पड़ोसी स्वाभाव Gangaur geet Lyrics -1952

गीत का विस्तृत परिचय – पड़ोसी स्वाभाव Gangaur geet Lyrics -1952
“पड़ोसी स्वभाव” निमाड़ अंचल की लोकपरंपरा में रचा-बसा एक अत्यंत संवेदनशील और सामाजिक मूल्यों से युक्त लोकगीत है। यह गीत ग्रामीण जीवन की उस आत्मा को प्रकट करता है, जहाँ रिश्ते खून से नहीं, बल्कि व्यवहार, विश्वास और मर्यादा से बनते हैं।
निमाड़ी समाज में “पड़ोसी” की अवधारणा केवल साथ रहने वाले व्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि वह संकट में सहारा, सामाजिक संतुलन का प्रहरी और पारिवारिक सम्मान का संरक्षक माना जाता है। इसी भावभूमि पर यह गीत स्त्री की दृष्टि से रचा गया है, जिसमें उसका घरेलू जीवन, उसकी चिंताएँ और उसकी नैतिक समझ बहुत सहज रूप में सामने आती हैं।
गीत की भाषा अत्यंत सरल है, पर भाव गहरे हैं। घरेलू रसोई से लेकर सामाजिक मर्यादा तक, हर पंक्ति लोकजीवन के अनुभव से निकली हुई प्रतीत होती है। यह गीत यह भी दर्शाता है कि निमाड़ की स्त्रियाँ केवल गृहस्थी नहीं संभालतीं, बल्कि सामाजिक रिश्तों की डोर भी उन्हीं के हाथों में होती है।
पड़ोसी स्वभाव

माता, पस भरी चोखा,
मुट्ठी भर मूंग की दाल।
रोहेण देवी रांध खीचड़ी।
माता, राधी सीधी न जिमाडयो छे बीरो,
तो जाव लक आई पड़ोसेण।
ओ पड़ोसेण, तू छें म्हारी धरम की माय,
सासु-ससरा ख जाई मत कहेजे।
पड़ोसेण देवां, देवा नवसर्यों हार,
हाथ को छुललो मूंदड़ो जी।
माता, तुम्हारो छल्लों राखो तुम्हारा पास,
हमारी जिबिया नहीं मान जी।
Padosi Swabhav

Mata, pas bhari chokha,
mutthi bhar moong ki daal.
Rohen Devi raandh kheechdi.
Mata, radhi seedhi na jimadyo chhe bero,
to jaav lak aayi padosen.
O padosen, tu chhen mhari dharam ki maay,
saasu sasra kha jaai mat kaheje.
Padosen devaan, deva navsaryo haar,
haath ko chhullo moondado ji.
Mata, tumharo challo rakho tumhara paas,
hamari jibiya nahin maan ji.
गीत की पंक्ति-दर-पंक्ति विस्तृत व्याख्या

1. घरेलू सादगी और देवी-आस्था
गीत की शुरुआत में चोखा, मूंग की दाल और खीचड़ी का उल्लेख मिलता है। ये सभी व्यंजन निमाड़ के साधारण, सात्त्विक और ग्रामीण भोजन के प्रतीक हैं।
“रोहेण देवी रांध खीचड़ी” यह दर्शाता है कि भोजन पकाना भी एक धार्मिक कर्म है। देवी का नाम लेकर भोजन बनाना उस आस्था को दिखाता है, जहाँ रसोई को पवित्र स्थान माना जाता है। यह पंक्ति यह भी बताती है कि सीमित साधनों में भी श्रद्धा और संतोष के साथ जीवन जिया जाता है।
2. परिवार के प्रति स्त्री की जिम्मेदारी
आगे गीत में यह चिंता प्रकट होती है कि “बीरो” यानी घर का पुरुष सदस्य ठीक से भोजन नहीं कर पाया। यहाँ स्त्री का मन बेचैन है, क्योंकि परिवार का कोई भी सदस्य भूखा न रह जाए—यह उसकी सबसे बड़ी चिंता है।
यह भाव निमाड़ी लोकजीवन में स्त्री की भूमिका को उजागर करता है, जहाँ वह केवल पत्नी या बहू नहीं, बल्कि पूरे परिवार की संरक्षक होती है।
3. पड़ोसन : धर्म की माँ
गीत का सबसे सशक्त भाव तब उभरता है, जब पड़ोसन को “धर्म की माँ” कहा जाता है। यह संबोधन दर्शाता है कि पड़ोसी पर विश्वास माता समान किया जाता है।
स्त्री पड़ोसन से निवेदन करती है कि वह ससुराल वालों के सामने कोई ऐसी बात न कहे, जिससे घर की बदनामी हो। यह पंक्ति लोकसमाज की उस संवेदनशील मर्यादा को प्रकट करती है, जहाँ घर की बातें घर तक ही सीमित रखने को ही बुद्धिमानी माना जाता है।
4. सामाजिक संतुलन और स्त्री की समझदारी
यहाँ गीत केवल भावुक नहीं रहता, बल्कि सामाजिक संतुलन का पाठ भी पढ़ाता है। स्त्री जानती है कि पड़ोसन की एक बात पूरे घर की प्रतिष्ठा को प्रभावित कर सकती है। इसलिए वह विनम्रता से आग्रह करती है, आदेश नहीं देती।
यह निमाड़ी स्त्री की सूझ-बूझ, संवाद-कौशल और सामाजिक बुद्धिमत्ता का सुंदर उदाहरण है।
5. आभूषणों का प्रतीकात्मक अर्थ
गीत में हार, मूंदड़ा और छल्ले जैसे आभूषणों का उल्लेख आता है। ये केवल गहने नहीं, बल्कि सौभाग्य, स्त्रीत्व और पारिवारिक मान-सम्मान के प्रतीक हैं।
पड़ोसन द्वारा दिया गया आभूषण सामाजिक स्नेह और सहयोग का संकेत है, पर स्त्री उसे स्वीकार करने में संकोच करती है।
6. आत्मसंयम और मर्यादा का संदेश
गीत के अंतिम भाग में स्त्री कहती है कि “तुम्हारो छल्लो राखो तुम्हारा पास, हमारी जिबिया नहीं मान जी।”
यह पंक्ति आत्मसंयम, स्वाभिमान और मर्यादा का अत्यंत सुंदर उदाहरण है। वह किसी का उपकार लेकर बोझिल नहीं होना चाहती। यहाँ निमाड़ी लोकसंस्कृति का वह गुण झलकता है, जहाँ आत्मनिर्भरता और संतुलन को बहुत महत्व दिया जाता है।
सांस्कृतिक महत्व और निष्कर्ष
“पड़ोसी स्वभाव” लोकगीत के माध्यम से निमाड़ की सामाजिक संरचना, स्त्री की मानसिकता और ग्रामीण जीवन के नैतिक मूल्यों को अत्यंत सजीव रूप में प्रस्तुत करता है।
यह गीत हमें सिखाता है कि अच्छे रिश्ते केवल शब्दों से नहीं, बल्कि संयम, समझ और सम्मान से निभाए जाते हैं।
निमाड़ी लोकगीतों की यही विशेषता है कि वे साधारण जीवन को असाधारण भावों में ढाल देते हैं। “पड़ोसी स्वभाव” उसी लोकबुद्धि और सांस्कृतिक विरासत का एक अनमोल उदाहरण है।



