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निमाड़ में - लोरी एवं बच्चों के गीत

निमाड़ में – लोरी एवं बच्चों के गीत

निमाड़ में – लोरी एवं बच्चों के गीत

संपादक – गीतेश कुमार भार्गव

लोरियों की लोक परंपरा और बाल्य-रस का संसार
लोरियों की लोक परंपरा और बाल्य-रस का संसार

लोरियों की लोक परंपरा और बाल्य-रस का संसार

भारतीय लोक-संस्कृति में बच्चों के गीत, विशेषकर लोरियाँ, केवल शिशु को सुलाने का साधन नहीं रहीं, बल्कि वे समाज की सामूहिक स्मृति, भावनाओं और संस्कारों का सजीव रूप हैं। हमारे अलंकार-शास्त्रों में भले ही नौ रसों का उल्लेख मिलता हो, किंतु लोरियों में जो अनुभूति होती है, वह शास्त्रोक्त रसों की सीमाओं से परे है। यही वह कोमल भाव है, जिसे महाकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने एक अलग ही संवेदना के रूप में देखा—एक ऐसी सुगंध की तरह, जो अभी-अभी जोती हुई धरती या नवजात शिशु के कोमल शरीर से उठती है। इस भाव को किसी फूल, चंदन, इत्र या धूप की गंध से तुलना नहीं की जा सकती। यह अपने आप में आदिम, सहज और आत्मीय है।

बाल्य-रस: एक अनकहा रस

बाल्य-रस: एक अनकहा रस
बाल्य-रस: एक अनकहा रस

लोरियों में समाहित भाव को यदि कोई नाम दिया जाए, तो उसे बाल्य-रस कहा जा सकता है। यह रस न तो श्रृंगार है, न करुण, न वात्सल्य की परंपरागत परिभाषा में पूरी तरह बंधता है। इसमें वात्सल्य तो है, पर उससे कहीं अधिक—एक ऐसी मृदुलता, जो शब्दों से पहले मन को छूती है। माँ, दादी या नानी की आवाज़ में गाई गई लोरी में संगीत से अधिक स्नेह की ऊष्मा होती है। यही ऊष्मा शिशु को सुरक्षित होने का अनुभव कराती है और उसे नींद की गोद में सुला देती है।

लोकजीवन और लोरियों का गहरा संबंध

लोकजीवन और लोरियों का गहरा संबंध
लोकजीवन और लोरियों का गहरा संबंध

पुराने समय में जब मनोरंजन के आधुनिक साधन उपलब्ध नहीं थे, तब लोकजीवन में गीत और कथाएँ ही सबसे बड़े सहचर थे। गाँवों में न टीवी था, न मोबाइल, न खिलौनों की भरमार। ऐसे में बच्चों का पहला संसार माँ की गोद और उसकी आवाज़ होती थी। लोरियाँ केवल रात को सुलाने के लिए नहीं गाई जाती थीं, बल्कि दिनभर के काम के बीच भी—जब माँ चक्की पीस रही हो, पानी भर रही हो या खेत से लौट रही हो।

इन लोरियों के शब्द सरल होते थे, पर अर्थ गहरे। उनमें चाँद, तारे, गौएँ, खेत, नदी, राजा-रानी, चिड़ियाँ—सब कुछ होता था। यही कारण है कि बच्चा बहुत छोटी उम्र से ही अपने परिवेश, प्रकृति और समाज से जुड़ने लगता था। लोरी उसके लिए पहला पाठ्यक्रम थी, जिसमें जीवन की सहज समझ छिपी होती थी।

दादी-नानी की कहानियाँ: गीतों में ढली कथाएँ

दादी-नानी की कहानियाँ: गीतों में ढली कथाएँ
दादी-नानी की कहानियाँ: गीतों में ढली कथाएँ

लोरियों के साथ-साथ छोटी-छोटी कहानियाँ भी लोकपरंपरा का अभिन्न अंग थीं। दादी-नानी बच्चों को सुलाते समय या शाम के समय गीतात्मक शैली में कथाएँ सुनाती थीं। ये कहानियाँ अक्सर नैतिक मूल्यों, साहस, सच्चाई और करुणा का संदेश देती थीं। कई बार कहानी और गीत एक-दूसरे में घुल-मिल जाते थे—कथानक चलता रहता और बीच-बीच में तुकबंदी या लय आ जाती।

इस प्रक्रिया में बच्चा केवल मनोरंजन ही नहीं पाता था, बल्कि उसकी कल्पनाशक्ति, भाषा-बोध और नैतिक समझ भी विकसित होती थी। लोककथाएँ और लोरियाँ मिलकर बालमन में संस्कारों का बीज बोती थीं।

लोरी और बच्चों के गीतों का विशेष महत्व

लोकगीतों में लोरी और बच्ची से जुड़े गीतों का अपना अलग स्थान है। इनमें भविष्य की आशाएँ, समाज की कामनाएँ और परिवार का स्नेह समाया होता है। माँ अपनी बेटी के लिए सपने बुनती है—कभी उसे रानी बनाती है, कभी देवी, तो कभी घर की लक्ष्मी। इन गीतों में बेटी के प्रति प्रेम के साथ-साथ समाज की सोच भी झलकती है।

हालाँकि समय के साथ समाज बदला है, पर इन गीतों का मूल भाव आज भी उतना ही प्रासंगिक है। ये गीत हमें बताते हैं कि बेटी केवल परिवार की सदस्य नहीं, बल्कि लोक-संस्कृति की संवाहक भी है।

आदिमता और सहज सौंदर्य

रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने जिस आदिमता की बात की है, वह लोरियों की आत्मा है। यह आदिमता असभ्यता नहीं, बल्कि प्रकृति से निकटता का प्रतीक है। जैसे नवनीत की सुगंध या मिट्टी की महक—वैसे ही लोरियों में एक सहज सौंदर्य है। न कोई बनावट, न शास्त्रीय जटिलता। शब्द भले ही साधारण हों, पर अनुभूति अत्यंत गहरी होती है।

आधुनिक समय में लोरियों की प्रासंगिकता

आधुनिक समय में लोरियों की प्रासंगिकता
आधुनिक समय में लोरियों की प्रासंगिकता

आज के डिजिटल युग में, जब बच्चों के चारों ओर स्क्रीन ही स्क्रीन हैं, लोरियों का महत्व और भी बढ़ जाता है। रिकॉर्डेड म्यूज़िक या मोबाइल ऐप्स भले सुविधा दें, पर माँ की आवाज़ में गाई गई लोरी का स्थान कोई नहीं ले सकता। यह केवल नींद नहीं देती, बल्कि भावनात्मक सुरक्षा भी प्रदान करती है।

यदि हम अपनी लोकपरंपराओं को जीवित रखना चाहते हैं, तो लोरियों और बालगीतों को फिर से अपने जीवन में स्थान देना होगा। ये हमारी सांस्कृतिक विरासत हैं, जिन्हें पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाना हमारा दायित्व है।

निष्कर्ष

लोरी एवं बच्चों के गीत, लोरियाँ और बाल्य कथाएँ—ये सब मिलकर भारतीय लोकजीवन का वह कोमल पक्ष रचते हैं, जहाँ स्नेह, प्रकृति और संस्कृति एक-दूसरे में विलीन हो जाते हैं। यह परंपरा हमें सिखाती है कि सबसे गहरी शिक्षा और सबसे मधुर कला वहीं जन्म लेती है, जहाँ प्रेम और सहजता हो। लोरियाँ केवल गीत नहीं, बल्कि लोक-संस्कृति की धड़कन हैं, जिन्हें सुनते-सुनते पीढ़ियाँ बड़ी हुई हैं और आगे भी होती रहेंगी।

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