“पांच बधावा आया” निमाड़ अंचल का एक अत्यंत प्राचीन एवं पारंपरिक गणगौर लोकगीत है, जिसकी मौखिक परंपरा सन 1952 से भी पहले से चली आ रही है। यह गीत गणगौर पर्व के शुभ अवसर पर मंगल, उल्लास और देवी-पूजन की भावना को अभिव्यक्त करता है। गीत में राजा के आगमन, राणी राणुबाई के स्वागत, तथा प्रकृति और समाज में व्याप्त आनंद के चित्रण के माध्यम से लोकजीवन की सजीव झलक मिलती है।
इस पारंपरिक लोकगीत के भावों को वर्तमान पीढ़ी के लिए सरल और स्पष्ट रूप में प्रस्तुत करने हेतु इसका भावार्थ वर्ष 2026 में गितेश कुमार भार्गव द्वारा किया गया है, ताकि निमाड़ की लोकसंस्कृति, गणगौर परंपरा और लोकभावनाएँ आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित और जीवंत बनी रहें।
पांच बधावा आया
पांच बधावा आया निमाड़ी गणगौर गीत – LYRICS 1952
पांच बधावा आया , म्हारा मन भाँयाँ,
एही रे बवावा सरखा, धनियर राजा आया।
घणियेर राजा आया !, म्हारी राणी रनुबाई आाई।
पेर ओ बढ़ा की बेटी, चूनर रुलन्ती ,
चटक चूनर बिन शोभा नी आवs पांच बधावा आया, म्हारा मन माया,
गाय का गळ बन्द छुंटया, घड़िला का लेज टूट्या ,
सारंगा मोरगां शब्द सुणावs पाँच बधावया आया , म्हारा मन भावs
Paanch badhaava aaya,
पांच बधावा आया निमाड़ी गणगौर गीत – LYRICS 1952
Paanch badhaava aaya, mhaara man bhaanya, Ehi re badhaava sarkha, dhaniyar raaja aaya. Ghaniyer raaja aaya, mhaari raani Ranubai aayi.
Per o badha ki beti, chunnar rulanti, Chatak chunnar bin shobha ni aavay. Paanch badhaava aaya, mhaara man maaya,
Gaay ka gal band chhutya, ghadila ka lej tootya, Saaranga moragaan shabd sunaavay. Paanch badhaava aaya, mhaara man bhaavay.
“पांच बधावा आया” : पारंपरिक गणगौर गीत सांस्कृतिक विश्लेषण
पांच बधावा आया निमाड़ी गणगौर गीत – LYRICS 1952
“पांच बधावा आया” निमाड़ अंचल का एक अत्यंत प्राचीन एवं लोकप्रिय गणगौर लोकगीत है, जो विवाह, सुहाग, समृद्धि और मंगलकामना की भावना से जुड़ा हुआ है। यह गीत मौखिक परंपरा में पीढ़ी-दर-पीढ़ी गाया जाता रहा है और माना जाता है कि इसकी रचना 1952 से भी पहले की है।
गणगौर पर्व के अवसर पर यह गीत विशेष रूप से महिलाओं द्वारा सामूहिक रूप से गाया जाता है।
1. गीत का भावार्थ
“पांच बधावा आया” का अर्थ है—पांच प्रकार के मंगल संदेश या शुभ समाचार का आगमन। लोकपरंपरा में “पांच” संख्या को पूर्णता, शुभता और देवी-शक्ति से जोड़ा जाता है। यह बधावा किसी एक घटना का नहीं, बल्कि सुख, समृद्धि, पुत्र-प्राप्ति, विवाह और देवी कृपा—इन सभी के सामूहिक आगमन का प्रतीक है।
गीत में कहा गया है कि राजा का आगमन हुआ है, और उसके साथ राणी रनुबाई भी आई हैं। राजा यहाँ केवल सांसारिक शासक नहीं, बल्कि मंगल, सौभाग्य और देवी आशीर्वाद का प्रतीक है।
2. राणी रनुबाई का सांकेतिक अर्थ
राणी रनुबाई निमाड़ की लोकमान्यता में आदर्श नारी, सौभाग्यवती और देवी स्वरूपा के रूप में देखी जाती हैं। उनका आगमन स्त्री जीवन में सुख, मर्यादा और पूर्णता के आगमन का संकेत देता है। गणगौर पर्व स्वयं नारी-पूजन और सुहाग की कामना से जुड़ा पर्व है, इसलिए राणी का आगमन स्त्रियों के लिए विशेष महत्व रखता है।
3. चूनर का प्रतीकात्मक भाव
गीत में चटक चूनर का उल्लेख आता है। चूनर नारी के सुहाग, लज्जा, सौंदर्य और सामाजिक पहचान का प्रतीक है। बिना चूनर के शोभा न होना, इस बात का संकेत है कि स्त्री का जीवन परंपरा, संस्कार और मर्यादा से ही पूर्ण माना जाता है। यह लोकगीत नारी-संस्कृति की इसी भावना को उजागर करता है।
4. पशु-पक्षी और प्रकृति का उल्लास
गीत में गाय, घड़िला (घंटी), मोर और सारंगा जैसे प्रतीक आते हैं।
गाय के गले का बंधन खुलना स्वतंत्रता और सुख-शांति का संकेत है।
घंटी का टूटना बंधनों के समाप्त होने और नए आनंद के आगमन को दर्शाता है।
मोर और सारंगा की ध्वनि प्रकृति के उत्सव में सहभागी होने का प्रतीक है।
इससे यह स्पष्ट होता है कि बधावे का आनंद केवल मनुष्य तक सीमित नहीं, बल्कि पूरी प्रकृति उसमें सहभागी बन जाती है।
5. गणगौर पर्व से संबंध
गणगौर पर्व माता पार्वती (गौरी) की आराधना का पर्व है, जिसमें स्त्रियाँ अपने पति की दीर्घायु और अविवाहित कन्याएँ उत्तम वर की कामना करती हैं। “पांच बधावा आया” गीत इसी आस्था, विश्वास और सामूहिक आनंद को स्वर देता है। यह गीत देवी आगमन, सुहाग और मंगल अवसरों पर गाया जाना लोकपरंपरा का अभिन्न अंग रहा है।
6. लोकसंस्कृति में महत्व
यह गीत निमाड़ की उस लोकसंस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है जहाँ
संगीत जीवन का हिस्सा है,
पर्व समाज को जोड़ते हैं,
और गीतों के माध्यम से इतिहास, आस्था और भावनाएँ सुरक्षित रहती हैं।
इसी कारण इस गीत का भावार्थ 2026 में गितेश कुमार भार्गव द्वारा किया जाना, लोकधरोहर को वर्तमान पीढ़ी से जोड़ने का एक महत्वपूर्ण प्रयास माना जाता है।
निष्कर्ष
“पांच बधावा आया” केवल एक गीत नहीं, बल्कि निमाड़ की सांस्कृतिक आत्मा है। इसमें मंगल, नारी-सम्मान, देवी-पूजन, प्रकृति और समाज—सभी का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। यह गीत गणगौर पर्व की आत्मा को शब्द और स्वर देता है, और आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना दशकों पहले था।