ओ झालरियो परंपरागत गणगौर गीत 1952 – LYRICS
यह गीत निमाड़–राजस्थान अंचल का एक अत्यंत प्रसिद्ध परंपरागत गणगौर लोकगीत है, जिसे विशेष रूप से विवाह, गौना, विदाई और गणगौर उत्सव के अवसर पर गाया जाता रहा है। इसमें बेटी और पिता के संवाद के माध्यम से नारी-मन की कोमल भावनाओं, मायके से बिछड़ने का दर्द और ससुराल जाने की आशंका को बड़ी मार्मिकता से प्रस्तुत किया गया है।

सोन्ना रूपा का , घड़ा घड़ीला,
रेशम लम्बी डोर ,ओ झालरियो॥
रनु बाई गंगा भरिया, जमृता भरिया,
जाय कवेरी झालोळ ,ओ झालरियो |!
वेटी म्हारी, पहिलाज आणा ससराजी आया,
काळो घोड़ो लाया ,ओ झालरियो ॥।
पिताजी अबको आणो पछो फिरई देवो,
हम खेली लेवां फूल न पांती ,ओ झालरियो ॥।
वेटी म्हारी, दूसराज आणा जेठजी आयां,
धावळो घोड़ों लाया,ओ झालरियो ॥।
पिताजी अबको आाणों पछो फिरई देवो,
हम खेली लेवां फूल न पाती ,ओ झालरियो॥
बेटी म्हारी, तीसरांज आणा देवरजी आया,
छेल बछेरी लाया ,ओ झालरियो ॥
पिताजी अबको आाणों पछो फिरई देवो,
हम खेली लेवां फूल न पाती ,ओ झालरियो ॥
बेटी म्हारो, चवथाज आणा धणियेरजी आया,
हंसलो घोड़ो लाया, हो झालरियो |
पिताजी अबको आणो पछो फिरई देवो,
हम खेली लेवां फूल न पाती ,ओ झालरियो ॥
बेटी म्हारी, ससरो भी फिरी गयो, जेठ भी फिरी गयो
देवर भी फिरी गयो।
हांड़ा राव को कूँवर कन्हैयो,
ओ नी पाछ फिर,ओ झालरियो ॥
पिताजी जल जम्मना को काळो पाणी,
देखी न डर लाग ,ओ झालरियो ॥
बेटी म्हारी, नाव लगावसे, डोंग्या चलावसे,
पार उतारी लई जासे, ओ झालरियो ॥
पिताजी चेत – वेसाख की घाम पड़ न ,
म्हारी कड़ी को बाळो कोम्हलासे , हो झालरियो ॥
बेटी म्हारी छतरी लगावसे, तम्ब तगावसे,
छावव्ठ छावव्ठ लईं जासे ,ओ झालरियो|!
O Jhaalariyo – Traditional Gangaur Song (1952) | Lyrics
ओ झालरियो परंपरागत गणगौर गीत 1952 – LYRICS

Sonna roopa ka, ghada ghadila,
Resham lambi dor ho, jhaalariyo.
Ranu Bai Ganga bhariya, Jamruta bhariya,
Jaay Kaveri jhaalol ho, jhaalariyo.
Veti mhaari, pehlaaj aana sasaraji aaya,
Kaalo ghodo laaya ho, jhaalariyo.
Pitaji abko aano, pachho phirai devo,
Hum kheli levaan phool na paanti ho, jhaalariyo.
Veti mhaari, doosraaj aana jethji aayaan,
Dhaavlo ghodon laaya ho, jhaalariyo.
Pitaji abko aano, pachho phirai devo,
Hum kheli levaan phool na paanti ho, jhaalariyo.
Beti mhaari, teesraanj aana devarji aaya,
Chhel bacheri laaya ho, jhaalariyo.
Pitaji abko aano, pachho phirai devo,
Hum kheli levaan phool na paanti ho, jhaalariyo.
Beti mhaaro, chavthaaj aana dhaniyerji aaya,
Hanslo ghodo laaya ho, jhaalariyo.
Pitaji abko aano, pachho phirai devo,
Hum kheli levaan phool na paanti ho, jhaalariyo.
Beti mhaari, sasro bhi phiri gayo, jeth bhi phiri gayo,
Devar bhi phiri gayo.
Haanda Rao ko kunwar Kanhaiyo,
O ni paachh phir ho, jhaalariyo.
Pitaji Jal Jamna ko kaalo paani,
Dekhi na dar laag ho, jhaalariyo.
Beti mhaari, naav lagaavse, dongya chalaavse,
Paar utaari lai jaase ho, jhaalariyo.
Pitaji Chet–Vesakh ki ghaam pad na,
Mhaari kadi ko baalo komhlaase ho, jhaalariyo.
Beti mhaari, chhatri lagaavse, tamb tangaavse,
Chhaav-chhaav lai jaase ho, jhaalariyo.
ओ झालरियो परंपरागत गणगौर गीत 1952 – LYRICS

– व्याख्या –
गीत की शुरुआत – समृद्धि और सौंदर्य का प्रतीक
गीत की पहली पंक्तियों में सोने-चाँदी के घड़े, रेशम की डोर और झालर का वर्णन है।
यह समृद्धि, शुद्धता और मंगल अवसर का संकेत है। “झालरियो” शब्द लोकगीत में लय, आभूषण और उत्सव का प्रतीक बनकर आता है।
पवित्र नदियों का उल्लेख
गंगा, यमुना और कावेरी जैसी पवित्र नदियों का उल्लेख कर गीत में
शुद्धता, जीवनदायिनी शक्ति और नारी के सौभाग्य को दर्शाया गया है।
यह गणगौर की उस परंपरा से जुड़ा है जहाँ स्त्रियाँ अपने वैवाहिक जीवन की मंगल कामना करती हैं।
पहला, दूसरा, तीसरा और चौथा बुलावा
गीत में बेटी बताती है कि:
पहले ससुर आए
फिर जेठ आए
फिर देवर आए
अंत में पति (धणी) आए
हर बार बेटी अपने पिता से विनती करती है कि
“अब मुझे वापस भेज दो, मैं अभी सहेलियों के साथ खेलना चाहती हूँ।”
यहाँ बेटी का मन अभी बालपन और मायके से जुड़ा है।
वह ससुराल की जिम्मेदारियों के लिए स्वयं को तैयार नहीं मानती।
विदाई का गहरा भाव
जब ससुर, जेठ और देवर सभी लौट जाते हैं, तब पति का आना
अंतिम और निर्णायक क्षण होता है।
अब बेटी का लौटना संभव नहीं रहता।
यह हिस्सा गीत का सबसे भावुक और करुण भाग है, जहाँ
नारी का जीवन एक नए मोड़ पर प्रवेश करता है।
पिता की चिंता और स्नेह
पिता बेटी के लिए चिंतित हैं:
यमुना का गहरा काला पानी
गर्मी (चैत्र-वैशाख) की धूप
बेटी की कोमल काया
ये सभी पंक्तियाँ पिता के वात्सल्य और ममता को दर्शाती हैं।
पति का आश्वासन
अंत में बेटी बताती है कि:
नाव से सुरक्षित पार उतारा जाएगा
छतरी और तंबू लगाकर छाया दी जाएगी
धूप से बचाकर ले जाया जाएगा
यह संकेत करता है कि अब पति ही उसका संरक्षक है और
नया जीवन उसकी प्रतीक्षा कर रहा है।
ओ झालरियो परंपरागत गणगौर गीत 1952 – LYRICS
लोकसंस्कृति में गीत का महत्व
यह गीत 1950 के दशक (1952) से प्रचलित माना जाता है
गणगौर पर्व पर स्त्रियाँ समूह में इसे गाती हैं
यह गीत नारी की भावनात्मक यात्रा को दर्शाता है
निमाड़ और राजस्थान की सांस्कृतिक धरोहर का अनमोल हिस्सा है
ओ झालरियो परंपरागत गणगौर गीत 1952 – LYRICS
निष्कर्ष
“ओ झालरियो” केवल एक गीत नहीं, बल्कि
बेटी के मन, पिता के स्नेह और पति के दायित्व की
एक भावपूर्ण लोककथा है, जो पीढ़ियों से
लोकजीवन में जीवंत बनी हुई है।



