निमाड़ में – गणगौर के परम्परागत गीत Traditional Gangaur Geet 1 परिचय
संपादक – गीतेश कुमार भार्गव ( जब निमाड़ गाता हे संकलन से प्रेरित )

निमाड़ में – गणगौर के परम्परागत गीत
निमाड़ की नारी-संस्कृति, देवी-परंपरा और कृषि-जीवन का जीवंत लोक-दस्तावेज
निमाड़ अंचल में गनगौर का पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान या पारंपरिक उत्सव नहीं है, बल्कि यह नारी-जीवन की भावनाओं, कामनाओं, आशंकाओं और विश्वासों का सामूहिक लोक-अभिव्यक्ति रूप है। चैत्र बदी दशमी से लेकर चैत्र सुदी तृतीया तक, लगभग नौ दिनों तक चलने वाला यह पर्व निमाड़ की एक विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान बन चुका है। इन दिनों में ऐसा कोई क्षण नहीं होता जो गीतों के बिना पूर्ण माना जाए। पूरा अंचल मानो गीतों में सांस लेने लगता है।
गनगौर के अवसर पर शिव–पार्वती, सत्यवान–सावित्री, विष्णु–लक्ष्मी और चंद्रमा–रोहिणी जैसे दैवी दंपतियों की वंदना के गीत गाए जाते हैं। किंतु इन सबमें सबसे अधिक प्रचलित और भावपूर्ण गीत रणु देवी (रणुबाई) और उनके पति धणियेर (सूर्य) के संवाद रूप में रचे गए हैं। ये गीत स्त्रियों द्वारा गाए जाते हैं, पर इनमें स्त्री और पुरुष—दोनों की भूमिकाएँ, संवेदनाएँ और सामाजिक जिम्मेदारियाँ स्पष्ट रूप से उभरती हैं।
रणुबाई : लोकदेवी से ऐतिहासिक देवी तक की यात्रा
निमाड़ी लोक-गीत परंपरा में रणुबाई को अधिष्ठात्री देवी का स्थान प्राप्त है। उनके गीतों में बार-बार यह संकेत मिलता है कि वे सौराष्ट्र देश से आई हैं। यह संकेत केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्मृति का द्योतक है। कुछ गीतों में रणु देवी को ‘रावी’ नाम से भी संबोधित किया गया है, जो उनके लोकस्वरूप की विविधता को दर्शाता है।
लोकमान्यता के अनुसार रणुबाई के मंदिर में वे आसन पर विराजमान रहती हैं और अपने भक्तों के लिए स्वयं मंदिर के द्वार खोल देती हैं। यह भाव दर्शाता है कि देवी और भक्त के बीच कोई दूरी नहीं है। एक अन्य गीत में रणुबाई को ऐसी देवी बताया गया है जो बाँझ स्त्रियों की कोख भरती हैं और संतान-सुख प्रदान करती हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि गनगौर केवल सौभाग्य का पर्व नहीं, बल्कि मातृत्व की कामना से भी गहराई से जुड़ा है।
विद्वानों की सम्मति से रणुबाई वस्तुतः सूर्य की पत्नी ‘राज्ञी देवी’ का ही लोकभाषिक और अपभ्रंश रूप हैं। जैसे संस्कृत शब्द लोक में बदलते-बदलते सरल हो जाते हैं—
रण्णी → राणी → रजु
उसी प्रकार राज्ञी देवी का नाम लोक में रणुबाई बन गया। जैसे ‘यज्ञोपवीत’ से ‘जनेऊ’ शब्द बना, वैसे ही देवी का संस्कृत नाम लोकभाषा में घुलकर नया रूप लेता गया।
सौराष्ट्र से निमाड़ : देवी-पूजा का ऐतिहासिक प्रवाह
राज्ञी देवी की पूजा प्राचीन काल में गुजरात और सौराष्ट्र क्षेत्र में प्रचलित थी। चौदहवीं शताब्दी तक की उनकी मूर्तियाँ आज भी मिलती हैं। एक मूर्ति-लेख में उन्हें श्री साम्वादित्य की देवी श्री रणादेवी कहा गया है।
सौराष्ट्र में पोरबंदर के निकट बगवइर और किंडरखेड़ा जैसे स्थानों पर रत्ना देवी या रांदल देवी के प्रसिद्ध मंदिर हैं। मत्स्यपुराण, स्कंदपुराण और विष्णुधर्मोत्तर पुराण के अनुसार राज्ञी और निक्षुभा सूर्य की पत्नियाँ थीं। माना जाता है कि गुप्तकाल से पूर्व शक राजाओं के साथ यह सूर्य-देवी परंपरा गुजरात-सौराष्ट्र में आई और वहीं से लोकसंस्कृति के माध्यम से निमाड़ तक पहुँची।
आज भी गुजरात में रांदल माँ की पूजा संतान-प्राप्ति के लिए की जाती है और प्राचीन गुजराती भजनों में उनके उल्लेख मिलते हैं। इस प्रकार गनगौर के गीत इतिहास, धर्म और लोकविश्वास—तीनों को एक साथ जोड़ते हैं।
निमाड़ में – गणगौर के परम्परागत गीत : नारी-जीवन का गीतात्मक उत्सव

यदि गणगौर के पर्व को नारी-जीवन का सुमधुर गीति-काव्य कहा जाए, तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। चैत्र बदी दशमी से चैत्र सुदी तृतीया तक ऐसा कोई कर्म नहीं होता जो गीत के बिना सम्पन्न हो।
स्त्रियाँ सामूहिक रूप से इस पर्व को मनाती हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो ऋतुराज वसंत का स्वागत किया जा रहा हो। आम्र-वृक्षों पर कोयल की कूक, पलाश के फूलों की लाली और होली की उतरती खुमारी के साथ जब गनगौर आरंभ होती है, तब पूरे गाँव में गीतों की गूँज फैल जाती है।
जवारों का संस्कार : नारी और कृषि का संबंध
निमाड़ में – गणगौर के परम्परागत गीत
में होली की राख से चुने गए कंकरों के साथ गौरी की प्रतिष्ठा की जाती है। छोटी-छोटी टोकनियों में मिट्टी भरकर उनमें गेहूँ बोया जाता है। यह क्रिया केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि नारी द्वारा कृषि और जीवन को संस्कारित करने की प्रक्रिया है। प्रतिदिन इन जवारों को सींचा जाता है, उनकी आरती की जाती है और उन्हें परिवार के सदस्य की तरह सहेजा जाता है।
सींचते समय गाया जाने वाला गीत—
“म्हारा हरिया जवारा हो, कि गेहूँ लहलहे…”
यह दर्शाता है कि जवार केवल पौधे नहीं, बल्कि समृद्धि, संतान, और भविष्य की आशा के प्रतीक हैं।
संकट, करुणा और संतुलन का लोकदर्शन
गनगौर मूलतः एक खेतिहर पर्व भी है। इसमें अनाज को देवी रूप में प्रतिष्ठित किया जाता है। नौवें दिन जवारों को लेकर बड़ा उत्सव मनाया जाता है। यदि इस बीच कोई संकट आ जाए—जैसे हिरणों द्वारा फसल चर लेना—तो पुरुष से सहायता की अपेक्षा स्वाभाविक हो जाती है। इसी भाव को व्यक्त करता हुआ गीत है—
“ऊँचो खेड़ो रे,
म्हारा हरिया जवारा, सरस जवारा,
वहाँ रे हरण राजा जब चरै।”
इस पर पति विष्णु-सदृश शांत भाव से उत्तर देता है—
“हम उसे क्यों मारें प्रिये,
हमारी माँ सांवली है, बहिन पतली है
और अमुक बहन ससुराल में।”
यह संवाद नारी की करुणा, प्रकृति-संरक्षण और संतुलन के भाव को उजागर करता है।
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उपसंहार
निमाड़ के गनगौर गीत लोकगीत भर नहीं हैं, वे स्त्री-जीवन की आत्मकथा, कृषि-संस्कृति का दर्शन और देवी-परंपरा का इतिहास हैं। रजुबाई के रूप में सूर्य-परंपरा, जवारों के रूप में अन्न-संस्कृति और गीतों के रूप में सामूहिक चेतना—इन सबका संगम गनगौर को निमाड़ की आत्मा बना देता है।


