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पोळा पर्व - किसानो का 1 जीवंत त्यौहार

पोळा पर्व – किसानो का 1 जीवंत त्यौहार

पोळा पर्व – किसानो का 1 जीवंत त्यौहार

पोळा पर्व - किसानो का त्यौहार 1 जीवंत त्यौहार
पोळा पर्व – किसानो का त्यौहार 1 जीवंत त्यौहार

लेखक – राजेश रेवलिया
संपादक – गीतेश कुमार भार्गव


पोळा पर्व क्या है?

किसानों का लोक–धन्यवाद उत्सव

1. पोळा पर्व का परिचय

पोळा पर्व निमाड़ अंचल, महाराष्ट्र और आसपास के क्षेत्रों में मनाया जाने वाला किसानों का अत्यंत प्राचीन, लोकप्रसिद्ध और कृषि–आधारित पर्व है। यह पर्व विशेष रूप से किसानों और पाटिल परिवारों द्वारा पूरे श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है।
पोळा मूलतः कृषि कार्यों में बैलों के योगदान के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का पर्व है। जिन बैलों की बदौलत किसान की खेती चलती है, अन्न उपजता है और जीवन संभव होता है—उन्हीं बैलों को देवतुल्य मानकर उनका पूजन किया जाता है।


2. पोळा कब मनाया जाता है

पोळा पर्व भाद्रपद मास की अमावस्या, जिसे पिठोरी अमावस्या भी कहा जाता है, को मनाया जाता है।
यह समय खरीफ की फसल के बढ़ने का होता है। लोकमान्यता है कि इसी दिन अन्नमाता गर्भधारण करती है, अर्थात धान के पौधों में दूध भरने लगता है। इसलिए इस दिन खेतों में जाना और कृषि कार्य करना वर्जित माना गया है।


3. पोळा पर्व का भौगोलिक विस्तार

पोळा पर्व का भौगोलिक विस्तार
पोळा पर्व का भौगोलिक विस्तार

पोळा पर्व मुख्य रूप से इन क्षेत्रों में मनाया जाता है—

  • महाराष्ट्र (जहाँ इसे बेंदुर भी कहा जाता है)

  • मध्यप्रदेश का निमाड़ क्षेत्र और बालाघाट

  • छत्तीसगढ़

  • कर्नाटक के कुछ हिस्से

इन सभी क्षेत्रों में यह पर्व कृषि और पशुधन से सीधे जुड़ा हुआ है।


4. पोळा पर्व क्यों मनाया जाता है

पोळा पर्व मनाने के प्रमुख कारण हैं—

  • बैलों की सालभर की मेहनत के लिए धन्यवाद ज्ञापन

  • पशुधन को सम्मान और विश्राम देना

  • किसान, परिवार और समाज के बीच सामूहिकता और सद्भाव

  • प्रकृति, अन्न और जीव–जंतुओं के प्रति संवेदनशीलता का भाव

किसान बैलों को केवल पशु नहीं, बल्कि परिवार का अभिन्न सदस्य मानता है।


5. पोळा पर्व कैसे मनाया जाता है

 

(क) बैलों का स्नान और श्रृंगार
बैलों का स्नान और श्रृंगार
बैलों का स्नान और श्रृंगार

इस दिन प्रातःकाल बैलों को नदी, तालाब या कुएँ पर ले जाकर स्नान कराया जाता है।
इसके बाद—

  • सिंगों को रंग-बिरंगे रंगों से रंगा जाता है

  • सिंगों पर तेल और हल्दी लगाई जाती है

  • गले में घुंघरमाल पहनाई जाती है

  • रंगीन कपड़ों की झूलें सजाई जाती हैं

  • पैरों में चांदी के आभूषण पहनाए जाते हैं

(ख) पूजा और आरती
पूजा और आरती
पूजा और आरती

बैलों की विधिवत पूजा की जाती है।

  • हल, जुआ, रस्सी जैसे कृषि औजारों की भी पूजा होती है

  • बैलों को देवतुल्य मानकर आरती उतारी जाती है


6. खेती से अवकाश का दिन

पोळा के दिन—

  • बैलों से कोई काम नहीं लिया जाता

  • खेतों में जाना निषिद्ध माना जाता है

  • यह दिन बैलों के लिए विश्राम दिवस होता है

यह किसानों की संवेदनशीलता और जीव–सम्मान का प्रतीक है।


7. बैल दौड़ और तोरण प्रतियोगिता

बैल दौड़ और तोरण प्रतियोगिता
बैल दौड़ और तोरण प्रतियोगिता

पोळा पर्व का एक रोचक और उत्साहपूर्ण पक्ष है बैल दौड़ प्रतियोगिता
गांव के द्वार पर कच्चे सूत का तोरण (बंधनवार) बांधा जाता है।
जो बैल उस तोरण को तोड़कर आगे निकल जाता है, उसे विजेता घोषित किया जाता है।
यह प्रतियोगिता गांव में उल्लास और उमंग भर देती है।


8. जिन घरों में बैल नहीं होते

पोळा पर्व - किसानो का 1 जीवंत त्यौहार
पोळा पर्व – किसानो का 1 जीवंत त्यौहार

जिन परिवारों के पास बैल नहीं होते, वे—

  • मिट्टी से बने बैलों की पूजा करते हैं

  • यह दर्शाता है कि पोळा केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामूहिक लोकपर्व है


9. पारंपरिक व्यंजन और भोग

पारंपरिक व्यंजन और भोग
पारंपरिक व्यंजन और भोग

पोळा पर्व पर विशेष व्यंजन बनाए जाते हैं—

  • ठेठरी

  • खुरमी

  • पूरणपोली

  • खीर

पहले—

  • भगवान को भोग लगाया जाता है

  • बैलों को खिलाया जाता है
    उसके बाद ही किसान परिवार भोजन करता है।


10. धार्मिक और पौराणिक मान्यताएँ

धार्मिक और पौराणिक मान्यताएँ
धार्मिक और पौराणिक मान्यताएँ
(क) पोलासुर वध की कथा

एक लोकमान्यता के अनुसार—
द्वापर युग में कंस ने श्रीकृष्ण को मारने के लिए पोलासुर नामक असुर को भेजा था।
श्रीकृष्ण ने भाद्रपद अमावस्या के दिन उसका वध किया।
इसी कारण इस पर्व का नाम पोळा पड़ा।

(ख) सुहागिनों का व्रत

इस दिन—

  • सुहागिन स्त्रियाँ अपने पुत्रों की दीर्घायु के लिए व्रत रखती हैं

  • किसान अपनी उपज, पशुधन और देश की सुख–समृद्धि की कामना करते हैं


11. पोळा: केवल धार्मिक नहीं, सामाजिक पर्व

पोळा पर्व—

  • सामाजिक सद्भाव का प्रतीक है

  • परिवारों को जोड़ने वाला पर्व है

  • गांव की सामूहिक संस्कृति को जीवित रखता है

भव्य शोभायात्राएँ, ढोल–नगाड़े और लोकगीत इस पर्व की शोभा बढ़ाते हैं।


12. सांस्कृतिक और नैतिक संदेश

पोळा पर्व हमें सिखाता है कि—

  • केवल मनुष्य ही नहीं, बल्कि हर उस जीव का सम्मान करें

  • जो हमारे जीवन और आजीविका में सहायक है

  • प्रकृति और पशुधन के बिना मानव जीवन अधूरा है


13. निष्कर्ष

पोळा पर्व किसान, कृषि, पशुधन और संस्कृति का संगम है।
यह पर्व हमारी लोकपरंपरा, मानवीय संवेदना और प्रकृति–सम्मान की जीवंत मिसाल है।
आज के यांत्रिक युग में भी पोळा हमें अपनी जड़ों से जोड़े रखता है।

🙏 जय जवान, जय किसान🙏

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