म्हारा मान गुमानी ढोला – Gangaur Geet Lyrics 1952
यह गीत गणगौर पर्व से जुड़ा एक पारंपरिक लोकगीत है, जिसमें स्त्री अपने प्रिय “गुमानी ढोला” को स्नेह, मान और गौरव के साथ संबोधित करती है। गीत में गौर माता (पार्वती) की पूजा, स्त्री की आस्था, उसका सम्मान और वैवाहिक जीवन की कोमल भावनाएँ बहुत सरल लेकिन गहरे शब्दों में व्यक्त की गई हैं। यह गीत लोक-संस्कृति, स्त्री-मन और परंपराओं का जीवंत चित्र प्रस्तुत करता है।
म्हारा मान गुमानी ढोला – Gangaur Geet Lyrics 1952

बाड़ी मs को चन्दन कटाड़ो रे, म्हारां मान गुमानी ढोला ।
जेपर गौरबाई खs उतारो रे, म्हारा मान गूमानी ढोला।
रनूबाई एकला नी बठs रे, म्हारा मान गुमानी ढोला ।
जेपर धणियेरजी खs बठाड़ो रे, म्हारा मान गुमानी ढोला ।
mhara maan gumani dhola – Gangaur Geet 1952

Baadi ma ko chandan katado re ,
mhara maan gumani dhola.
Jepar Gaurbai kh utaro re,
mhara maan gumani dhola.
Ranubai ekla ni bathya re,
mhara maan gumani dhola.
Jepar dhaṇiyeraji ka bathado re,
mhara maan gumani dhola.
🔹 भावार्थ और अर्थ

1️⃣ “बाड़ी मां को चन्दन कटाड़ो रे…”
यह पंक्ति बताती है कि मां के आंगन/बाड़ी से चंदन लाया जा रहा है, जो पवित्रता, शुद्धता और श्रद्धा का प्रतीक है। चंदन का उपयोग देवी की पूजा में किया जाता है।
यहाँ स्त्री अपने प्रिय से कहती है कि वह पूजा की तैयारी पूरे आदर और प्रेम से करे।
➡️ भाव: श्रद्धा + पारिवारिक संस्कार
2️⃣ “जेपर गौरबाई खें उतारो रे…”
यह पंक्ति सीधे गौर माता (माता पार्वती) की पूजा से जुड़ी है।
“उतारो” का अर्थ है — देवी को विधिपूर्वक स्थापित करना, सजाना और पूजना।
➡️ भाव: स्त्री की यह कामना कि देवी प्रसन्न हों और उसका वैवाहिक जीवन मंगलमय रहे।
3️⃣ “रनूबाई एकला नी बठे रे…”
यह पंक्ति स्त्री-मन की कोमल पीड़ा दर्शाती है।
“एकला नी बठे” का अर्थ है — अकेले बैठना शोभा नहीं देता, मन नहीं लगता।
➡️ भाव: जीवन में साथ, सम्मान और सहचर्य की आवश्यकता।
4️⃣ “जेपर धणिये रजी खें बठाड़ो रे…”
यहाँ स्त्री अपने धणी/पति से अनुरोध करती है कि वह स्वयं प्रेम और सहमति से उसके पास बैठे।
यह पंक्ति स्त्री के सम्मान, अधिकार और भावनात्मक अपेक्षा को बहुत सुंदर ढंग से व्यक्त करती है।
➡️ भाव: प्रेम, स्वीकृति और बराबरी का संबंध।
🔹 गीत का समग्र संदेश
यह गीत केवल एक पूजा गीत नहीं है, बल्कि यह दर्शाता है कि
स्त्री की आस्था
उसका आत्मसम्मान
पति से प्रेम और मान की अपेक्षा
और लोक परंपराओं में बसी जीवन-दृष्टि
कैसे एक साथ जुड़ी हुई हैं।
“म्हारा मान गुमानी ढोला” स्त्री के स्वाभिमान और प्रेम का प्रतीक बन जाता है।



