मनुष तु क कहाँ सी मीलग भगवान ?गाना सुनाने के लिए यहाँ क्लिक करे

🎵 भजन – मनुष तु क कहाँ सी मीलग भगवान
लेखक: उद्धव भाई यादव गायक: उद्धव भाई यादव, गीतेश कुमार भार्गव
About This Bhajan
यह निमाड़ी निर्गुणी भजन सत्य, मानवता और आडंबर-विरुद्ध भक्ति का संदेश देता है।
उद्धव भाई यादव की लेखनी सरल भाषा में मनुष्य को यह समझाती है कि भगवान की प्राप्ति दिखावे से नहीं, बल्कि सच्चे मन, चरित्र और कर्म से होती है।
इसी वजह से यह भजन मंदसौर, खंडवा, खरगोन, बड़वानी और निमाड़ क्षेत्र में विशेष रूप से लोकप्रिय है।
🎶 Lyrics
मनुष तु क कहाँ सी मीलग भगवान
मनुष तु क कहाँ सी मीलग भगवान,
कोरा ढोंग न म तू छे हायराण।
मनुष तु क कहाँ सी मीलग भगवान
करि रएयो भन ज प,
आँख नी खोल।
महि माँगण आयो, माय पट्ट दिन बोल।
महि नी बनायो आज,
घर में माँ मही की मात।
धरेल छे झूट बोल, वो तो ध्यान-ध्यान।
मनुष तु क कहाँ सी मीलग भगवान
सुनी ल रे मनवा, वात या खास छे।
दो दरजन केला खाय, न ग्यारस को उपास छे।
ऊपर सी दो लोटा छाछ,
साबुदाणा की खाई न।
खिचड़ी सोये गयो लंबी ताण—
मनुष तु क कहाँ सी मीलग भगवान
मंदिर बनायो जेम धरिली रे मुरती,
सच्चा मन सी लगय नहीं सुरती।
पायों नी सच्चो ज्ञान।
घर पड़ोसी भूख्यो सोयल छे,
करी रयो लाखो दान…
मनुष तु क कहाँ सी मीलग भगवान
Manush tu k kahaan si meelag Bhagwaan
Manush tu k kahaan si meelag Bhagwaan,
Kora dhong na ma tu chhe hairaan.
Manush tu k kahaan si meelag Bhagwaan
Kari rayo bhan ja jap,
Aankh ni khol.
Mahi maangan aayo, maay patt din bol.
Mahi ni banaayo aaj,
Ghar mein maa mahi ki maat.
Dharel chhe jhooth bol, vo to dhyaan-dhyaan.
Manush tu k kahaan si meelag Bhagwaan
Suni l re manwa, vaat ya khaas chhe.
Do darjan kela khaay, na gyaaras ko upaas chhe.
Upar si do lota chhaach,
Saabudaana ki khaai na.
Khichdi soye gayo lambi taan—
Manush tu k kahaan si meelag Bhagwaan
Mandir banaayo jem dharili re murti,
Sachcha man si lagay nahi surti.
Paayon ni sachcho gyaan.
Ghar padosi bhookhyo soyal chhe,
Kari rayo laakho daan…
Manush tu k kahaan si meelag Bhagwaan
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भजन का अर्थ
1. “मनुष तु क कहाँ सी मीलग भगवान…”
भजन की शुरुआत मनुष्य को समझाते हुए होती है कि भगवान को पाना इतना कठिन नहीं है—
कठिन यह है कि हम ढोंग, दिखावा, पाखंड और झूठ से खुद को अलग कर सकें।
मनुष्य भगवान की तलाश तो करता है, पर जीवन में आडंबर अधिक है,
इसलिए भगवान की अनुभूति उसे नहीं मिलती।
⭐ 2. “आँख नी खोल… माय पट्ट दिन बोल।”
यह पंक्तियां मनुष्य को सच देखने की प्रेरणा देती हैं।
मनुष्य माता से अपने लिए सुख-सुविधाएँ माँग रहा है,
पर उसके कर्म सही नहीं हैं।
वह झूठ बोलता है, दिखावा करता है—
ध्यान और भक्ति सिर्फ औपचारिकता बन गई है।
⭐ 3. “दो दरजन केला खाय, न ग्यारस को उपास छे…”
यहाँ कवि व्यंग्य के माध्यम से भक्ति में पाखंड पर चोट करते हैं।
व्यक्ति पहले पेट भरकर खा चुका है,
फिर कहता है—
“आज मैं उपवास पर हूँ।”
संदेश यह है कि उपवास शरीर से नहीं, मन से होता है।
⭐ 4. “मंदिर बनायो जेम धरिली रे मूर्ति…”
भजन का मुख्य सार:
मंदिर बनाना, मूर्तियाँ सजाना महत्वपूर्ण नहीं—
मन साफ होना चाहिए।
भगवान वहीँ मिलते हैं जहाँ
दया, धर्म, करुणा, सत्य और प्रेम की भावना हो।
⭐ 5. “घर पड़ोसी भूख्यो सोयल छे, करी रयो लाखो दान…”
यह सबसे गहरी पंक्ति है।
कवि कहता है—
आप दान तो करो, पर वह दिखावे का दान है।
आपका अपना पड़ोसी भूखा सो रहा है
और आप लाखों का दान मंदिरों में चढ़ा रहे हैं।
सच्ची भक्ति सेवा में है, न कि प्रदर्शन में।
🌻 पूरा सार (Essence of Bhajan)
यह निर्गुणी भजन मनुष्य को सिखाता है कि—
भगवान दिखावे से नहीं, सच्चे मन से मिलते हैं।
पूजा का मूल्य तभी है जब जीवन में सत्य और करुणा हो।
उपवास, दान, मंदिर—सब तभी सार्थक हैं जब मन पवित्र हो।
इंसान अगर मानव सेवा नहीं करता, तो वह असली भक्त नहीं है।
यही निर्गुण भक्ति का मूल सिद्धांत है।


