगीन भाव को स्थापित करता है।


🎶 प्रथम अंतरे का भाव

पहले अंतरे में नंदलाल श्रीकृष्ण अपने सखा–सखियों के साथ मधुबन की ओर जाते हैं। यशोदा मैया के लाल की बाल–लीलाओं और होली खेलने की चंचलता का वर्णन किया गया है।
ढोल–चंग की ताल पर वातावरण गूंज उठता है, और कृष्ण का मुखमंडल लाल गुलाल से दमक उठता है। उड़ते अबीर से ऐसा प्रतीत होता है मानो चारों ओर रंगों का बादल छा गया हो।


🎶 द्वितीय अंतरे का भाव

दूसरे अंतरे में ब्रज की गोपियों और ग्वालों के समूह का उल्लासपूर्ण दृश्य सामने आता है। एक ओर गोपियों की टोली है, तो दूसरी ओर ब्रज की नारियाँ।
इस टोली की अगुवाई राधा रानी कर रही हैं। श्रीकृष्ण सभी को रंगों में रंग देते हैं और होली का आनंद चरम पर पहुँच जाता है। यहाँ राधा–कृष्ण के प्रेम और ब्रज की सामूहिक होली का मनमोहक चित्र उभरता है।


🎶 तृतीय अंतरे का भाव

तीसरे अंतरे में होली की मस्ती और भी गहराती है। गोपियों के वस्त्र रंगों में भीग जाते हैं। हर कोई होली के खेल में मग्न है।
यमुना तट पर उड़ता लाल गुलाल, पायल और घुँघरुओं की छम–छम, तथा ताल की गूंज — यह सब मिलकर ब्रज की होली को दिव्य स्वरूप प्रदान करते हैं।
अंत में गीतकार श्री सुमेरसिंह राव स्वयं इस गीत को गाते हुए मन को आनंदित होने की अनुभूति कराते हैं।


🪔 गीत का सार

यह गीत केवल होली का वर्णन नहीं है, बल्कि श्रीकृष्ण के प्रति भक्ति, प्रेम और ब्रज की सांस्कृतिक विरासत का उत्सव है।
निमाड़ी लोकभाषा में रचा गया यह भजन लोकसंस्कृति, भक्ति और आनंद—तीनों का सुंदर संगम प्रस्तुत करता है।


✨ निष्कर्ष

“केशव फुल्यो अतिभार, न फागुण आयो”
एक ऐसा लोकभजन है जो सुनने वाले को ब्रज की होली में पहुँचा देता है और मन को आनंद, भक्ति और रंगों से भर देता है।

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