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नन्हेश्वर धाम : ऋषि मार्कण्डेय की अमर शिवभक्ति की दिव्य कथा

नन्हेश्वर धाम : ऋषि मार्कण्डेय की अमर शिवभक्ति की दिव्य कथा

नन्हेश्वर धाम : ऋषि मार्कण्डेय की अमर शिवभक्ति की दिव्य कथा


✍️ लेखन एवं संपादन जानकारी


🔱नन्हेश्वर धाम : ऋषि मार्कण्डेय की अमर शिवभक्ति की दिव्य कथा ( NANHESHWAR DHAM )

       अल्पायु से चिरंजीवी बनने तक शिवभक्ति की अमर कथा


 प्रस्तावना

भारतीय सनातन परंपरा में कुछ ऋषि ऐसे हुए हैं जिनका जीवन स्वयं एक जीवंत ग्रंथ बन गया। उन्हीं में से एक हैं ऋषि मार्कण्डेय—जो भक्ति, तप, ज्ञान और शिव कृपा के अद्वितीय प्रतीक माने जाते हैं।
ऋषि मार्कण्डेय को चिरंजीवी होने का वरदान प्राप्त है, अर्थात वे मृत्यु के बंधन से मुक्त हैं। उनकी कथा केवल एक पौराणिक प्रसंग नहीं, बल्कि यह संदेश देती है कि सच्ची भक्ति के आगे काल भी पराजित हो जाता है


🕉️ऋषि मार्कण्डेय के माता-पिता और शिवभक्ति

ऋषि मार्कण्डेय के पिता का नाम ऋषि मार्कण्डु और माता का नाम मरूदमती था। दोनों ही अत्यंत धर्मनिष्ठ, संयमी और भगवान शिव के अनन्य भक्त थे।
पद्मपुराण एवं उत्तराखंड क्षेत्र में प्रचलित कथाओं के अनुसार, मार्कण्डु ऋषि और मरूदमती लंबे समय तक संतानहीन रहे।

संतान की कामना से उन्होंने अपने आराध्य देव आदिदेव महादेव की कठोर तपस्या की। वर्षों तक व्रत, नियम, संयम और तप से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए।


🔱 शिवजी का वरदान और दो विकल्प

भगवान शिव ने कहा—
“वत्स, मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूँ। वर माँगो।”

मार्कण्डु ऋषि ने विनम्र भाव से कहा—
“प्रभो, मैं संतानहीन हूँ। मुझे संतान का वरदान दीजिए।”

तब भगवान शिव ने एक गूढ़ रहस्य प्रकट किया और कहा—
“तुम्हें दो प्रकार के पुत्र में से एक को चुनना होगा—

  1. दीर्घायु पुत्र, जो जीवन तो लंबा पाएगा पर बुद्धिहीन होगा

  2. अल्पायु पुत्र, जिसकी आयु केवल 16 वर्ष होगी, पर वह अत्यंत गुणवान, ज्ञानी, तपस्वी और संस्कारवान होगा”


🤔 ऋषि मार्कण्डु का गहन विचार

यह निर्णय सरल नहीं था। दीर्घायु पुत्र का अर्थ था—जीवन तो लंबा, पर ज्ञान और विवेक का अभाव।
वहीं अल्पायु पुत्र—जीवन छोटा, पर धर्म, ज्ञान और तप से परिपूर्ण।

मार्कण्डु ऋषि ने विचार किया—

“बुद्धिहीन दीर्घायु पुत्र से अच्छा है
ऐसा पुत्र जो थोड़े समय में भी
धर्म और संस्कारों का दीपक जला जाए।”

अतः उन्होंने अल्पायु, गुणवान पुत्र का वरदान स्वीकार किया।


👶 ऋषि मार्कण्डेय का जन्म

भगवान शिव के वरदान से ऋषि मार्कण्डेय का जन्म हुआ।
उनके जन्म से ऋषि आश्रम आनंद, उत्सव और आध्यात्मिक ऊर्जा से भर गया।

बालक मार्कण्डेय बचपन से ही—

  • शांत स्वभाव

  • गहन बुद्धि

  • भक्ति भावना

  • और तप की ओर स्वाभाविक झुकाव

दिखाने लगे।


 अल्पायु का रहस्य और माता-पिता की व्यथा

मार्कण्डेय जैसे-जैसे बड़े होते गए, माता-पिता का हृदय प्रेम और भय—दोनों से भरता गया।
वे जानते थे कि उनका पुत्र केवल 16 वर्ष का ही है।

जब 16वाँ वर्ष समीप आया, तो माता-पिता चिंतित रहने लगे।
मार्कण्डेय ने कारण पूछा, पर वे टालते रहे।

अंततः बार-बार पूछने पर माता-पिता ने सत्य बता दिया—

“वत्स, तुम्हारी आयु अल्प है।
तुम्हारे हमसे बिछड़ने का समय समीप है।”


 मार्कण्डेय का अद्भुत विश्वास

यह सुनकर बालक मार्कण्डेय विचलित नहीं हुए।
उन्होंने शांत भाव से कहा—

“माता-पिता, चिंता व्यर्थ है।
देने वाला भी वही है
और लेने वाला भी वही।”

उन्होंने भगवान शिव की आराधना हेतु वन जाने की अनुमति माँगी।


🏔️ सतपुड़ा पर्वत में कठोर तपस्या

माता-पिता की आज्ञा लेकर 15 वर्ष की आयु में
मार्कण्डेय ऋषि सतपुड़ा पर्वत के घने वनों में चले गए।

वहाँ दक्षिण दिशा की ओर स्थित एक निर्जन स्थान पर
उन्होंने शिवलिंग स्थापित कर—

  • उपवास

  • जप

  • ध्यान

  • और निरंतर तप

आरंभ किया।


 यमदूतों का आगमन

जब उनकी आयु पूर्ण होने को आई—

  • पहले यमदूत आए

  • उन्होंने कहा—
    “हे बालक, हम तुम्हारे प्राण लेने आए हैं।”

मार्कण्डेय ने उत्तर दिया—

“मेरी शिवपूजा अभी पूर्ण नहीं हुई।
पूजा पूर्ण होने पर चलूँगा।”

यमदूत लौट गए।


☠️ स्वयं यमराज का आगमन

इसके बाद स्वयं यमराज प्रकट हुए।
उन्होंने बालक का हाथ पकड़कर ले जाना चाहा।

मार्कण्डेय ने शिवलिंग को दोनों हाथों से पकड़ लिया और
पूरे हृदय से पुकारा—

“हे महादेव!
हे मेरे आराध्य!
मेरी रक्षा कीजिए!”


🔥 शिव का प्रकट होना और यमराज का दंड

बालक की भक्ति से प्रसन्न होकर
भगवान शिव स्वयं प्रकट हुए

यमराज बोले—
“प्रभो, इसकी आयु पूर्ण हो चुकी है।
मुझे अपना धर्म निभाने दीजिए।”

भगवान शिव ने उत्तर दिया—

“यह मेरा भक्त है।
यह मेरा शरणागत है।
इसकी रक्षा मेरा धर्म है।”

शिवजी ने यमराज को दंडित कर
उन्हें मृत्युलोक भेज दिया।


 चिरंजीवी का वरदान

भगवान शिव ने मार्कण्डेय को वरदान दिया—

  • तुम चिरंजीवी रहोगे

  • तुम्हारी आयु सदैव 16 वर्ष की ही रहेगी

  • भूत, वर्तमान और भविष्य—तीनों कालों में


🛕 नन्हेश्वर धाम का पौराणिक महत्व

नन्हेश्वर धाम
नन्हेश्वर धाम

जिस स्थान पर यह दिव्य घटना घटी,
वह स्थान नन्हेश्वर धाम कहलाया।

📍 स्थान विवरण

  • सतपुड़ा पर्वत, पश्चिम निमाड़

  • जिला: खरगोन (म.प्र.)

  • भगवानपुरा क्षेत्र

  • ग्राम: पचम्बा

  • कुंदा नदी के तट पर

  • जिला मुख्यालय से लगभग 25 किमी


📜 ऋषि मार्कण्डेय की अमर रचनाएँ

ऋषि मार्कण्डेय केवल तपस्वी ही नहीं,
महान ग्रंथकार भी थे।

उनकी प्रमुख रचनाएँ—

महामृत्युंजय मंत्र आज भी
मृत्यु भय, रोग और संकट निवारण हेतु
संपूर्ण भारत में जपा जाता है।


🌼 उपसंहार

ऋषि मार्कण्डेय का जीवन यह सिद्ध करता है कि—

जहाँ सच्ची भक्ति है,
वहाँ मृत्यु भी पराजित है।

उनकी कथा आज भी
शिवभक्तों के लिए
आस्था, विश्वास और अमर प्रेरणा का स्रोत है।

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