निमाड़ी कलाकार

निमाड़ी विवाह के संध्या गीत – Nimadi Traditional Lyrics

निमाड़ी विवाह के संध्या गीत – Nimadi Traditional Lyrics

निमाड़ी विवाह के संध्या गीत
निमाड़ी विवाह के संध्या गीत

भूमिका

निमाड़ी लोक-संस्कृति में विवाह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि प्रकृति, समय, प्रकाश और संबंधों का उत्सव है। विवाह के प्रत्येक चरण—प्रभात, संध्या और रात्रि—के लिए अलग-अलग गीत गाए जाते हैं, जिनमें जीवन के सूक्ष्म भाव, सामाजिक संरचना और आध्यात्मिक चेतना समाहित रहती है।
संध्या काल के निमाड़ी विवाह गीत विशेष रूप से विरह, प्रतीक्षा, मिलन, प्रकाश और मंगलकामना को स्वर देते हैं।

इस लेख में संकलित निमाड़ी संध्या गीत—“ओ म्हारी बादल वरणी”, “बय लड़ी सांजुली”, “सोना की डांडी दिया” और “रंगमहल”—न केवल लोक-गीत हैं, बल्कि वे उस जीवन-दृष्टि को प्रकट करते हैं जिसमें स्त्री की संवेदना, दीपक का प्रकाश, दाम्पत्य का संतुलन और परिवार की समृद्धि एक-दूसरे से जुड़ी हुई है।
इन गीतों के माध्यम से निमाड़ अंचल का लोकमानस यह दर्शाता है कि जैसे दिन संध्या में ढलता है, वैसे ही जीवन में भी प्रतीक्षा के बाद मिलन और अंधकार के बाद प्रकाश अवश्य आता है।


निमाड़ी विवाह के संध्या गीत – ओ  म्हारी बादल वरणी…..

ओ  म्हारी बादल वरणी
ओ  म्हारी बादल वरणी

ओ  म्हारी बादल वरणी , सगुणी साजुली आव
दिन दरियाव सोगिटड़ों वत म सिधार
रात अंधारी कोयल पास

ओ म्हारी बादछ वरणी , सगुणी सांजुली आव
हाऊ तू क पूंछू म्हारी वऊ हो मोठी वऊ,
थारो लखपतिड़ो साहेब कहाँ छे ।

ओ म्हारी बादछ वरणी, सगुणी सांजुली आव
दित दरियाव केशरियों कचेरी सिधार
रात अम्घेरी रंगमहल मं

ओ  म्हारी बादल वरणी , सगुणी साजुली आव

– संक्षिप्त व्याख्या – 

इस निमाड़ी गीत में विरह और प्रतीक्षा का भाव व्यक्त हुआ है। स्त्री बादल-सी श्यामल, सौभाग्यवती सखी को सायंकाल आने के लिए पुकारती है। दिन में प्रिय किसी कार्य या यात्रा पर निकल गया है और रात के अँधेरे में वह अकेली रह गई है। वह सखी से पूछती है कि उसका समृद्ध और प्रिय स्वामी कहाँ है। नदी, कचहरी और रंगमहल जैसे बिंबों के माध्यम से प्रिय की दूरियों को दिखाया गया है। यह गीत निमाड़ी लोक-संस्कृति में स्त्री की संवेदनशीलता, प्रतीक्षा और विरह-वेदना को दर्शाता है।


निमाड़ी विवाह के संध्या गीत – बय लड़ी सांजुली

बय लड़ी सांजुली
बय लड़ी सांजुली

दिया – बत्ती हुओं रे मिलाप, बय लड़ी सांजली ।
गौवा बछुआ हुओ रे मिलाप, बय लड़ी सांजुली ॥
पंछी – बच्च। हुओ रे मिलाप, बय लड़ी सांजुली ॥
रात – दिन  हुओ  रे मिलाप, बयलड़ी सांजुली ॥
राजा – रानी हुओ रे मिलाप, बय लड़ी सांजुली ।।

संक्षिप्त व्याख्या 

इस गीत में मिलन और पूर्णता का भाव व्यक्त किया गया है। दिया–बत्ती, गाय–बछड़ा, पक्षी–बच्चा, रात–दिन और राजा–रानी जैसे युग्मों के माध्यम से यह बताया गया है कि संसार का सौंदर्य एक-दूसरे के मिलन से ही पूर्ण होता है। “बय लड़ी सांजुली” पंक्ति सांझ के समय के सौम्य और शुभ वातावरण को दर्शाती है। यह गीत निमाड़ी लोक-संस्कृति में विवाह को मिलन, संतुलन और जीवन की संपूर्णता के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करता है।


निमाड़ी विवाह के संध्या गीत – सोना की डांडी दिया हो बल

सोना की डांडी दिया हो बल
सोना की डांडी दिया हो बल
जी हो ए ही रे दिवलो, इंद्र लुहार न घड़ियो
जेम॑  पुरव्यो सवा घड़ो तेल,

सोना की डांडी दिया हो बल ….

जी हो ए ही रे दिवलो, मजघर मं धरयो,
मजघर बठी म्हारी सदास॒हागेण माय,

सोना की डांडी दिया हो बल …..
जी हो ए ही रे दिवलो, मन  कचेरी मं धरयों
कचेरी मं5 बठया म्हारा समरथ बाप,
सोना की डांडी दिया हो बल ….
जी हो ए ही रे दिवलो मन्‌ मण्डप मं धरयो,
मण्डप बठया म्हारा अर्जुन वीर,
सोना की डांडी दिया हो बल ….
जी हो ए ही रे दिवलो, मन्‌ रसोई मं धर यो,
रसोई मं बठी म्हारी सदासुहागेण भावज
सोना की डांडी दिया हो बल ….
जी हो ए ही रे दिवलो, मन्‌ आरती मं धरयो,
आरती धर म्हारी सदासुहागेण बेण,
सोना की डांडी दिया हो बल ….
जी हो ए ही रे दिवलो मन्‌ पटसाळ मं धरयो,
पटसाछ खेल म्हारा नाना ताना वाळ ,
सोना की डांडी दिया हो बल ….
जौ हो ए ही रे दिवलो मन्‌ सभा मं धर्‌यो,
सभा मं बठया छे समधी लोग,
सोना की डांडी दिया हो बल ….

संक्षिप्त व्याख्या 

इस निमाड़ी गीत में दिये (दीपक) को शुभता, प्रकाश और पारिवारिक मंगल का प्रतीक माना गया है। सोने की डंडी वाला यह दीपक इंद्र लुहार द्वारा गढ़ा हुआ बताया गया है और उसमें सवा घड़ा तेल भरा गया है, जो उसकी दीर्घकालिक ज्योति का संकेत है। गीत में दीपक को घर के विभिन्न स्थानों—मझघर, कचहरी, मंडप, रसोई, आरती, पाठशाला और सभा—में रखा गया है। हर स्थान पर परिवार के अलग-अलग सदस्य बैठे हैं, जिससे यह संदेश मिलता है कि यह दीपक पूरे घर, रिश्तों और संस्कारों को समान रूप से प्रकाशित करता है। यह गीत निमाड़ी विवाह में समृद्धि, सौभाग्य और एकता की भावना को व्यक्त करता है।


निमाड़ी विवाह के संध्या गीत – रंगमहल

रंगमहल
रंगमहल
तुम्हरों राज अचल रहज्यों अपुक भाई, परिवार जी,
तुम्हारा रंगमहल पर मोर बोल , कोयछ शब्द सुणाविया
तुम्हारा भत्रर पलग पर लाल खेल , दासी ते रिभणों ढोलाव से,
सुणों अहेलडी, सुणो सहेलड़ी, महा रो श्राज वानो निवतियों

संक्षिप्त व्याख्या 

इस गीत में परिवार और राज्य के लिए मंगलकामना व्यक्त की गई है। गायक प्रार्थना करता है कि अमुक भाई का राज और परिवार सदा स्थिर और समृद्ध रहे। रंगमहल में मोर और कोयल की मधुर ध्वनियाँ सुख-शांति का संकेत देती हैं। पलंग पर खेलते बच्चे और दासियों द्वारा उन्हें झुलाना पारिवारिक आनंद और ऐश्वर्य को दर्शाता है। अंत में सहेलियों को स्नेहपूर्वक संबोधित कर इस शुभ अवसर के उत्सव में सम्मिलित होने का निमंत्रण दिया गया है।


Author’s Thought निमाड़ी विवाह के संध्या गीत

इन निमाड़ी संध्या गीतों में छिपी भावनाएँ केवल अतीत की स्मृति नहीं हैं, बल्कि आज भी उतनी ही जीवंत और प्रासंगिक हैं। इन गीतों में प्रयुक्त प्रतीक—बादल, संध्या, दिया, रंगमहल—जीवन के स्थायी सत्य को प्रकट करते हैं।
यह लेख लिखते हुए मेरा उद्देश्य इन गीतों को केवल शब्दों के रूप में प्रस्तुत करना नहीं था, बल्कि उनके भाव, संदर्भ और सांस्कृतिक चेतना को पाठकों तक पहुँचाना था।

निमाड़ी लोकगीतों की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि इनमें प्रयुक्त शब्द “अमुक” हर पाठक को स्वयं से जोड़ लेते हैं। जब हम इन गीतों में “अमुक” के स्थान पर अपना या अपने प्रिय का नाम रखते हैं, तो ये गीत परंपरा नहीं रह जाते—वे व्यक्तिगत अनुभूति बन जाते हैं।

मेरा विश्वास है कि यह लेख निमाड़ी लोक-संस्कृति के संरक्षण, समझ और संवर्धन की दिशा में एक छोटा-सा प्रयास है, और आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ने का माध्यम बनेगा।

गितेश कुमार भार्गव

 

 

Scroll to Top