NIMAD KA LOK-SAHITYA : LOK-GEET, SANSKRITI AUR JEEVAN DARSHAN KA PARICHAY
मूल अध्यन साहित्य-” जब निमाड़ गाता है “-डॉ वासुदेवशरण अग्रवाल
लेखन संपादन – गीतेश कुमार भार्गव

निमाड़ का लोक-साहित्य : एक आधुनिक परिचय
हिंदी साहित्य का मूल आधार लोक-भाषाएँ और लोक-संस्कृति ही रही हैं। जनपदों की भाषाओं से उपजा लोक-साहित्य ही हिंदी साहित्य की सच्ची कामधेनु है। इसी दृष्टि से देखा जाए तो निमाड़ की धरती लोक-साहित्य की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध रही है।
निमाड़ी लोक-साहित्य में सबसे अधिक संख्या लोक-गीतों की है। भाव, भाषा और अलंकार—तीनों ही स्तरों पर ये गीत अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं। इन गीतों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनमें मानवीय संवेदनाएँ भरपूर रूप में अभिव्यक्त हुई हैं। देवी-देवताओं का वर्णन भी यहाँ मानवीय रूप में मिलता है। सूर्य, ब्रह्मा, विष्णु या अन्य देवता—सब लोकजीवन के पारिवारिक प्रतीकों के सहारे समाज को समझाने में सहायक बनते हैं।
निमाड़ी लोक-जीवन की तरह ये गीत भी भाव प्रधान हैं। इनमें मानव-मन की अत्यंत कोमल भावनाओं का सजीव चित्रण मिलता है। इनके पीछे एक सुदृढ़ और व्यवस्थित परंपरा रही है।
विवाह गीतों में कन्या की सगाई से लेकर विवाह तक के हर क्षण का विस्तार से वर्णन मिलता है, वहीं गणगौर गीतों में किशोरावस्था से लेकर विवाहोपरांत स्त्री-मन की भावनाओं का चित्रण है।
यदि गणगौर गीतों को नारी-जीवन का मधुर गीतिकाव्य कहा जाए, तो विवाह गीत हमारे सामाजिक जीवन की मांगलिक अभिव्यक्ति हैं। इन दोनों को मिलाकर देखा जाए तो निमाड़ी पारिवारिक जीवन का विराट और जीवंत दर्शन सामने आता है।
स्त्री और पुरुष प्रवृत्ति के गीत

स्वभावतः निमाड़ी लोक-गीत दो वर्गों में विभक्त दिखाई देते हैं—
स्त्री-प्रधान गीत
गणगौर, विवाह, व्रत-त्योहार, ऋतु और तीर्थों से जुड़े गीत प्रायः स्त्रियों द्वारा सामूहिक रूप से गाए जाते हैं। इन गीतों में प्रत्येक पंक्ति को देवी-देवताओं के नाम से पाँच बार दोहराया जाता है, जिससे नई पीढ़ी स्वतः ही इन्हें सीखती जाती है। यही कारण है कि ये गीत पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रहे हैं।
पुरुष-प्रधान गीत
होली, रासलीला, अकाल और भगवान कृष्ण से जुड़े गीत पुरुषों द्वारा सामूहिक रूप से गाए जाते हैं और इनमें वाद्य यंत्रों का विशेष महत्व होता है।
एक रोचक तथ्य यह है कि स्त्रियों द्वारा गाए जाने वाले गीत आज भी अपने मूल स्वरूप में सुरक्षित हैं, जबकि पुरुषों के गीतों में समय के साथ कई परिवर्तन और कुछ अंशों का लोप हो गया है।
लोक-गीतों में सामाजिक मान्यताएँ

इन गीतों से निमाड़ी समाज की मान्यताओं का स्पष्ट परिचय मिलता है।
बाल-जन्म को साधारण घटना नहीं, बल्कि नए इंसान के आगमन के रूप में देखा जाता है। बच्चे की तुलना कामदेव से की जाती है। घर में उत्सव मनाया जाता है—कपड़े बाँटे जाते हैं, उपहार दिए जाते हैं, ज्योतिषी से भाग्य-रेखा देखी जाती है, सुनार से गहने बनवाए जाते हैं।
विवाह गीतों में भी यही भाव दिखाई देता है। दूल्हे का स्वागत राजा की तरह किया जाता है। स्त्रियाँ गीत गाती हैं, आरती होती है, केसर-चंदन से तिलक लगाया जाता है। छोटे होने पर भी दूल्हे को विशेष सम्मान दिया जाता है। साधारण व्यक्ति को क्षणिक रूप से राजा बना देना—यही लोक-गीतों की सबसे बड़ी शक्ति है।
प्रतीक, उपमाएँ और कल्पनाएँ
निमाड़ी लोक-गीतों में प्रतीकों और उपमाओं की अद्भुत दुनिया है।
कोयल, मोर, हंस, चिड़ियाँ—सब शुभ संकेतों के रूप में आते हैं।
रास्तों को “पियरारी बाट”, दूसरे विवाह को “संकट की सात” जैसे प्रतीकात्मक नाम दिए गए हैं।
परिवार के प्रत्येक सदस्य की तुलना प्रकृति या जीवन के किसी तत्व से की गई है—
पिता मानसरोवर समान,
माँ गंगा की तरह,
सास बावड़ी की तरह,
बहिन सावन की हरियाली,
ननद बिजली,
भाई कृष्ण,
बच्चा गुलाब का फूल।
नख-शिख वर्णन में भी गीत किसी से पीछे नहीं हैं—
अंगुलियाँ मूंग की फली जैसी,
नाक तोते की चोंच जैसी,
आँखें नीम की फांक जैसी,
और सौंदर्य का ऐसा सजीव चित्रण जो कल्पना को साकार कर देता है।
वस्त्र, आभूषण और मंगल-कामना
इन गीतों में स्त्री-आभूषणों और वस्त्रों का विस्तृत वर्णन मिलता है—
नथ, कंदोरा, बाजूबंद, गजरा, करधनी, चुड़ियाँ, पायजेब—सब लोक-संस्कृति की पहचान हैं।
गीतों में निरंतर मंगल-कामना व्यक्त होती है—
दूल्हा दूध से स्नान करता है,
घर में घी-दूध की नदियाँ बहती हैं,
समृद्धि और सौभाग्य की कामना हर पंक्ति में झलकती है।
जीवन, श्रम और स्वभाव

- इन गीतों में गृहस्थ जीवन के सुंदर चित्र हैं।
- स्त्री हल चलाते किसान से धन नहीं, बल्कि “दूध, पूत और अभय” माँगती है।
- चक्की, हल और खेत—सब गीतों के साथ चलते हैं।
इन गीतों से निमाड़ी स्वभाव का भी परिचय मिलता है—
“भोला मानवई”, “भोला घणियेर” जैसे शब्द बताते हैं कि निमाड़ की आत्मा सरल और निश्छल है।
इन गीतों में उत्तर भारत की गंगा-यमुना और दक्षिण की कावेरी—दोनों का संगम मिलता है। इस तरह ये गीत राष्ट्रीय एकता के भी प्रतीक बन जाते हैं।
लेखक की आत्मीय अनुभूति
लेखक के लिए ये गीत केवल अध्ययन का विषय नहीं, बल्कि जीवन के साथी रहे हैं।
कभी ये गीत चुपके से बुलाते हैं, कभी विवाह का निमंत्रण देते हैं, कभी उत्सव में खींच ले जाते हैं।
ये गीत मनोभावनाओं का कोमल इतिहास हैं।
इस संग्रह में प्रत्येक गीत को स्वतंत्र स्थान दिया गया है, जैसे हर व्यक्ति का अपना व्यक्तित्व होता है।
कुछ अध्यायों में गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर के विचार भी जोड़े गए हैं, जिससे लोक-साहित्य और शिष्ट साहित्य का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।
निष्कर्ष
आज लोक-गीतों का वास्तविक खतरा यह है कि उन्हें केवल मंच, रेडियो या प्रदर्शन तक सीमित कर दिया गया है।
वास्तव में लोक-गीतों का असली स्थान जीवन की ज़मीन पर है।
जैसा कि कहा गया है—
लोक-कला को नगरों में प्रदर्शित करना एक बात है, लेकिन उसे जन-जीवन में जीवित रखना दूसरी बात।
निमाड़ की धरती पर उपजे ये गीत तभी जीवित रहेंगे जब वे उसी मिट्टी में पनपते रहेंगे।


