म्हारो मन दौड़ी दौड़ी पीपळ्या जाय – Singaji Bhajan Lyrics

“संत सिंगा जी की जीवती समाधी” पर आधारित यह भावपूर्ण निमाड़ी भजन आस्था, श्रद्धा और भक्ति की अनुपम अभिव्यक्ति है।
इस गीत के गीतकार – राजेश रेवलिया एवं गायक – गितेश कुमार भार्गव हैं।
भक्ति और लोक-संस्कृति से ओत-प्रोत यह प्रस्तुति Nimadi Kalakar YouTube Channel द्वारा प्रकाशित की गई है, जो निमाड़ की संत परंपरा और लोक-आस्था को जीवंत रूप में प्रस्तुत करती है।
म्हारो मन दौड़ी दौड़ी पीपळ्या जाय

संत सिंगा की, जीवती समाधी , देखण क मन ललचाय
म्हारो मन दौड़ी दौड़ी पीपळ्या जाय
रेवा का खोळा सोया खुशी सी , गुरुजी का वचन निभाय
म्हारो मन दौड़ी दौड़ी पीपळ्या जाय
ज्योति अखण्डी जलाई भक्ति की , धवळ्य ध्वजा लहराय
म्हारो मन दौड़ी दौड़ी पीपळ्या जाय
शरद पुणम की महिमा लगाई , दूर-दूर सी नर नार आय
म्हारो मन दौड़ी दौड़ी पीपळ्या जाय
मन का मनोरथ पूरा कर सब , जन जन प किरपा बरसाय
म्हारो मन दौड़ी दौड़ी पीपळ्या जाय
Mharo man daudi daudi Peepalya jaay

Sant Singa ki, jeevti samadhi,
dekhan ka man lalchay
Mharo man daudi daudi Peepalya jaay
Reva ka khola soya khushi si,
Guruji ka vachan nibhay
Mharo man daudi daudi Peepalya jaay
Jyoti akhandi jalai bhakti ki,
dhawal dhwaja lahray
Mharo man daudi daudi Peepalya jaay
Sharad Poonam ki mahima lagai,
door-door si nar naar aay
Mharo man daudi daudi Peepalya jaay
Man ka manorath poora kar sab,
jan-jan par kirpa barsaay
Mharo man daudi daudi Peepalya jaay
🔹 गीत का भावार्थ

यह गीत निमाड़ अंचल के महान संत संत सिंगा जी की जीवती समाधी पीपळ्या पर केंद्रित है। गीत में भक्त के मन की उस गहरी श्रद्धा को दर्शाया गया है, जो उसे बार-बार संत की समाधी की ओर खींच ले जाती है।
1️⃣ “संत सिंगा की, जीवती समाधी, देखण क मन ललचाय”
इस पंक्ति में भक्त का मन संत सिंगा जी की जीवती समाधी को देखने के लिए लालायित होता है। यह केवल दर्शन नहीं, बल्कि आत्मिक शांति की खोज है।
2️⃣ “म्हारो मन दौड़ी दौड़ी पीपळ्या जाय”
यह पंक्ति पूरे गीत की आत्मा है। भक्त का मन बार-बार पीपळ्या धाम की ओर दौड़ पड़ता है, जहाँ संत सिंगा जी की समाधी स्थित है।
3️⃣ “रेवा का खोळा सोया खुशी सी, गुरुजी का वचन निभाय”
यहाँ नर्मदा (रेवा) के तट का पवित्र वातावरण और गुरुजी के वचनों के पालन से प्राप्त आत्मिक आनंद का चित्रण है। यह दर्शाता है कि संत की शिक्षाएँ आज भी जीवित हैं।
4️⃣ “ज्योति अखण्डी जलाई भक्ति की, धवळ्य ध्वजा लहराय”
संत सिंगा जी की भक्ति की अखंड ज्योति निरंतर प्रज्वलित है। समाधी स्थल पर लहराती धवल ध्वजा शुद्धता, शांति और दिव्यता का प्रतीक है।
5️⃣ “शरद पुणम की महिमा लगाई, दूर-दूर सी नर नार आय”
शरद पूर्णिमा के पावन अवसर पर संत सीगा जी की महिमा दूर-दूर तक फैल जाती है। इस दिन भक्तजन स्त्री-पुरुष सभी स्थानों से दर्शन हेतु आते हैं।
6️⃣ “मन का मनोरथ पूरा कर सब, जन जन प किरपा बरसाय”
गीत का समापन संत सिंगा जी की करुणा और कृपा से होता है। माना जाता है कि सच्चे मन से माँगी गई हर मुराद यहाँ पूरी होती है और सभी पर कृपा बरसती है।
🔹 गीत का सांस्कृतिक महत्व
यह भजन केवल एक गीत नहीं, बल्कि निमाड़ की संत परंपरा, लोक-आस्था और आध्यात्मिक विरासत का सजीव दस्तावेज़ है।
राजेश रेवलिया जी की सरल लेकिन गहन रचना और गितेश कुमार भार्गव जी की भावपूर्ण गायकी इस भजन को विशेष बनाती है।
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