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नर्मदा : मोक्ष की रहस्यमयी नदी -16 करोड़ साल पुरानी नदी

नर्मदा : मोक्ष की रहस्यमयी नदी

प्रस्तावना 

नर्मदा मैया केवल एक नदी नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति की जीवंत चेतना हैं। उनकी धारा में इतिहास, पुराण, लोककथाएँ और आत्मिक अनुभूति एक साथ प्रवाहित होती हैं। नर्मदा से जुड़ी कथाएँ जितनी गूढ़ हैं, उतनी ही प्रेरणादायक भी। प्रस्तुत लेख में नर्मदा मैया की उसी दिव्य महिमा, रोचक पौराणिक प्रसंगों और आध्यात्मिक महत्व को सरल, भावपूर्ण और श्रद्धा से परिपूर्ण शब्दों में प्रस्तुत किया गया है।

यह आलेख श्री राजेश रेवलिया जी की गहन आस्था, अध्ययन और नर्मदा-भक्ति का सजीव प्रतिबिंब है, जिसमें नर्मदा को केवल पढ़ने की नहीं, बल्कि अनुभव करने की प्रेरणा मिलती है।
लेख का संपादन  गीतेश कुमार भार्गव द्वारा किया गया है, जिन्होंने भाषा, प्रवाह और तथ्यात्मक संतुलन के साथ इसे पाठकों के लिए अधिक प्रभावशाली और पठनीय स्वरूप प्रदान किया है।

आशा है कि यह लेख पाठकों को नर्मदा मैया की महिमा से जोड़ते हुए श्रद्धा, जिज्ञासा और आत्मिक शांति का अनुभव कराएगा। 🙏

✍️ लेखक – राजेश रेवलिया जी

✍️ संपादन – गीतेश कुमार भार्गव

नर्मदा मैया: उल्टी धारा, अनोखी कथा और मोक्ष की रहस्यमयी नदी

नर्मदा मैया: उल्टी धारा

भारत की पवित्र नदियों में नर्मदा मैया का नाम आते ही श्रद्धा अपने आप मन में उमड़ने लगती है। नर्मदा केवल एक नदी नहीं, बल्कि एक जीवित देवी, एक रहस्य और एक शाश्वत आस्था हैं। जितनी शांत उनकी धारा है, उतनी ही गूढ़ और रोचक उनकी कथाएँ हैं। शायद इसी कारण कहा जाता है— नर्मदा को समझना नहीं, अनुभव करना पड़ता है।

जब प्रेम से विरक्त हुई नर्मदा मैया

प्रेम से विरक्त नर्मदा मैया
प्रेम से विरक्त नर्मदा मैया

पुराणों और लोककथाओं में नर्मदा के प्रवाह को लेकर एक अत्यंत रोचक प्रसंग मिलता है। एक बार नर्मदा मैया ने सोनभद्र और जुहिला नदियों के बीच चल रहे प्रेम प्रसंग को देखा। प्रेम में बंधी नदियाँ एक-दूसरे की ओर बहने लगीं, पर नर्मदा मैया ने यह बंधन स्वीकार नहीं किया। वे विरक्त हुईं और उसी क्षण उन्होंने अपनी धारा की दिशा बदल ली।
यही कारण है कि भारत की अधिकांश नदियाँ पूर्व की ओर बहती हैं, जबकि नर्मदा मैया पश्चिम की ओर बहने वाली एकमात्र प्रमुख नदी हैं। इस घटना के बाद ही नर्मदा को “कुंवारी मैया” कहा जाने लगा—स्वतंत्र, निर्लिप्त और तपस्विनी।

एकमात्र नदी जिसका अपना पुराण है

नर्मदा पुराण
नर्मदा पुराण

यह जानकर आश्चर्य होता है कि भारत की असंख्य नदियों में केवल नर्मदा नदी का ही स्वतंत्र “नर्मदा पुराण है, जिसे महापुराणों में स्थान प्राप्त है। स्कंदपुराण के रेवाखंड में तो नर्मदा की महिमा सैकड़ों अध्यायों में विस्तार से वर्णित है।
वायु पुराण, शिवपुराण, महाभारत, वशिष्ठ संहिता और ब्राह्मी संहिता जैसे ग्रंथ भी नर्मदा की दिव्यता के साक्षी हैं। रेवातट पर आज भी नर्मदा पुराण का श्रवण ठीक उसी श्रद्धा से होता है, जैसे कहीं श्रीमद्भागवत का पाठ।

कलियुग की मोक्षदायिनी

NARMADA कलियुग की मोक्षदायिनी
कलियुग की मोक्षदायिनी

शास्त्रों में कहा गया है कि कलियुग में नर्मदा जी के दर्शन मात्र से मनुष्य पवित्र हो जाता है

  • स्मरण से जन्मभर के पाप नष्ट होते हैं

  • दर्शन से तीन जन्मों के

  • और नर्मदा स्नान से हजारों जन्मों के पाप भस्म हो जाते हैं

यही कारण है कि नर्मदा को गंगा, यमुना और सरस्वती से भी बढ़कर माना गया है। स्वयं देवाधिदेव महादेव नित्य नर्मदा जल का पान करते हैं, इससे बड़ा प्रमाण उनकी पवित्रता का और क्या हो सकता है?

प्रलय में भी नष्ट न होने वाली नदी

नर्मदा मैया को देव, दानव, मानव, पशु, कीट-पतंग—सभी प्राणियों के शोक-संताप का हरण करने वाली कहा गया है। वे केवल सुनने की कथा नहीं, बल्कि प्रलयकाल में भी विलय न होने वाली दिव्य शक्ति हैं। जिन लोगों ने नर्मदा का दर्शन, अवगाहन या तटवास किया, वे धन्य माने गए हैं।

जब ऋषियों को मिला नर्मदा तट का आश्रय

ऋषियों को मिला नर्मदा तट का आश्रय

एक समय भारतभूमि में भयंकर संकट और सूखा पड़ा। नदियाँ ही नहीं, समुद्र तक सूखने लगे। तब ऋषियों ने महर्षि मार्कण्डेय से मार्गदर्शन माँगा। त्रिकालज्ञ मार्कण्डेय ऋषि ने कहा—
“उत्तर भारत का त्याग कर दक्षिण दिशा में नर्मदा तट का आश्रय लो।”
उनके वचन मानकर अनेक महर्षि अपने परिवारों सहित नर्मदा तट पर आ बसे और नर्मदा मैया के पंद्रह नामों का निरंतर स्मरण करने लगे।

नर्मदा मैया के पंद्रह दिव्य नाम

(1) नर्मदा
(2) त्रिकुटा
(3) दक्षिणी गंगा
(4) महती
(5) सुरसा (शोण)
(6) कृपा
(7) मंदाकिनी
(8) महार्णवा
(9) रेवा
(10) विपापा
(11) विपाशा
(12) विमला
(13) करभा
(14) रंजना
(15) वायुवाहिनी / बालुवाहिनी

इन नामों का स्मरण स्वयं में एक साधना है।

नर्मदा – नदी नहीं, सनातन चेतना

 

नर्मदा मैया केवल जलधारा नहीं हैं। वे वैराग्य, तप, मोक्ष और करुणा की जीवंत प्रतिमा हैं। शायद इसी कारण कहा गया है—
“नर्मदा की परिक्रमा शरीर की नहीं, आत्मा की यात्रा है।”
जो एक बार नर्मदा से जुड़ गया, वह जीवन भर उनसे अलग नहीं हो सकता। 🌊🙏

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