निमाड़ में होली 3 चरण 1 उत्सव में बसता लोक जीवन

निमाड़ में होली के लोकगीत : परम्परा, उत्सव और लोकसंस्कृति का जीवंत रंग

होली वसंत ऋतु में मनाया जाने वाला भारतीय और नेपाली समाज का एक प्रमुख पारम्परिक पर्व है। यह केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि प्रेम, सौहार्द, उल्लास और सामाजिक समरसता का प्रतीक है। सम्पूर्ण भारत के साथ-साथ पड़ोसी देश नेपाल में भी यह पर्व बड़े उत्साह से मनाया जाता है। भारत के मध्य में स्थित मध्यप्रदेश के निमाड़ और मालवा अंचल में होली का स्वरूप विशेष रूप से लोकसंस्कृति से जुड़ा हुआ, सामूहिक और अनूठा है।
होली का पौराणिक और ऐतिहासिक आधार

पौराणिक कथाओं के अनुसार होली पर्व का संबंध भक्त प्रह्लाद और होलिका की कथा से है, जहाँ भक्त प्रह्लाद की अटूट भक्ति के कारण अग्नि भी उसे भस्म नहीं कर सकी। यह पर्व अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक है। हिंदू पंचांग के अनुसार यह पर्व फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है।
इतिहासकारों के अनुसार होली का प्रचलन आर्यकाल से रहा है। नारद पुराण और भविष्य पुराण जैसे प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में भी होली पर्व का उल्लेख मिलता है, जिससे इसकी प्राचीनता और सांस्कृतिक महत्त्व सिद्ध होता है।
निमाड़ में होली की शुरुआत : झंडा गाड़ना और होलिका स्थापना

निमाड़ अंचल में होली की तैयारियाँ लगभग एक माह पूर्व प्रारम्भ हो जाती हैं। सबसे पहले झंडा या होली का डंडा किसी सार्वजनिक स्थल या घर के आँगन में गाड़ा जाता है। यह कार्य प्रायः गाँव के सरपंच या किसी सम्मानित नागरिक द्वारा किया जाता है।
महिलाएँ, बच्चे और बुजुर्ग मिलकर गोबर के कण्डे, गोबर से बने नारियल, पीपल-पान, षटकोण, मालाएँ आदि बनाकर होली दहन स्थल पर पूजन के साथ अर्पित करते हैं। कई स्थानों पर भरभोलिए जलाने की परम्परा भी प्रचलित है। भरभोलिए गाय के गोबर से बने उपले होते हैं, जिनमें मूँज की रस्सी डालकर सात-सात की माला बनाई जाती है। होली जलाने से पूर्व यह माला भाइयों के सिर के ऊपर सात बार घुमाकर अग्नि में अर्पित की जाती है।
होलिका दहन और सामाजिक सहभागिता

ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में होली का विधिवत पूजन ग्राम प्रधान द्वारा किया जाता है। दिन ढलने के बाद ज्योतिषीय मुहूर्त में होलिका दहन होता है। इस दिन निमाड़ और मालवा के घरों में विशेष पकवान बनाए जाते हैं—जैसे पूरनपोली, भजिये, पकोड़े, दाल-चावल, कढ़ी आदि—जिनका होली को भोग लगाया जाता है।
हालाँकि, लकड़ियाँ और हरे पेड़-पौधे काटकर होली स्थल पर डालने की परम्परा से पर्यावरण को नुकसान भी पहुँचता है, जिसे लेकर आज जागरूकता की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
निमाड़ में होली के लोकगीतों की परम्परा
निमाड़ क्षेत्र में होली केवल एक दिन का पर्व नहीं है। यहाँ होलिका दहन से लेकर रंग पंचमी तक होली मनाई जाती है और इस पूरे कालखंड में विभिन्न अवसरों पर अलग-अलग प्रकार के लोकगीत गाए जाते हैं।
निमाड़ी होली गीतों की सबसे बड़ी विशेषता है उनकी स्थानीय बोली की मिठास। इन गीतों में ‘म्हारो’, ‘कान्हो’, ‘खेला’, ‘फागुन’ जैसे शब्द लोकजीवन की आत्मा को अभिव्यक्त करते हैं।
विषय-वस्तु
राधा-कृष्ण की लीलाएँ : कान्हा और राधा के होली खेलने के प्रसंग

फागुन का उल्लास : वसंत ऋतु, आम्र मंजरी, कोयल की कूक

रंग और गुलाल : पिचकारी, अबीर और रंगों का उत्सव

लोकप्रिय निमाड़ी होली गीत जैसे—
“कान्हो म्हारो खेल बिरज म”
“फागुन आयो रे रंगीलो”
आज भी लोकगायकों और यूट्यूब जैसे माध्यमों के कारण जीवंत हैं।
निमाड़ की होली की अनूठी लोकपरम्पराएँ
निमाड़ की होली केवल गीतों तक सीमित नहीं है। यहाँ कई अनोखी परम्पराएँ और आयोजन होते हैं, जो इसे अन्य क्षेत्रों से अलग पहचान देते हैं—

रुमाल मार : समूहों में खेला जाने वाला पारम्परिक खेल
गाड़ा खींचना : शक्ति और कौशल का प्रदर्शन
भैंसों की लड़ाई : ग्रामीण साहस और परम्परा का प्रतीक
बैलगाड़ी दौड़ (बेलगाड़ी रेस) : लोक-उत्सव का रोमांचक आयोजन
ये सभी आयोजन निमाड़ी लोकसंस्कृति के अभिन्न अंग हैं और सामूहिक सहभागिता की भावना को मजबूत करते हैं।
रंग पंचमी : उल्लास का शिखर

रंग पंचमी के दिन रंगों का चरम उत्सव देखने को मिलता है। पूरे गाँव और मोहल्ले में ढोल-नगाड़ों के साथ रंग, गुलाल और पानी की बौछार होती है। इस दिन भेदभाव, वैमनस्य और सामाजिक दूरी समाप्त होकर केवल लोक-आनंद और भाईचारे का भाव शेष रहता है।

निष्कर्ष
निमाड़ में होली के लोकगीत और परम्पराएँ केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं हैं, बल्कि वे लोकजीवन की स्मृतियाँ, आस्था, प्रेम और सांस्कृतिक चेतना को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाती हैं। होलिका दहन से लेकर रंग पंचमी तक गूँजते निमाड़ी होली गीत इस अंचल की सांस्कृतिक आत्मा हैं, जिनमें उल्लास, भक्ति और लोकबोध एक साथ रंग बिखेरते हैं।


