निमाड़ी कलाकार

निमाड़ में - श्रृंगार गीत

निमाड़ के श्रृंगार गीत | निमाड़ी लोकसाहित्य में प्रेम, विरह और लोकजीवन

निमाड़ के श्रृंगार गीत | निमाड़ी लोकसाहित्य में प्रेम, विरह और लोकजीवन

संपादक – गीतेश कुमार भार्गव

निमाड़ के श्रृंगार गीत
निमाड़ के श्रृंगार गीत

भूमिका

हिन्दी साहित्य के विकास पर विचार करते समय यह स्पष्ट होता है कि शास्त्रीय, दरबारी और रीतिकालीन परंपराओं से अलग लोकजीवन से जुड़ी रचनाएँ ही भाषा की वास्तविक शक्ति को प्रकट करती हैं। शास्त्राभ्यास, अलंकार-विधान और नायक-नायिका के बँधे-बँधाए वर्गीकरण से हटकर जब हम ग्राम्य जीवन में प्रचलित गीतों की ओर देखते हैं, तब प्रेम, वियोग, मिलन, तड़प, आशा और पीड़ा के सच्चे, सहज और जीवंत रूप सामने आते हैं। इसी लोकधारा का एक महत्त्वपूर्ण और समृद्ध पक्ष हैं—निमाड़ के श्रृंगार गीत।

निमाड़ और उसकी लोक-सांस्कृतिक भूमि

नर्मदा अंचल में बसा निमाड़ क्षेत्र अपनी भौगोलिक स्थिति, कृषि-आधारित जीवन और सामुदायिक संस्कृति के कारण विशिष्ट लोक-संवेदनाओं को जन्म देता है। यहाँ का जीवन प्रकृति के निकट है—खेती, नदी, ऋतुएँ, पर्व और पारिवारिक संबंध ही लोकगीतों की मूल भूमि हैं। निमाड़ी लोकभाषा में रचे गए गीत किसी साहित्यिक प्रयोग या शास्त्रीय अनुशासन के परिणाम नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्यक्ष अनुभवों की सहज अभिव्यक्ति हैं।

श्रृंगार गीतों की लोकधारा

निमाड़ के श्रृंगार गीत केवल स्त्री-पुरुष प्रेम का वर्णन नहीं करते, बल्कि जीवन के सम्पूर्ण भाव-जगत को स्पर्श करते हैं। इन गीतों में—

  • नवयौवन का उत्साह और चंचलता,
  • प्रिय के आगमन की प्रतीक्षा,
  • मिलन का उल्लास,
  • वियोग की पीड़ा,
  • दाम्पत्य जीवन की कोमल अनुभूतियाँ,
  • सास, ननद, सौत जैसे पारिवारिक संबंधों की भावनात्मक जटिलताएँ
    —सब कुछ अत्यंत स्वाभाविक रूप में प्रकट होता है।

यहाँ श्रृंगार कृत्रिम नहीं है। यह अलंकारों से लदी हुई नायिका नहीं, बल्कि खेत में काम करती, चक्की पीसती, नदी से पानी भरती, या अपने आँगन में बैठी स्त्री के हृदय से फूटता भाव है।

लोकजीवन से जुड़ा यथार्थ

लोकजीवन से जुड़ा यथार्थ
लोकजीवन से जुड़ा यथार्थ

जहाँ शास्त्रीय कविता में प्रेम और श्रृंगार अक्सर पूर्वनिर्धारित नियमों और वर्गीकरणों में बँधे होते हैं, वहीं निमाड़ के श्रृंगार गीत लोकजीवन के यथार्थ से गहरे जुड़े हैं। भाई से बिछुड़ी बहन की करुणा, विवाह के बाद मायके की स्मृति, पति के परदेश जाने का दुःख, और पुनर्मिलन की आशा—ये सब गीतों में सहज रूप से उपस्थित हैं।

इन गीतों में नायक-नायिका किसी ग्रंथ के पात्र नहीं, बल्कि गाँव के ही स्त्री-पुरुष हैं। इसी कारण इनका भाव-बोध अधिक सजीव और प्राणमय बन पड़ता है।

प्रकृति और श्रृंगार

प्रकृति और श्रृंगार
प्रकृति और श्रृंगार

निमाड़ के श्रृंगार गीतों में प्रकृति केवल सजावट नहीं, बल्कि आलम्बन है। नदी, खेत, फसल, सावन की हरियाली, चाँदनी रात, पवन और वर्षा—ये सभी प्रेम के सहचर बनकर आते हैं। प्रिय के बिना सूना आँगन, सूखी धरती की तरह प्रतीत होता है; और मिलन पर वही धरती हरियाली से भर उठती है।

इस प्रकार निमाड़ी श्रृंगार गीतों में प्रकृति और मानव-भावनाओं का गहरा तादात्म्य दिखाई देता है।

स्त्री-दृष्टि और श्रृंगार

स्त्री-दृष्टि और श्रृंगार
स्त्री-दृष्टि और श्रृंगार

निमाड़ के श्रृंगार गीतों की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है—स्त्री की केन्द्रीय भूमिका। यहाँ स्त्री केवल श्रृंगार की वस्तु नहीं, बल्कि भावों की सर्जक है। उसकी प्रतीक्षा, उसकी पीड़ा, उसका प्रेम और उसका आत्मसम्मान गीतों के माध्यम से अभिव्यक्त होता है।

यह लोकस्त्री किसी कल्पित, अवास्तविक मूर्ति के रूप में नहीं आती, बल्कि अपने जीवन-संघर्षों के साथ उपस्थित होती है। इस दृष्टि से निमाड़ी श्रृंगार गीत आधुनिक चेतना से भी जुड़ते दिखाई देते हैं।

शास्त्रीय परंपरा से भिन्नता

हिन्दी साहित्य के इतिहास में देखा जाए तो रीतिकालीन कविता में श्रृंगार एक बँधे-सँधे ढाँचे में ढल गया था। नायिका-भेद, अलंकार और रस-नियमों की प्रधानता के कारण कविता जीवन से कुछ दूर हो गई थी। इसके विपरीत निमाड़ के लोक श्रृंगार गीतों में किसी शास्त्र की नकल नहीं, बल्कि जीवन की सच्ची अनुभूति है।

यही कारण है कि ये गीत निराकार होते हुए भी प्राणमय हैं, जबकि अनेक शास्त्रीय रचनाएँ अलंकारों से सजी होने पर भी निस्प्राण प्रतीत होती हैं।

निमाड़ के श्रृंगार गीत : उदाहरण

निमाड़ के श्रृंगार गीतों की आत्मा को समझने के लिए कुछ प्रतिनिधि निमाड़ी पंक्तियाँ देखना आवश्यक है। ये पंक्तियाँ किसी शास्त्रीय ग्रंथ से नहीं, बल्कि लोकजीवन के अनुभव से जन्मी हैं—

(1) प्रिय के विरह की पीड़ा
“आवो जी पिया, आँगण सूनो लागे,
बिन थारे हँसे न काग।”

यहाँ प्रिय के बिना सूने आँगन का बिंब सीधे जीवन से जुड़ा है। विरह को किसी अलंकार की सहायता नहीं चाहिए।

(2) मिलन की आकांक्षा और लाज
“सांझ पड़ी रे साजन,
नदी किनारे बाट जोहूँ।”

सांझ, नदी और प्रतीक्षा—तीनों मिलकर श्रृंगार का सहज वातावरण रचते हैं।

(3) नवयौवन और चंचल प्रेम
“काजल री धार बहे नयना सूँ,
देख थारो मुखड़ो साजण।”

यह पंक्ति सौंदर्य-वर्णन से अधिक प्रेम की स्वाभाविक प्रतिक्रिया को व्यक्त करती है।

(4) दाम्पत्य जीवन का कोमल भाव
“खेतां री मेड़ां चालूँ थारे संग,
हाथां में हाथ, जीवा रंग।”

यहाँ श्रृंगार जीवन-सहचर्य से जुड़ा है—प्रेम खेत और श्रम के बीच पनपता है।

(5) मायके की स्मृति और मन का द्वंद्व
“पीहर री गलियाँ याद आवे,
सास ननद री बात चुभावे।”

इस प्रकार के गीतों में स्त्री का आंतरिक संसार अत्यंत सजीव रूप में उभरता है।

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निष्कर्ष

निमाड़ के श्रृंगार गीत हिन्दी लोकसाहित्य की वह धरोहर हैं, जिनमें जीवन की सच्ची धड़कन सुनाई देती है। ये गीत प्रेम और सौंदर्य को किसी रूढ़ ढाँचे में नहीं बाँधते, बल्कि लोकानुभव के आधार पर उसे जीवंत बनाते हैं। शास्त्रीय कविता जहाँ कई बार जीवन से दूर प्रतीत होती है, वहीं निमाड़ी श्रृंगार गीत जीवन के बिल्कुल समीप खड़े दिखाई देते हैं।

इसी कारण ये गीत आज भी गाए जाते हैं, याद किए जाते हैं और पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोकस्मृति में सुरक्षित रहते हैं।

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